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क्या अठावले की गुगली को समझ रहे हैं पवार ?

कांग्रेस में नहीं बन पा रही है एकरूपता

क्या अठावले की गुगली को समझ रहे हैं पवार ?

महाराष्ट्र में राकांपा-शिवसेना और कांग्रेस की साझा सरकार बनने की रफ्तार पर रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आरपीआई) के नेता और केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास अठावले ने इन मौके पर गुगली डाल कर विराम लगा दिया है। अठावले की शारीरिक भाषा व आत्मविश्वास बताता है कि उन्होंने आखिरी समय मे पासा पलटने का मन बनाया है।

मंगलवार को दिल्ली में संसद के अंदर और बाहर केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास अठावले का महाराष्ट्र में सरकार गठन का तीन-दो का फॉर्मूला खूब चर्चा में रहा। अठावले के मुताबिक भाजपा तीन और शिवसेना दो साल के लिए अपने-अपने मुख्यमंत्री बनाने की बात स्वीकार कर लें तो सरकार गठन का रास्ता निकल सकता है। बतौर अठावले उन्होंने इस फॉर्मूले पर शिवसेना नेता संजय राउत से बात कर ली है और भाजपा से बात जारी है। अठावले की इस अनूठी पहल के बाद महाराष्ट्र में अटकलों और उम्मीदों को नए सिरे से पंख लगना शुरू हो गए हैं। वहीं राकांपा-कांग्रेस खेमे में महाराष्ट्र का मामला अभी तक किसी ठोस नतीजे पर पहुंचता नजर नहीं आ रहा है। इसके पीछे मुख्य वजह कांग्रेस की अंदरूनी उहापोह बताई जा रही है। कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात के बाद राकांपा नेता शरद पवार के जिस तरह के बयान आए हैं, उससे अभी कहना जल्दबाजी होगी कि तीनों दलों में कोई आम सहमति बन गई है। भले ही शिवसेना के नेता संजय राउत ताबड़तोड़ बैटिंग कर रहे हों और राकांपा-कांग्रेस के किला फतह करने का दावा कर रहे हों, पर राउत के दावों में वजन नजर नहीं आ रहा। अठावले के बयान के बाद पवार ने जिस तरह फील्डिंग में बदलाव किया है, उससे माना जा रहा है कि हो सकता है पवार शिवसेना की गहराई नाप रहे हों। जानकारों की मानें तो शिवसेना का रवैया अब तक भरोसे वाला नहीं रहा है। तभी पवार शुरू से अब तक अपनी सैद्धांतिक बात पर कायम हैं। वे सवालों के जवाब में कभी विपक्ष में बैठने तो कभी भाजपा-शिवसेना पर ही राज्य में सरकार न बन पाने का दोष मड़ देते हैं।

शिवसेना को मुख्यमंत्री पद चाहिए और सत्ता के लिए उसने अब तक खुद की ही खूब किरकिरी कराई है। शरद पवार अभी भी अंतिम रूप से कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं तो उसके पीछे एक और वजह बताई जा रही है, वह है कांग्रेस की अंदरूनी उठापटक का होना है। कांग्रेस में तीन-तीन सत्ता केन्द्र बने होने के कारण किसी भी निर्णय में एकरूपता का अभाव है। बताया जा रहा है कि शरद पवार की सोनिया गांधी के साथ मुलाकात को राहुल गांधी ने कोई तवज्जो नहीं दी। राहुल मौन बने हुए हैं। प्रियंका वाड्रा बैठक से पहले छुट्टियां मनाने कुल्लू-मनाली की सैर करने रवाना हो गई। फिर कांग्रेस की केरल लाबी महाराष्ट्र में शिवसेना को समर्थन देने के फैसले के खिलाफ लगातार आलाकमान पर दबाव डाल रही है। कांग्रेस उत्तर भारत से बोरिया बिस्तर समेट चुकी है तो उसके समक्ष बड़ा सवाल है कि क्या दक्षिण के बचे हुए जनाधार को भी वह दांव पर लगाएगी? उत्तर-प्रदेश के अमेठी से हारे राहुल गांधी क्या केरल की वायनाड की जमीन भी हाथ से निकाल देंगे? कांग्रेस मुख्यालय में केरल लाबी बार-बार संगठन महामंत्री केसी वेणुगोपाल से विरोध दर्ज करा रही है, महाराष्ट्र पर पुर्नविचार करने को । वेणुगोपाल के साथ समस्या यह है कि वे खुद केरल से आते हैं।

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