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सज्जन कुमार को सजा के निहितार्थ

सज्जन कुमार को सजा के निहितार्थ

सिख विरोधी दंगों में जिस प्रकार से नरसंहार किया गया, वह हृदय दहलाने वाला ही कहा जा सकता है। अब दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय के बाद इस बात की गुंजाइश बिलकुल भी नहीं बची है कि कांग्रेस के आरोपित नेता इस मामले में निर्दोष हैं। हम जानते हैं कि कुछ महीने पहले कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने सार्वजनिक मंच से यह घोषणा की थी कि सिख नरसंहार में कांग्रेस का किसी भी प्रकार का हाथ नहीं है। अब देश के वीभत्स हत्याकांड के नाम से पहचान बनाने वाला सिख नरसंहार मामला एक बार फिर से सुर्खियों में है। राहुल गांधी ने यह भी कहा था कि किसी के कहने मात्र से कांग्रेस के नेता दोषी हो जाएं, यह संभव नहीं है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने निचले न्यायालय के निर्णय को बदलते हुए कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को उम्र कैद की सजा सुनाई है। सिख दंगों में दिल्ली छावनी के राजनगर पालम इलाके में एक नवंबर 1984 को पांच सिखों की हत्या से जुड़े मामले में न्यायालय के निर्णय के विरोध में सात अपीलों पर उच्च न्यायालय ने अपना निर्णय सुनाया है। सीबीआई ने इस मामले में पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार को बरी किए जाने के निर्णय को चुनौती दी थी। साथ ही दंगा पीडि़त जगदीश कौर ने भी सज्जन कुमार की रिहाई को चुनौती दी थी।

उच्च न्यायालय के निर्णय में सज्जन कुमार को आपराधिक षडयंत्र रचने, हिंसा कराने और दंगा भड़काने का दोषी पाया गया है। इस निर्णय के बाद सज्जन कुमार को 31 दिसंबर तक समर्पण करना होगा। इससे पहले 1984 सिख दंगा मामले में 2013 में कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को निचली अदालत ने बरी कर दिया था, जबकि सज्जन कुमार के अलावा बाकी और आरोपियों को न्यायालय ने दोषी करार दिया था। इसमें पूर्व कांग्रेस पार्षद बलवान खोखर, कैप्टन भागमल, गिरधारी लाल और दो अन्य लोग शामिल थे।

इस निर्णय के बाद पीडि़त सिख समाज को न्याय मिलने की आस जगी है। यह सही है कि सिखों का नरसंहार केवल इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उत्पन्न हालातों का परिणाम था। यह प्रतिक्रिया किसने की, यह एक अलग सवाल है, लेकिन बिना किसी संलिप्तता के इतना बड़ा हादसा हो ही नहीं सकता। इसलिए भारतीय जनता इस मामले में कांग्रेस को सदैव कठघरे में खड़ा करती रही है। हत्याकांड के बाद कांग्रेस के नामचीन नेताओं के नाम भी सामने आए थे, इन नेताओं को कांग्रेस ने बचाने का प्रयास ही नहीं किया, बल्कि वे हमेशा पार्टी और सत्ता के उच्च पदों पर भी विराजमान रहे। इसे क्या कहा जाएगा?

उल्लेखनीय है कि 31 अक्टूबर 1984 को भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की उनके अंगरक्षकों द्वारा हत्या किए जाने के बाद देशभर में सिख विरोधी दंगे भड़क गए थे। तब दंगों में आधिकारिक रूप से 2733 सिखों को निशाना बनाया गया। गैर सरकारी आंकड़ों के मुताबिक मरने वालों की संख्या 3870 थी। दंगों का सबसे अधिक असर दिल्ली, इंदौर और कानपुर पर हुआ। देशभर में सिखों के घरों और उनकी दुकानों को लगातार हिंसा का निशाना बनाया गया। तीन दिन तक सिखों का नरसंहार चलता रहा। नरसंहार करने वालों को कौन हवा दे रहा था, यह 34 साल बाद भी साफ नहीं हो पाया है, लेकिन जिन कांग्रेस नेताओं पर इन दंगों में शामिल होने के आरोप लगे थे, कांग्रेस ने उनके विरोध में किसी भी प्रकार की कार्रवाई भी नहीं की। क्या इससे यह संकेत नहीं मिलता कि सिखों के नरसंहार मामले में कांग्रेस सीधे तौर पर जिम्मेदार रही है।

इंदिरा गांधी की हत्या के तुरंत बाद देश की सत्ता संभालने वाले वर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के पिता राजीव गांधी की सरकार ने इस जघन्य हत्याकांड को रोकने के लिए किसी भी प्रकार के प्रयास नहीं किए। जो कोशिशें हुईं, वह भी नाम मात्र की ही थीं। इतना ही नहीं, राजीव गांधी ने तो सिख नरसंहार के बारे में यहां तक कहा था कि जब कोई मजबूत पेड़ गिरता है तो उसके आसपास की धरती हिलती है। यानी राजीव गांधी ने सिख नरसंहार को धरती हिलने का परिणाम बता दिया।

राजीव गांधी की बातों से यही लगता है कि उन्होंने सिखों के कत्लेआम को मामूली घटना ही माना था। राजीव गांधी के ऐसे बयानों के कारण ही नरसंहार करने वालों के हौसले बुलंद हो गए और उसके बाद भी मौत का नंगा नाच चलता रहा। आज भले ही कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी सिख दंगों में कांग्रेस का हाथ नहीं होने की वकालत कर रहे हैं, लेकिन राहुल गांधी को इस तथ्य पर भी गौर करना चाहिए कि इस मामले में जो भी आरोपित बनाए गए, उनमें अधिकतर कांग्रेस के ही नेता थे।

भारतीय राजनीति का इतिहास इस बात का गवाह है कि इस हत्याकांड में कांग्रेस की भूमिका के बारे में कांग्रेस के बड़े नेताओं ने ही शामिल होने की एक प्रकार से पुष्टि ही कर दी थी। हम जानते हैं कि सोनिया गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने सरेआम सिख दंगों के लिए कांग्रेस की ओर से आम जनता से माफी मांगी थी। क्या कांग्रेस के प्रमुख नेताओं द्वारा माफी मांगने का यह कृत्य यह संकेत नहीं करता कि सिख दंगों में कांग्रेस का ही हाथ था। वास्तव में माफी वही मांगता है, जिसने गलती की हो, तो क्या सिख दंगा कांग्रेस द्वारा की गई गलती ही थी? सिख दंगा इतना हृदय विदारक था कि इसमें माफी भी नहीं दी जा सकती। राहुल गांधी अगर अब यह कह रहे हैं कि सिख दंगों में कांग्रेस दोषी नहीं हैं तो फिर क्या इस बात का खुलासा करने का प्रयास करेंगे कि इसके लिए वास्तविक दोषी कौन है?

सिख नरसंहार में शामिल लोगों को यह पता था कि केवल सिखों को ही मारना था, यह केवल अनियंत्रित भीड़ का परिणाम नहीं था, क्योंकि अनियंत्रित भीड़ तो किसी को भी मार सकती थी। दिल्ली में इस हत्याकांड का वीभत्स रुप देखने को मिला। कुछ लोगों ने योजना पूर्वक सिख समुदाय की बस्तियों में जाकर उनकी पहचान करनी शुरू कर दी ताकि कोई भी सिख परिवार उनके इस कोप से बच न सके। इसमें प्रमुख भूमिका निभाने का जिन नेताओं पर आरोप लगा था, उनमें कमलनाथ, जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार के नाम शामिल थे। सिख समुदाय के लोग भी कांग्रेस के नेताओं को दोषी मानते रहे हैं। सिख हत्याकांड में शामिल लोगों को सजा दिलाने के लिए सिखों द्वारा कई बार विरोध प्रदर्शन भी किए गए, लेकिन हर बार सिखों की भावना को कुचलने का काम सरकारों द्वारा किया जाता रहा है। इतना जघन्य कांड होने के बावजूद 33 वर्षों से सिख समुदाय को इंसाफ नहीं मिल पाया है। किसी भी आरोपित को सजा नहीं दी गयी। इसके लिये हर वो सरकार जिम्मेदार है जो केंद्र में शासन कर रही है या कर चुकी है। सिख धर्म का इतिहास हमेशा कुर्बानी के लिये पहचाना जाता है, चाहे हमारे गुरु और उनका परिवार हो, चाहे देश की आजादी के लिये किये गये सिखों द्वारा संघर्ष हो।

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स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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