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प्रशासनिक सक्रियता के विरुद्ध मप्र में डॉक्टरों का ग्वालियर से उठा सत्याग्रह कितना तार्किक

लोकस्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा को आईएएस से मुक्त कराने का अभियान सामयिक औऱ तार्किक भी है।

प्रशासनिक सक्रियता के विरुद्ध मप्र में डॉक्टरों का ग्वालियर से उठा सत्याग्रह कितना तार्किक

वेब डेस्क / डॉ. अजय खेमरिया। मप्र में सरकारी औऱ गैर सरकारी डॉक्टर्स इन दिनों ब्यूरोक्रेसी के विरुद्ध लामबंद हो रहे है लगभग एक दर्जन चिकित्सकीय संगठनों ने ग्वालियर के गजराराजा मेडिकल कॉलेज में एकराय होकर मप्र की अफ़सरशाही के विरुद्ध गांधीवादी तरीके से लामबंद होने का निर्णय लिया है।' ब्यूरोक्रेटिक एक्टिविज्म 'को प्रदेश भर में चुनौती देने के लिये चिकित्सक विभाग के सभी आईएएस अफसरो के आदेश की नाफ़रमानी का निर्णय ले चुके है। अब किसी कलेक्टर, कमिश्नर, सचिव को सर कहकर संबोधित नही किया जाएगा उनका नाम लिया जाएगा। न ही उनके घर जाकर इलाज करेंगे डॉक्टर। हालांकि इस निर्णय के बाद प्रशासन ने ग्वालियर के 41 निजी अस्पतालों को विभिन्न आधारों पर बंद करने के नोटिस जारी कर दिए है और डाक्टर्स भी मामले में झुकने की जगह अस्पताल बन्द करने की जिद पर अड़ गए है, जिससे यह मामला बेहद संवेदनशील बन गया है।

असल में मप्र के स्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा दोनों महकमें अफ़सरशाही के बेख़ौफ़ चारागाह में तब्दील हो चुके है।इसके चलते प्रदेश में न केवल स्वास्थ्य महकमा वेंटिलेटर पर है बल्कि चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता और अनुशासन दोनों बुरी तरह ध्वस्त हो चुके है।मौजूदा सरकारी सिस्टम में आईएएस अफसरों का बोलबाला इस हद तक है कि सर्वाधिक सीनियर डॉक्टर्स भी नए अफसरों के आगे हाथ बांधकर खड़े रहते है।हर जिले में कलेक्टर स्वास्थ्य विभाग का भी सुपर बॉस है वह जिला अस्पतालों के अलावा मुख्य चिकित्सा अधिकारी का भी प्रमुख है। हर फाइल उसके अनुमोदन के लिये जाती है जिसे लेकर जिले का सीएमओ अक्सर कलेक्टर के दरवाजे पर खड़े नजर आते है।हर जिला अस्पताल में एक सबसे सीनियर डॉक्टर सिविल सर्जन होता है लेकिन उसकी नियुक्ति कलेक्टर के अनुमोदन से होती है।मप्र में ग्रामीण सेवाओं के लिये जिला स्वास्थ्य समिति औऱ जिला अस्पताल के लिये रोगी कल्याण समितियां बनी हुई है इनके अध्यक्ष जिले के प्रभारी मंत्री है कलेक्टर मिशन लीडर।पिछले कुछ दशकों में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन,शहरी मिशन,राष्ट्रीय अंधत्व निवारण मिशन,राष्ट्रीय पल्स पोलियो मिशन,ट्यूबरक्लोसिस मिशन,एड्स नियंत्रण,पोषण पुनर्वास, जननी सुरक्षा,बाल्य एवं शिशु मात्र कल्याण जैसे केंद्र प्रवर्तित अभियानों के लिये भारी भरकम बजट प्रावधान साल दर साल बढ रहा है लिहाजा स्वास्थ्य महकमा आज सबकी नजरों में है और करोड़ों की धनराशि ने इसमें नेताओं के साथ ब्यूरोक्रेसी का दखल इस हद तक समाहित कर दिया है कि बगैर इनके जनस्वास्थ्य जैसा विषय एक कदम भी आगे नही बढ़ पाता है।कलेक्टर्स के पास अपने भी काम बहुतायत होते है ऐसे में जिले के स्वास्थ्य मिशन लीडर के रूप में उसके द्वारा डॉक्टरों के मामले में कितना न्याय किया जाता है यह हम सरकारी अस्पतालों की मौजूदा हालात से लगा ही सकते है।जो नया मेडीकल स्थापना कानून अमल में लाया जाना है उसमें नर्सिंग होम्स के संचालन की अनुमति से लेकर पीएनडीटी, जैसे सभी मामलों में कलेक्टर को ही प्राधिकारी बनाया गया है।जाहिर है ब्यूरोक्रेसी का दखल स्वास्थ्य सेवाओं में दिन ब दिन बढ़ना ही है।जिलों में ही नही राज्य स्तर पर भी इस महकमें को यही अफ़सर चला रहे है।कभी एक सचिव से काम चल जाता था लेकिन आज प्रमुख सचिव ,सचिव,उपसचिव शासन स्तर पर आईएएस अफसर है वही आयुक्त की विभागीय कुर्सी पर भी आईएएस अफसर ही पदस्थ है।केंद्र पोषित फ्लेगशिप स्कीम्स के संचालन के लिये अलग से आईएएस बिठाए गए है मसलन राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन,राष्ट्रीय एड्स कंट्रोल सोसायटी,आयुष्मान मिशन जैसे अभियान में अलग से आईएएस अफसर तैनात है।अंदाजा लगाया जा सकता है कि कैसे मप्र में ब्यूरोक्रेसी ने इस सबसे बड़े और उपयोगी महकमे को अपने शिंकजे में कस रखा है।सवाल यह है कि भारत की स्यंयभू सर्वोच्च मेधा सम्पन्न और कार्यकुशल फोर्स के नेतृत्व में जनस्वास्थ्य के मामले में मप्र की हालत बीमारू राज्यों से बाहर क्यों नही आ पा रही है?

लोकस्वास्थ्य के समानांतर चिकित्सा शिक्षा विभाग की हालत भी कमोबेश यही है प्रमुख सचिव,आयुक्त,उपसचिव तो आईएएस है ही जो मंत्रालय और संचालनालय में बैठते है वहीं हर मेडिकल कॉलेज का स्थानीय स्तर पर मुखिया संभाग का कमिश्नर बना दिया गया है।यानी एक मेडिकल कॉलेज के ऊपर चार चार आईएएस अफसर है मप्र में।हर सरकारी मेडिकल कॉलेज को सरकार ने स्वशासी यानी ऑटोनोमस घोषित कर उसका अध्यक्ष संभागीय कमिश्नर को बना दिया और डीन को इस स्वशासी समिति का सचिव।कलेक्टर सदस्य है।कमिश्नर के अधीन औसत पांच जिले है।उसकी व्यस्तता का अंदाजा लगाया जाना कठिन नही।ग्वालियर संभाग में पहले से ही तीन कॉलेजों का अध्यक्ष वह है ही गुना में एक नया कॉलेज खुल रहा है इस तरह एक कमिश्नर के अधीन चार कॉलेज होंगे।यह कमिश्नर इस तर्क के साथ कॉलेजों से जोड़े गए कि डॉक्टर्स प्रशासन और विहित विधिक प्रक्रियाओं के मामलों में बहुत कुशल नही होते है और ऑटोनॉमी देकर स्थानीय स्तर पर ही मेडिकल कॉलेजों की आवश्यकता और विकास की संभावनाओ पर त्वरित निर्णय हो सकेंगे।लेकिन आज बीस साल बाद इस प्रयोग ने मेडिकल कॉलेजों की हालत पहले से और भी दयनीय बनाकर रख दी है। कभी मप्र में डायरेक्टर मेडिकल एजुकेशन (डीएमई) मेडिकल एजुकेशन सिस्टम की नियामक पोस्ट हुआ करती थी लेकिन आज यह भोपाल में कमिश्नर के अधीन एक कमरे में डाकिए से ज्यादा महत्व की नही रह गई है।कॉलेजों में डीन और अधीक्षक के पदों की भर्ती संभागीय कमिश्नर करते है वे अपने चहेते लोगों को किस तरह फायदा पहुचाने का प्रयास करते है इसका नमूना हाल ही में गवालियर कॉलेज के डीन के लिये कमिश्नर से जारी इश्तहार से लगाया जा सकता है जिसमें एमसीआई की अहर्ताओं के अलावा एलएलबी की डिग्री की शर्त भी रखी गई।मप्र के 7 नए मेडिकल कॉलेजों में हुई भर्तियों में कमिश्नर की प्रशासनिक निपुणता के अधीन व्यापक गड़बड़ियां हुई जिनकी जांच विधानसभा स्तर की कमेटियां कर रही है।ये गड़बड़ी व्यापमं से भी बड़े पैमाने पर हुई है लेकिन इस मामले में हो हल्ला इसलिये नही हुआ क्योंकि भर्ती के सिस्टम में सिर्फ ब्यूरोक्रेटस ही शामिल है।मप्र में पक्ष और विपक्ष दोनो के विधायक इस मामले को लगातार दो सत्रों से उठा रहे है लेकिन कोई करवाई इसीलिए नही हो पा रही है क्योंकि पूरी प्रक्रिया अफसरों के अनुमोदन और सरंक्षण में हुई है।मेडिकल कॉलेजों में ऑटोनॉमी के बाबजूद करोडो के उपकरण, विनिर्माण, मेडिकल एसेसरीज सब अफसरों के केंद्रीकृत मॉडल पर निर्भर है।कुल मिलाकर शिक्षा जैसा विशुद्ध तकनीकी विभाग भी उन अफसरों के लिये प्रयोगशाला औऱ पारस पत्थर बना हुआ है जिन्हें लोहिया जी जैसे विचारक देश के लिये अनुपयोगी और अनावश्यक मानते थे।

बेहतर होगा मप्र ही नही देश भर में मेडिकल सेक्टर को ब्यूरोक्रेसी के मकड़जाल से बचाकर रखा जाए।जहां तक इन संस्थानों में प्रशासनिक निपुण अमले का सवाल है इसके लिये आईएएस संवर्ग में मेडिकल कोटा भी प्रावधित किया जाए अभी गैर प्रशासनिक महकमों जैसे जनसपंर्क,उधोग, इंजीनियरिंग नगरीय निकाय से कुछ बेहतरीन ट्रेक रिकॉर्ड वाले अधिकारियों को आईएएस बनाया जाता है वैसे ही मेडिकल से डॉक्टरों को आईएएस बनाया जाए और उन्हें कलेक्टरी की जगह केवल स्वास्थ्य और मेडिकल एजुकेशन में पदस्थ किया जाए।शासन और विभाग के मध्य ही आईएएस अफसरों की पदस्थापना की जानी चाहिये।मेडिकल कॉलेज के लिये ऑटोनामी व्यवस्था को समाप्त कर पुरानी डीएमई प्रधान व्यवस्था को मप्र में बहाल किये जाने की आवश्यकता है अन्यथा देश भर के हर जिले में मेडिकल कॉलेज खोलने का सपना अफ़सरशाही के लिये सिर्फ बिल्डिंग और भर्ती,खरीदी पर सीमित होकर रह जाएगा।बेहतर होगा आल इंडिया और स्टेट सर्विस की तरह मेडिकल सर्विस भी शुरू की जाये जैसा इंजीनियरिंग, सूचना,वित्त संवर्ग के लिये प्रावधान है।इन्ही सेवाओं से मेडिकल सेक्टर के प्रधान पदों पर नियुक्ति दी जाये।

सरकार मे ब्यूरोक्रेटिक एक्टिविज्म के विरुद्ध जो लामबंदी आरम्भ हुई है असल मे वह एक तरह से अहं औऱ योग्यता की लड़ाई भी है क्योंकि कॉलेज के प्रोफेसर या सीनियर सर्जन को आज एसडीएम तहसीलदार जैसे अफ़सरो को भी निरीक्षण के दौरान सर ..सर कहना पड़ता है।जबकि यह माना जाता है कि पढ़ाई में सबसे काबिल बच्चे ही मेडीकल की परीक्षा पास कर पाते है।

शायद इसीलिए अब मप्र में डॉक्टर किसी भी आईएएस को सर नही कहेंगे उसे नाम से पुकारेंगे।

आपसी संबोधन से शुरू यह सत्याग्रह गांधीवादी रास्ते पर ही बना रहे तो बेहतर होगा क्योंकि देश के गरीब आदमी का स्वास्थ्य आज भी बहुत खराब है और आईएएस किसी मर्ज का इलाज 70 साल में नही कर पाए है यह भी तथ्य है।

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