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स्त्री सशक्तिकरण की प्रतीक रानी लक्ष्मीबाई

महिमा तारे

स्त्री सशक्तिकरण की प्रतीक रानी लक्ष्मीबाई

बलिदान दिवस पर विशेष 

आज के कथित बुद्धिजीवियों का एक प्रिय विषय है, नारी स्वतंत्रता, स्त्री सशक्तिकरण। रेखांकित करें, कथित बुद्धिजीवी शब्द को। ऐसा इसलिए कि यह विषय संवेदनशील और महत्वपूर्ण है। पर भारत में रह कर अभारतीय सोच रखने वाले जब इस विषय को केन्द्र में रख कर भारतीय संस्कृति को, भारतीय परम्परा को कठघरे में खड़ा करते हैं तो उनके बौद्धिक दीवालिएपन पर तरस आता है। हम उनकी बुद्धि की सीमाएं जानते हैं, इसलिए वह रामायण, महाभारत को समझ पाएंगे, इसकी संभावना कम ही है। पर क्या वे अपनी स्मृति को ज्यादा नहीं सिर्फ 162 साल पीछे ले जाने का कष्ट करेंगे ? करेंगे तो पाएंगे कि महारानी लक्ष्मीबाई, सिर्फ वीरांगना ही नहीं है, वह बोल्ड भी है ब्यूटीफूल भी है और स्त्री सशक्तिकरण का साक्षात उदाहरण है।

1857 की क्राति यानी आज से लगभग 162 साल पहले महिलाओं का योगदान राष्ट्र निर्माण में हो इसे रानी लक्ष्मीबाई ने सुनिश्चित किया। झाॅसी के गणेश मंदिर में प्रतिवर्ष महिलाओं का एक उत्सव हल्दी कुंकू नाम से आयोजित होता था इस उत्सव में नगर के प्रमुख एवं आम धरानों की भी महिलाएं आती थीं। इसी उत्सव के माध्यम से सुन्दर, मुन्दर, जूही, झलकरी, काशीबाई आदि किशोरियाॅं और तरूणियों लक्ष्मीबाई की सहेलियंा बन गई। रानी ने सबको घुडसवारी और शस्त्राभ्यास कराया। इस तरह उन्होंने एक स्त्री-सेना ही खडी कर दी जिसने आगे चलकर अंग्रेजों के साथ युद्ध में भाग लिया। झाॅसी की प्रत्येक महिला का योगदान इस समर में हो इसलिए उन्होंने झाॅसी की प्रत्येक महिला से आग्रह किया कि वे हल्दी कुंकू के उत्सव के समय अपने गहनों में से कुछ न कुछ दें और रानी इसके बदले उन्हें वह हल्दी कुंकू देंगीं। इस तरह प्रत्येक महिला का इस समर में मानसिक योगदान दिलवाया। इस तरह प्रत्येक महिला में राष्ट्रीय भाव का जागरण करने का दृष्टिकोण उनके जीवन को देखने से मिलता है। यह दर्शाता है कि वह झांसी साम्राज्य के घर घर के दिलों पर राज करती थी।

राष्ट्र सेविका समिति, समाज में, देश में मातृशक्ति को राष्ट्र निर्माण में रत करने के लिए एक स्वयंसेवी संगठन है। समिति ने अपनी सेविकाओं के लिए तीन आदर्श रखे हैं। मातृत्व के लिए जीजाबाई, कृतित्व के लिए, शासन प्रबंधन के लिए अहिल्याबाई होल्कर और वीरता, साहस, पराक्रम के लिए रानी लक्ष्मीबाई।

रानी लक्ष्मीबाई का देश के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में अद्भुत योगदान है। मैं अपनी झाॅंसी नहीं दूंगी का जयघेष करने वाली रानी लक्ष्मीबाई, बचपन से ही साहसी एवं तेजस्वी थी। एक प्रसंग है। बच्चों के बीच बिठूर में शिक्षक सवाल करते हैं, तुम में से कौन महान बनेगा? राष्ट्र सब बच्चे हाथ खडा करते हैं। एक बच्ची हाथ खड़ा नहीं करती शिक्षक सवाल करते हैं, बेटा तुम्हें महान नहीं बनना है। वह कहती है, मैं महान हॅू। यह अदम्य विश्वास प्रगट करने वाली बालिका मनू थी, जो झांसी में रानी लक्ष्मीबाई बनी। पति की असमय मृत्यू के बाद अंग्रेजों की कुटीलनीति के कारण जब झांसी पर अंग्रेजों की दृष्टि पड़ी तो जिस प्रकार रानी लक्ष्मीबाई ने स्वाधीनता संग्राम का नेतृत्व किया वह अद्भुत किया। झांसी से काल्पी एवं काल्पी से ग्वालियर तक तब रानी लक्ष्मीबाई की शौर्य गाथा का एक एक पन्ना, और एक एक अक्षर सिर्फ पठनीय ही नहीं है, हम आज राष्ट्र निर्माण में उससे क्या प्रेरणा ले सकते हैं समझने का है।

पर आज दुर्भाग्य से देश के इन नायक, नायिकाओं के प्रति हमारा क्या दृष्टि कोण है। एक पीड़ा दायक प्रसंग है जिसकी चर्चा आज आवश्यक है। राष्ट्र सेविका समिति की संस्थापिका वंदनीय लक्ष्मीबाई केलकर के मन में आया कि जब समिति रानी लक्ष्मीबाई को अपना आदर्श मानती है तो क्यों न लक्ष्मीबाई की प्रतिमा स्थापित की जाए। जिससे अधिक से अधिक भारतीय स्त्रीयों के मन में अपने गौरवशाली मूल्यों के प्रति आस्था का निर्माण होगा। 1958 में वीरांगना लक्ष्मीबाई के बलिदान के 100 वर्ष पूर्ण होने वाले थे। स्मारक के लिए उचित समय था। 1954 में स्मारक की योजना हेतु राष्ट्र सेविका समिति की कार्यकारिणी में नासिक में रानी की स्मारक बनाने का निर्णय लिया गया। इस प्रकार से 1857 स्वतंत्रता संग्राम के शताब्दी के समारोह नवम्बर में रानी के जन्मदिन पर प्रतिमा अनावरण का कार्यक्रम निश्चित हुआ।

योजना के अनुसार खामगांव के सुप्रसिद्ध शिल्पकार पंधे गुरूजी को रानी की प्रतिमा बनाने को कहा गया। स्वतंत्रता संग्राम का शताब्दी वर्ष होंने से सम्पूर्ण वर्धा में उत्साह जनक वातावरण था। वर्धा नगर में राजनीतिक लोगों ने भी प्रतिमा स्थापना को लेकर बहुत उत्साह दिखाया परन्तु जैसे ही वंदनीय मौसी जी ने प्रतिमा स्थापना नगर के मध्यवर्ती क्षेत्र में हो ऐसा विचार सभी के सामने रखा वैसे ही अचानक उत्साह खत्म हो गया। कोई कहने लगा कि यह जगह महात्मा गांधी के लिए है तो कोई इसे जमुनालाल जी के लिए है, कहने लगा तो कोई छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा के लिए स्थान सुरक्षित है ऐसा कहने लगा।

कार्यक्रम में चार दिन शेष थे। स्थान निश्चित नहीं हो पा रहा था, मदद हेतु जिन बंधुओं से अपेक्षा थी उन्हों ने ऐसी सलाह दी कि मौसी जी आप मध्यवर्ती स्थान का आग्रह छोड़ दीजिए। किसी ने कहा यह राम मंदिर केलिए आरक्षित स्थान है। उसके एक कोने में हम स्थान दे सकते हैं जिसने ब्रिटिश साम्राज्य को अपने शौर्य से लोहे के चने चबवाए ऐसी वीरांगना को एक कोने में स्थान? अपनी दुर्बलता के कारण हम अपने राष्ट्र पुरूषों की भी उपेक्षा कर सकते हैं। इससे स्पष्ट होता है। पर अन्त में मौसीजी के प्रयासों से प्रतिमा वर्धा के उचित स्थान पर स्थापित हुई। रानी की प्रतिमा का अनावरण सातारा की रानी श्रीमंत सुमित्रा राजे भोसले के द्वारा किया गया।

रानी लक्ष्मीबाई की प्रतिमा साक्षात शक्ति का प्रतीक है। यद्यपि स्त्री प्रमुख रूप से निर्माण और संवर्धन शक्ति है पर आवश्यकता होने पर दुष्टों के लिए संहारक भी हो सकती हैं। यह रानी के जीवन से सीख सकते हैं।

ग्वालियर सौभाग्यशाली है किइस धरा पर रानी ने देश के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया था यह भूमि हमें नित्य बलिदान की याद दिलाती है कि देश प्रेम सर्वापरि है। पर पिछले दिनों ही कि बात है शाम के समय आयोजन की रचना के लिए ऐसा निश्चत हुआ कि आज रानी लक्ष्मीबाई की समाधि स्थल पर जाया जाए और चालक जो कि ग्वालियर के ही रहने वाले हैं कहा गया कि समाधि स्थल चलना है तो ये जानकर हम आश्चर्य में पड़ गए कि उस युवा को ग्वालियर में रानी लक्ष्मीबाई का समाधिस्थल है यह भी नहीं पता था। देश के शहीदों की जानकारी होना और देना आज कितना बडा काम है। इस पर सोचने का विषय है। सुप्रसिद्ध समाजसेविका सुधा मूर्ति एक जगह लिखती हैं कि रशिया में नव विवाहित जोड़ा हनीमून पर जाने से पहले देश के लिए शहीद हुए सैनिकों को नमन करने जाता है। आज हमारे देश में भी इस की आवश्यकता है।

बाबा गंगादास की बडी धर्मशाला भी यहीं है जहां रानी के पार्थिव शरीर की रक्षा हेतु 745 साधुओं ने अपने प्राणों की आहूति दी। मात्र 23 वर्ष की उम्र में इस वीरांगना ने मातृभूमि के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग किया। बुन्देलखण्ड की यह वीरांगना देश भर के कांतिकारियों की प्रेरणा बन गई। उन्हें आदर्श मानकर स्वतंत्रता संग्राम में अनेक महिलाओ ने भाग लिया। इस बलिदानी भूमि को बलिदान दिवस पर शत-शत नमन।

लेखिका राष्ट्र सेविका समिति ग्वालियर की महानगर कार्यवाहिका हैं।

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