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50 हजार में हो जाते थे चुनाव, अब पानी की तरह बहता है पैसा

50 हजार में हो जाते थे चुनाव, अब पानी की तरह बहता है पैसाआज के दौर में ईवीएम का उपयोग होता है.

जनता के दु:ख-दर्द को दूर करना होता था मुख्य उद्देश्य

ग्वालियर/अरूण शर्मा। ग्वालियर में हमारा आना वर्ष 1958 में हुआ। इसके बाद वर्ष 1962 में चाइना का भारत पर हमला हुआ। उस समय समाचार पत्रों और रेडियों के माध्यम से राजनीति को समझने लगे। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू थे, तभी से मेरी राजनीति में दिलचस्पी बढ़ी और हम भी जानने लगे कि राजनीति क्या होती है। इसके बाद हमने भी देश में होने वाले चुनावों में अपना सहयोग देना शुरू कर दिया।लोगों के घर-घर जाकर प्रत्याशी के लिए प्रचार-प्रसार करते थे। जो प्रत्याशी चुनाव में खड़े होते थे उनका मुख्य उद्देश्य देश की सेवा करना और जनता के दुख-दर्दों को दूर करना होता था। प्रत्याशियों में एक गरिमा हुआ करती थी, आरोप-प्रत्यारोप का नामो निशान नहीं था।

व्यक्ति केवल अपने नाम और काम के दम पर ही चुनाव लड़ते थे, लेकिन आज सबकुछ बदल गया है। यह कहना है घोसीपुरा में रहने वाले राम सिंह बाथम (दद्दा) का। रामसिंह बाथम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विक्रम शाखा के स्वयं सेवक भी रह चुके हैं।

स्वदेश से चर्चा के दौरान श्री बाथम ने बताया कि पहले का चुनाव बहुत ही कम पैसे में हो जाता था। उस समय के दौर में विधायक के लिए 50 हजार और सांसद के लिए मात्र 80 हजार रुपए से कम का खर्चा आता था। आज यह खर्चा लाखों-करोड़ों रुपए में पहुंच गया है। उस चुनाव में हर वर्ग तांगा चलाने वाले से लेकर पोस्टर बनाने और छापने वाले तक को काम मिलता था। पहले चुनाव किसी उत्सव से कम नहीं होता था। तांगों का सबसे अधिक उपयोग होता था। एक व्यक्ति तांगे में बैठकर प्रत्याशी का प्रचार करता तो दूसरा प्रत्याशी के पर्चेे बांटता था। चुनाव प्रचार के लिए लोगों को प्लास्टिक और टीन के गोल-गोल बिल्ले, पम्पलेट और कार्ड आदि घर-घर जाकर बांटते थे और लोगों से मिलते थे। प्रत्याशी का हर व्यक्ति से संपर्क होता था, आज ऐसा कहीं कुछ नहीं है। आज के समय में तो प्रत्याशी के दर्शन ही नहीं होते हैं। घर पर भी कोई मिलने के लिए नहीं आता है और न ही कोई समस्या पूछता है। मुझे अच्छे से याद है कि जब ग्वालियर में अटल बिहारी वाजपेयी और राजमाता सिंधिया की सभा होती थी तब हजारों-लाखों लोग उनकी सभा में उन्हें देखने और सुनने के लिए जाया करते थे। आज यह स्वरूप बदल गया है और सभाओं में लोगों को पैसे देकर बुलाया जाता है, तब कहीं जाकर भीड़ इकट्ठा हो पाती है।

निजी स्वार्थों के लिए लड़ते हैं चुनाव

आज के समय में चुनाव जीतने वाला प्रत्याशी पहले अपने हितों के बारे में सोचता है। देखने में यह आ रहा है जिसके पास चुनाव जीतने से पहले कुछ नहीं था उसके पास आज देश-विदेश में बड़ी-बड़ी संपत्तियां खड़ी हो गई हैं, जिसकी कीमत करोड़ों-अरबों रुपए में है। पहले के समय में ऐसा कुछ नहीं था। व्यक्ति चुनाव जीतने के बाद देश और समाज की सेवा करता था।

वाट्सअप और फेसबुक बने प्रचार का जरिया


श्री बाथम ने बताया कि आज के समय में चुनाव का नजरिया बहुत बदल गया है। चुनाव प्रचार-प्रसार के लिए लोग वाट्सअप और फेसबुक आदि का उपयोग अधिक करने लगे हैं। हमारे समय के चुनाव में व्यक्ति नि:स्वार्थ भाव से आगे बढक़र प्रत्याशी के लिए काम करता था। प्रत्याशी द्वारा काम करने वाले लोगों को भोजन, पानी और चाय तक की व्यवस्था करवाई जाती थी लेकिन आज का चुनाव पूर्ण रूप से शराब, पैसे और कपड़ा बांटने पर निर्भर हो गया है। हालत यह है कि आज आयकर और आबकारी विभाग को चुनाव में उपयोग होने वाले पैसे और शराब पर नजर रखनी पड़ रही है। आज के समय में बिना प्रलोभन दिए चुनाव लड़ा ही नहीं जा रहा है।

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स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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