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युवाओं और गरीबों को बस राजनीतिक लॉलीपॉप

सियाराम पांडेय 'शांत'

युवाओं और गरीबों को बस राजनीतिक लॉलीपॉप

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने युवा हितों की निरंतर दुहाई दी। इस मुद्दे पर यथासंभव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घेरा। उनकी नीतियों की आलोचना की। जिन युवाओं ने दिन -रात एक कर पार्टी को इस काबिल बनाया कि मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बन सके,उस कांग्रेस के मुखिया ने युवाओं की भावना पर तुषारापात करने में एक पल भी नही लगाया। जिस तरह कमलनाथ को मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री चुना गया और चुनाव में अपना खून-पसीना एक करने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया की उपेक्षा की गई,उससे मध्यप्रदेश का युवा खुद को ठगा महसूस कर रहा है। वक्त और धैर्य सबसे बड़ा योद्धा होता है। यह जुमला नहीं तो आखिर है क्या? भाजपा पर जुमलेबाजी का आरोप लगाने वाली कांग्रेस ने अनुभव और युवा जोश का नारा भी उछाला,यह युवाओं के जले-कटे पर नमक छिड़कने जैसा ही है। भले ही कांग्रेस ने अनुभव का वास्ता देकर ज्योतिरादित्य का मुंह बंद कर दिया हो और उनकी मजबूरी के दस्तावेज पर अपने अधिकारों की मुहर लगा दी हो,लेकिन इससे मध्यप्रदेश के युवाओं की उम्मीदें ध्वस्त हो गई है।

युवाओं वाली 21 वीं सदी की बात अब केवल नारों और जुमलों में ही अच्छी लगती है। कोई भी राजनीतिक दल युवाओं को लेकर गंभीर नहीं है। छत्तीसगढ़ में भी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश की मेहनत पर पानी फेर कर टी एस सिंहदेव को महत्व दिया जा रहा था। राहुल-सोनिया के करीबी ताम्रध्वज साहू भी दाल-भात में मूसलचंद की तरह प्रकट हो गए। राजस्थान में अशोक गहलोत मुख्यमंत्री घोषित हो गए हैं। सचिन पायलट को उप मुख्यमंत्री का दायित्व सौंपा जा रहा है। सोनिया गांधी हरगिज नहीं चाहतीं कि युवाओं की पीढ़ी मजबूत हो और राजनीति में मजबूत होकर निकट भविष्य में राहुल गांधी के लिए चुनौती बने। सचिन के पिता राजेश पायलट ने भी राजीव गांधी की नीतियों का विरोध किया था।अपनी अलग पार्टी तक बना ली थी।सचिन पायलट में अपने पिता के गुण नहीं होंगे,यह कैसे कहा जा सकता है? सचिन पायलट सोनिया गांधी की पसंद कभी नहीं रहे। वह तो राहुल गांधी थे जिसने गुर्जरों का वोट पाने के लिए सचिन को और ब्राह्मणों का वोट पाने के लिए सी पी जोशी को जोड़ रखा था।

कांग्रेस की शुरू से ही इस्तेमाल कर दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंकने की नीति रही है। पार्टी में लोकतंत्र और परिवार की बात करने वाली कांग्रेस में एक परिवार का ही निर्णय थोपा जाता है। कांग्रेस विधायकों ने आपत्ति भी उठाई है कि जब मुख्यमंत्री का निर्णय आलाकमान को ही लेना है तो विधायक दल की बैठक का क्या औचित्य है? तर्क यह दिया जा रहा है कि अनुभवी को वरीयता दी जा रही है। चिकित्सा वैज्ञानिक भी मानते हैं कि 30 की आयु के बाद ही मन खीस होने लगता है। तीस भयो मन खीस भयो।50 की उम्र के बाद तो याददाश्त भी कम होने लगती है,काम करने की क्षमता कम हो जाती है।राहुल गांधी खुद पचास के होने जा रहे हैं । वे खुद को युवा कह रहे हैं। बलिया बागी चंद्रशेखर बुढ़ापे में भी युवा तुर्क नेता कहे जाते रहे। राजनीति में युवा होना शायद सुविधा के सन्तुलन पर निर्भर करता है।

कांग्रेस खुद को गरीबों की हितैषी कहती है। युवाओं की पार्टी कहती है लेकिन उसने सर्वाधिक वृद्धों को टिकट दिया है।उसके मुकाबले बहुत कम युवकों को टिकट दिया गया। कांग्रेस के जीते विधायकों में ज्यादातर करोड़पति हैं। लखपति तो कम ही हैं। शायद नहीं के बराबर हैं। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के 60 में से 49 विधायक करोड़पति हैं।35 से कम उम्र के केवल 7 विधायक हैं। 35 से 40 साल के केवल 9 विधायक हैं।40 से 50 के बीच के 23 और 60 से ऊपर के 20 विधायक चुने गए हैं। राजस्थान में सौ में से 82 कांग्रेसी विधायक करोड़पति हैं। इस चुनाव में 35 से कम आयु के सिर्फ 17 विधायक चुने गए हैं।35 से 40 साल के 11 विधायक,41 से 50 के 51 और 51 से 60 साल के 62 विधायक चुने गए हैं। जबकि 61 से 70 के बीच के 57 विधायक चुने गए हैं।मध्यप्रदेश में कांग्रेस के 114 विधायकों में 84 करोड़पति हैं। जबकि शेष की आय एक करोड़ से कुछ ही कम है। मध्य प्रदेश में सभी दलों के चुने गए विधायकों में34 साल की उम्र के केवल14 विधायक हैं।35 से 40 साल के 21 और 41 से 50 साल के 58 विधायक चुने गए हैं। 51 से 60 साल के 87 और 61 से 70 साल के41 विधायक चुने गए हैं। युवाओं के विधायक बनने की यह तादाद बताती है कि युवाओं को लेकर कांग्रेस समेत राजनीतिक दल कितने गंभीर है। अशोक गहलोत और कमलनाथ की उम्र रिटायर होने की है।लेकिन यह इस देश का दुर्भाग्य है कि राजनीति में कोई रिटायर होना ही नहीं चाहता। कब्र में पांव पड़ने तक लोग मलाईदार पदों पर जमे रहना चाहते हैं। गहलोत और कमलनाथ की ताजपोशी तो इसी बात का इंगित है । ऐसे में 21वीं सदी युवाओं की कैसे होगी,इस सवाल का जवाब संभवतः किसी के भी पास नहीं है। विधायकों की तादाद युवाओं को आगे ले जाने को लेकर राजनीतिक दलों की गंभीरता का आकलन करने के लिए ये आंकड़े काफी हैं।छत्तीसगढ़

विधानसभा के कुल 519 नवनिर्वाचित विधायकों में से 400 करोड़पति हैं। इनमें सबसे ज्यादा 53% यानी 215 विधायक कांग्रेस के और 40% यानी 158 विधायक भाजपा के हैं। तीनों राज्यों में सबसे ज्यादा 175 करोड़पति विधायक मध्यप्रदेश से हैं। इसी तरह राजस्थान के 156 और छत्तीसगढ़ के 69 विधायक करोड़पति हैं। जब तक विधानसभा में गरीबों का प्रतिनिधित्व नहीं होगा,तब तक उनकी बात,उनकी समस्याएं विधान सभा में उठेंगी कैसे? जाके पैर न फटी बेवाई,सो का जाने पीर पराई। मीरा बाई ने लिखा है कि घायल की गति घायल जानै की जिन घायल होय।युवाओं,गरीबों और किसानों,मजदूरों के हितों का राग अलापने वाले राजनीतिक दलों को यह तो सोचना होगा कि जब सदन में उक्त वर्गों का प्रतिनिधित्व ही नहीं होगा तो उनके हित की योजनाएं कितनी स्वाभाविक होंगी?कमलनाथ पर 84 के सिख दंगों में शामिल होने का भी आरोप है।शिरोमणि अकाली दल ने उनकी ताजपोशी का विरोध भी किया था,इसके बाद भी कमलनाथ की ताजपोशी यह बताती है कि वह अपराध और अपराधी से गुरेज नहीं करती। जन भावनाओं के लिए कांग्रेस में कोई जगह नहीं है। उसके लिए उसके अपने हित से बड़ा कुछ भी नहीं है। (हिंस)

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स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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