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ये नहीं है सेमी फाइनल बनाम फाइनल

वीरेन्द्र सिंह परिहार

ये नहीं है सेमी फाइनल बनाम फाइनल

हाल में सम्पन्न हुए पांच राज्यों के विधान सभा चुनावों के जो परिणाम आए, उनमें यदि तेलंगाना और मिजोरम को छोड़ दें तो शेष तीन राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान, और छत्तीसगढ़ के चुनाव नतीजों को लेकर राजनीतिक पंडितों में ही नहीं, आम जन में भी चर्चाओं का बाजार गरम है। राजनीतिक क्षेत्रों में इस बात की जोरदार चर्चा है कि तीनों राज्यों के चुनाव लोकसभा चुनावों के पूर्व सेमी फाइनल थे। चूंकि भाजपा इन तीनों राज्यों में चुनाव हार चुकी है, और ऐसी स्थिति में बहुत लोगों का कहना है कि इस तरह से भाजपा सेमी फाइनल मैच हार चुकी है, जिसका असर फाइनल मैच अर्थात लोकसभा चुनाव पर भी पड़ेगा। इन लोगों का यह भी कहना है कि इन तीनों राज्यों में कांग्रेस की वापसी से प्रधानमंत्री मोदी का कांग्रेस मुक्त भारत का सपना तो चकनाचूर हुआ ही है, प्रधानमंत्री मोदी की कुर्सी को भी खतरा बढ़ गया है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि इन चुनावों से यह भी साबित हो चला है कि राहुल गांधी की स्वीकार्यता मतदाताओं में बढ़ चली है और उनका नेतृत्व दूसरे विपक्षी दलों को भी स्वीकार्य होने की संभावना बहुत कुछ बढ़ गई है।

इन तथ्यों पर चर्चा के पहले विचार का विषय यह है कि आखिर में इन तीनों राज्यों में भाजपा क्यों हारी। कहने वाले यह भी कहते हैं कि 15 वर्षों के सत्ताविरोधी कारकों के चलते भाजपा मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में हारी तो राजस्थान में पांच वर्षों में सत्ता परिवर्तन की परंपरा है। कहने वाले तो यहां तक कहते हैं कि ये पराजय प्रधानमंत्री मोदी की निजी पराजय है। इन चुनावों ने यह साबित कर दिया है कि मोदी एवं अमित शाह का विजय रथ रुक चुका है और उनकी उल्टी गिनती शुरू हो चली है।

भाजपा सरकारों की पराजय के पीछे एन्टी इनकम्बेन्सी की बात वैसे ही की जाती है, जैसे यह कोई सहज एवं स्वाभाविक प्रक्रिया हो। हकीकत में सत्ता विरोधी कारक वहीं प्रभावी होते हैं, जहां सत्ता का उपयोग जनसेवा के लिए न होकर निजी स्वार्थों के लिए होता है। यह बात भी सच है कि कांग्रेस पार्टी के राज में सत्ता का दुरुपयोग होता था, और शासन-प्रशासन जागीरदारी की तर्ज पर चलाया जाता था। अपनी कमियों को छिपाने के लिए कांग्रेस सत्ता विरोधी कारक के तर्क का सहारा लेती थी। अब यदि इसी तर्क का सहारा भाजपा ले तो इसे कहां तक उचित कहा जा सकता है? अगर ऐसा था भी तो मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा 15 वर्षों तक क्यों राज करती रही?

इन संदर्भों में राजस्थान के बारे में यह कहना जरूरी है कि राजस्थान में भाजपा वसुंधरा राजे के महारानी जैसे कार्य करने के अंदाज के चलते हारी। वह केन्द्रीय नेतृत्व को भी अनदेखा करती रहीं। जहां तक छत्तीसगढ़ एवं मध्य प्रदेश का सवाल है, वहां मध्य प्रदेश में करीब-करीब बराबरी का मुकाबला रहा। छत्तीसगढ़ में जरूर भाजपा बुरी तरह पराजित हुई और कांग्रेस के मुकाबले वह एक चौथाई सीटें भी नहीं ला पाई। जानकार लोगों का कहना है कि चाहे मध्य प्रदेश हो या छत्तीसगढ़, कई लोक कल्याणकारी योजनाएं लागू होने के बाद भी ये दोनो राज्य सुशासन की कसौटी पर खरे नहीं कहे जा सकते। कई लोग तो बातचीत में यहां तक कह देते हैं कि भाजपा सरकारों में कांग्रेस से ज्यादा भ्रष्टाचार था, पर यह वैसी ही बात है जैसा कांग्रेस के राज में लोग कहते थे कि इससे अच्छा राज्य तो अंग्रेजों का था। इसमें तथ्यात्मक सच्चाई नहीं थी, फिर भी इन सरकारों के दौरान नौकरशाही तो भ्रष्ट थी ही, मंत्री भी अमूमन भ्रष्ट थे। अलबत्ता कार्यकर्ताओं को जरूर ईमानदारी का पाठ पढ़ाया जाता था। विधायकों पर पार्टी का समुचित नियंत्रण नहीं था, और कई विधायकों का व्यवहार स्वेच्छाचारिता से परिपूर्ण था। मुख्यमंत्रियों पर सीधे भ्रष्टाचार के आरोप भले न हों, पर मुख्यमंत्री के परिजन को लेकर तरह-तरह की बातें हवा में तैरती रहती थीं। फिर भी भाजपा के लिए राहत की बात यह कि मध्य प्रदेश में मुकाबला बराबरी का था, लेकिन सत्ता तो उससे छिन ही गई।

रहा सवाल इस बात का कि आने वाले लोकसभा चुनावों में क्या यह भाजपा की स्थिति के कमजोर होने का लक्षण है। ऐसा कहना उचित नहीं होगा कि इन चुनाव परिणामों से मोदी या केन्द्र सरकार की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। फिर भी बड़ा सच यही है कि ये चुनाव परिणाम मूलतः राज्य सरकारों और उनकी कार्यप्रणाली के विरूद्ध थे। जहां तक प्रधानमंत्री मोदी का प्रश्न है, उनके चुनाव-अभियान ने भाजपा को कुछ मदद ही दिलाई होगी, नहीं तो हार का अंतर और ज्यादा हो सकता था।

भाजपा ने एक बड़ी गलती और भी की। सारा रिपोर्ट कार्ड होते हुए भी जितने मंत्रियों और विधायकों का टिकट काटना चाहिए था, उतने का काटने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। यहां तक कि इस मामले में उसने संघ की सलाह को भी अनसुना कर दिया। प्राप्त खबरों के अनुसार इस संबंध में शिवराज सिंह चौहान की विशेष भूमिका रही। वरना मध्य प्रदेश जैसे राज्य को बचाने की उम्मीद की जा सकती थी। निःसंदेह इन चुनावो में एस.सी.-एस.टी. एक्ट एवं प्रमोशन में आरक्षण जैसे मुद्दों ने भी कुछ हद तक प्रभावित किया जो भाजपा की हार के कारण बने। शायद भाजपा की समझ में आ गया होगा कि उसने दबाव में आकर जल्दबाजी के चलते एस.सी., एस.टी. एक्ट में सर्वोच्च न्यायालय के संशोधन आदेश को उलटा। यह पूरी तरह तो नहीं पर आंशिक तौर पर कुछ ऐसी ही गलती थी-जैसे राजीव गांधी ने शाहबानों प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को उलटकर तुष्टिकरण की पराकाष्ठा कर दी थी। यद्यपि यह बात भी सच है कि इन चुनावों में एस.सी.-एस.टी. तबके का अच्छा-खासा समर्थन भाजपा को मिला, पर इसका कारण एस.सी.-एस.टी. एक्ट न होकर शासन की योजनाएं थीं, जिनके चलते उन्हें एक मानवीय जिंदगी जीने का एहसास हो चला है। इस तरह भाजपा ने सवर्ण मतदाता या अपने कोर वोट को नाराज कर दिया, जो कतई उचित नहीं था।

इन चुनावों को लोकसभा चुनावों का सेमीफाइनल बताने वालों को समझना होगा कि किसी राज्य में सरकार बदलने से अमूमन लोकसभा चुनावों पर असर नहीं पड़ता। इसका सबसे बड़ा उदाहरण वर्ष 1996, 1998, 1999 के लोकसभा चुनाव हैं। यह तो सभी को पता है कि वर्ष 1993 से 2003 तक प्रदेश में कांग्रेस की दिग्विजय सरकार थी। लेकिन वर्ष 1996, 1998, 1999 के लोकसभा चुनावों में अधिकांश सीटें भाजपा को मिलीं। दिग्विजय सिंह को इस बात का मलाल भी रहता था कि लोकसभा चुनावों में प्रदेश में उनकी पार्टी इतना पीछे क्यों रह जाती है। इसी तरह से वर्ष 1991 के लोकसभा चुनावों में प्रदेश में भाजपा की सुंदरलाल पटवा की सरकार थी, फिर भी अधिकांश सीटों पर कांग्रेस विजयी हुई थी। लोगों को यह भी पता होगा कि वर्ष 2008 में मध्यप्रदेश, राजस्थान एवं छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकारें होने के बावजूद अच्छी खासी संख्या में कांग्रेस ने सीटें जीती थीं। लाख टके की बात यह कि लोकसभा चुनावो में प्रधानमंत्री मोदी चेहरा होंगे और कई सर्वेक्षण और दूसरे माध्यम बताते हैं कि मोदी की लोकप्रियता में कोई बहुत अंतर नहीं पड़ा है। हो सकता है कि हिन्दी राज्यों में भाजपा को कुछ नुकसान उठाना पड़े, जिसकी भरपायी वह पष्चिम बंगाल ओर उड़ीसा तथा पूर्वांचल से कर लेगी। हकीकत यह भी है कि केन्द्र की कई जनहितकारी योजनाओं के चलते ही मध्य प्रदेश में मुकाबला बराबरी में रहा। राजस्थान में भी कांग्रेस के पक्ष में एकतरफा नतीजे नहीं आए। मध्यप्रदेश में तो भाजपा को 42 प्रतिशत मत मिले, जबकि कांग्रेस को 41.9 प्रतिशत मत ही मिले। इसी तरह राजस्थान में भाजपा का वोट प्रतिशत मात्र एक प्रतिशत कम रहा। वस्तुतः यह मोदी विरोधियों, भाजपा विरोधियों एवं मीडिया के एक वर्ग का एक हौआ मात्र है कि ये चुनाव सेमीफाइनल थे। अलवत्ता इन चुनावों को भाजपा की दृष्टि से एक दुःस्वप्न जरूर कहा जा सकता है। (हिंस)

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स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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