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कश्मीर के नागरिक तो शांति ही चाहते है

-अशोक श्रीवास्तव

कश्मीर के नागरिक तो शांति ही चाहते है

लगभग 40 दिन हुए जब केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार ने अचानक एक दिन सुबह संसद में ऐलान करके जम्मू-कश्मीर को अनुच्छेद 370 और 35 ए से आज़ाद कर दिया था। हालांकि मेरे जैसे बहुत से पत्रकार जो खुद को जम्मू-कश्मीर मामलों का जानकार मानते हैं उन्हें भी लगता था कि 370 को हटाना लगभग असंभव जैसा है। कश्मीर के बहुत से नेता एक बार नहीं बार-बार यह धमकी दे चुके थे कि 35 ए और 370 को हटाया तो देश जल जाएगा, कश्मीर में कोई भारत का झंडा उठाने वाला नहीं मिलेगा..वगैरह, वगैरह ! लेकिन जब 5 और 6 अगस्त को संसद के दोनों सदनों ने मोदी सरकार के ऐतिहासिक फैसले पर मुहर लगा दी तब न तो संसद में शोले भड़के और न ही देश में आग लगी। मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने जिस सतर्कता, सावधानी और बुद्धिमत्ता से इस काम को अंजाम दिया था उसने सरकार के विरोधियों को कुछ करने का मौका ही नहीं दिया। यहाँ तक कि जो लोग कश्मीर जलाने की धमकियां दे थे वे भी कैंडल लाइट मार्च निकाल कर बुझ गए।

एक रिपोर्टर के तौर पर मैं 1993 से कश्मीर की रिपोर्टिंग करता रहा हूँ, इसलिए इस मौके को भला मैं कैसे छोड़ सकता था। 7 अगस्त की सुबह पहली ही फ्लाइट पकड़ कर मैं श्रीनगर पहुंच गया। फ्लाइट पकड़ने के लिए जब मैं एयरपोर्ट पहुंचा तब मन में तमाम तरह के ख्याल आ रहे थे कि कश्मीर के लोग 370 हटाने के फैसले पर क्या सोच रहे होंगे ? क्या वास्तव में कश्मीर जल रहा है या जलने लगेगा ? ये सब सोच ही रहा था कि एयरपोर्ट पर एक कश्मीरी युवक से बातचीत होने लगी। दिल्ली की एक आई टी फर्म में काम करने वाला ये कश्मीरी युवक ईद की छुट्टियों पर घर जा रहा था। जब मैंने उनसे पूछा कि 370 हटने पर क्या होगा तो उन्होंने कहा ," हम लोग कश्मीर में बुरे से बुरा दौर देख चुके हैं। अब और क्या बुरा होगा ? दुआ करते हैं कि इस फैसले से कश्मीर के लिए कुछ अच्छा हो जाए !"

उस कश्मीरी युवक के इस बयान ने मेरे मन में उम्मीद की किरण जगा दी। पर जब श्रीनगर हवाई अड्डे से निकल कर ज़ीरो ब्रिज के पास स्थित अपने आफिस पहुंचा तो पूरे रास्ते सन्नाटा पसरा पड़ा था। तमाम तरह की आशंकाओं ने फिर से मुझे घेरना शुरू कर दिया। दूरदर्शन के श्रीनगर दफ़्तर में उपस्थिति कम थी लेकिन जो भी कश्मीरी मुझे वहां मिले उनमें से किसी के चेहरे पर गम या गुस्से का कोई भाव नहीं दिखाई दिया। लेकिन क्या ऐसा इसलिए है क्योंकि वो तो दूरदर्शन के कर्मचारी हैं ? इस सवाल का जवाब मैं जल्दी से जल्दी ढूंढ लेना चाहता था और इसके लिए ज़रूरी था कि मैं श्रीनगर शहर में निकलूं और स्थानीय लोगों से मिलूं। इसलिये जल्दी से दोपहर का भोजन करके मैं अपनी कैमरा टीम के साथ श्रीनगर शहर में निकल गया। लाल चौक, हब्बाकदल में सन्नाटा था फिर डल गेट की तरफ निकला, वहां कुछ फ़ल वाले सड़क किनारे खड़े थे और कुछ लोग खरीदारी कर रहे थे मैंने वहीं से रिपोर्टिंग की और जैसा आमतौर पर होता है जब मैं रिपोर्टिंग कर रहा था तब वहां कई लोग रुक कर देखने लगे, सुनने लगे कि मैं क्या कह रहा हूँ। कुछ लोगों से मैंने बात करने की कोशिश की पर उस दिन न तो किसी ने कुछ बात की न मुझसे कुछ कहा। ज़्यादातर लोगों के हाव भाव से मुझे लगा कि उन्हें यह विश्वास ही नहीं हो पा रहा है कि जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म हो गया है। जिस वक्त मुझे यह लगा कि श्रीनगर में कोई भी 370 के मुद्दे पर ऑन कैमरा बोलने को तैयार नहीं होगा उसी वक्त दो कश्मीरी महिलाओं ने मुझसे पूछा कि आप कहाँ से आये हैं । मैंने कहा -दिल्ली से और उनसे बात करनी शुरू की। मैंने यूँ ही कहा कि आपका कश्मीर बहुत खूबसूरत है तो उनमें से एक ने कहा कि हाँ बीते दो दिन से और खूबसूरत हो गया है। ये सुनकर मेरे कान खड़े हो गए। उस महिला का इशारा 370 हटने के फैसले की तरफ था। मैंने झट से पूछा कि आप कैमरे पर बात करेंगी। उसने कहा ज़रूर करूंगी लेकिन मेरी पहचान छुपा कर रखियेगा क्योंकि यहां बहुत बदमाश लोग हैं पत्थरबाज हैं आतंकी हैं सब टारगेट करना शुरू कर देंगे। मैं समझ गया, कश्मीर का सच यही है । बीते 30 सालों में दिल्ली में बैठे हुक्मरानों ने भारत को गालियाँ देने वालों,तिरंगा जलाने वालों को वीआईपी ट्रीटमेंट दिया है, सुरक्षा दी है उनके बच्चों को सरकारी नौकरियां दी हैं और भारत के पक्ष में बोलने वालों को हमेशा नज़रंदाज़ किया है। इसलिए ऐसी आवाज़ें वहां या तो खामोश रहती हैं या बोलती हैं तो अपनी पहचान छुपा कर। मैंने भी उस महिला की पहचान छुपा कर खूब बात की और उस कश्मीरी महिला ने खुल कर 370 हटाने के फैसले पर खुशी जताई।

कुछ देर बाद डल गेट से मैंने सेब खरीदे और फिर शहर में घूमता हुआ वापस आ गया और दिल्ली के लिए अपनी स्टोरी फ़ाइल कर दी।

इतने सालों से मैं लगातार कश्मीर आता जाता रहा हूँ , इसलिए वहां मेरे कई दोस्त बन गए हैं। उनमें से कई ऐसे हैं जो जान जोखिम में डालकर भी हमेशा अलगाववादियों और आतंकवादियों के खिलाफ आवाज़ उठाते रहे हैं। मैं उनसे मिलकर उनके मन की बात जानना चाहता था, लेकिन मिलता कैसे घर का पता मेरे पास था नहीं और मोबाइल फोन ,लैंडलाइन सभी बन्द कर दिए गए थे। मुझे एहसास हुआ कि फोन बंद होने से स्थानीय लोग भी कितनी तकलीफ में होंगे। लेकिन अगर फोन चालू होते तो क्या कश्मीर में इतनी शांति होती ? हरगिज़ नहीं।

दरसअल कश्मीर में मोबाइल फोन, इंटरनेट , व्हाट्सएप अलगाववादियों और आतंकवादियों के सबसे बड़े हथियार हैं। जब भी कश्मीर में दंगा भड़काना हो, पत्थरबाज़ी करवानी हो तो अलगाववादियों और स्टोन पेल्टर्स के नेता पहले सोशल मीडिया और फोन पर मैसेज के ज़रिए अफवाहें फैलाते हैं जैसे -फलां जगह सेना ने सड़क पर क्रिकेट खेलते कश्मीरी युवक को गोली मार दी है, या -फलां जगह पर पुलिस ने घर में घुस कर एक कश्मीरी लड़के को उठा लिया है। फिर दूसरा संदेश सर्कुलेट किया जाता है - पुलिस या सेना की इस कार्रवाई के विरोध में फलां जगह पर इतने बजे सब लोग इकट्ठा होकर विरोध करेंगे। और बस विरोध के लिए निर्धारित उस जगह पर उतने बजे स्टोन पेल्टिंग शुरू हो जाती है । जिस वक्त ये स्टोन पेल्टिंग हो रही होती है, उस समय कुछ लोग मोबाइल पर इसकी वीडियो बनाने के काम में लगे होते हैं। और देखते ही देखते स्टोन पेल्टिंग की ये क्लिपिंग्स कश्मीर के कोने कोने से लेकर पाकिस्तान-अमेरिका-ब्रिटेन के चुनिंदा पत्रकारों -मानवाधिकारवादियों -बुद्धिजीवियों तक पहुंच जाती हैं। और इस तरह कश्मीर जलने लगता है।दुर्भाग्य से इस स्टोन पेल्टिंग के निशाने पर आए सुरक्षा बलों के जवानों के हाथों पैलेट गन या रायफल चल गई और कोई कश्मीरी युवक उसकी चपेट में आ गया तो ये तय है कि जो आग लगेगी उसे कई हफ्तों तक बुझाना नामुमकिन है। और भारत और दुनिया के कुछ कथित बुद्धिजीवियों ,पत्रकारों को ये मसाला मिल जाएगा कि भारत कश्मीर में मानवाधिकारों का हनन कर रहा है। कश्मीर में यही सिलसिला बरसों से चल रहा है। इसलिए 370 को हटाने का ऐलान करने और इस फैसले को लागू करने से पहले केंद्र सरकार ने टेलीफोन लाइन्स बन्द करने का कठोर फैसला लिया। जम्मू-कश्मीर के आम लोगों को इससे तकलीफ ज़रूर हुई पर ये तकलीफ किसी की जान जाने से ज़्यादा नहीं। केंद्र सरकार के ऐहतियातन कदमों का ही असर है कि बीते लगभग 40 दिनों में सुरक्षाबलों को आतंक और अलगाववाद से पीड़ित घाटी में एक गोली नहीं चलानी पड़ी। दूसरी तरफ बौखलाए आतंकियों और दंगाईयों ने 4 कश्मीरियों की हत्या कर दी। हिजबुल मुजाहिद्दीन के आतंकियों ने 65 साल के गुलाम मोहम्मद मीर की सिर्फ इसलिए हत्या कर दी क्योंकि वो अपनी रोज़ी रोटी चलाने के लिए दुकान खोलना चाहता था। इसी तरह से आतंकियों ने सेब के उत्पादन से जुड़े एक व्यापारी के घर में घुस कर 4 साल की बच्ची सहित 4 लोगों को तब गोली मार दी जब उस व्यापारी ने आतंकियों की धमकियों के बावजूद सेब की खेप को बेचने की कोशिश की।

पर विडम्बना देखिए कि मानवाधिकारों के जो कथित समर्थक मोबाइल फोन बंद होने पर छातियाँ पीट रहे हैं वो तब खामोश हो जाते हैं जब आतंकी दुकान खोलने पर 65 साल के दुकानदार को और सेब बेचने पर व्यापारी की 4 साल की बच्ची को गोली मार देते हैं।

बहरहाल मानवाधिकारों के नाम पर, कश्मीर के नाम पर भारत ही नहीं, दुनिया भर में एमेनेस्टी जैसे कितने ही संगठनों और व्यक्तियों की दुकानें चल रही हैं। 370 हटते ही इन "दुकानों" पर ताला लगने की नौबत आ गई है इसलिए इन सभी लोगों ने इन दिनों कश्मीर के नाम पर ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाना और फेक न्यूज़ फैलाना शुरू कर दिया है। कभी कश्मीर में अत्याचार के नाम पर गाज़ा -ईरान-इराक युद्ध की तो कभी कश्मीर की ही पुरानी तस्वीरें , वीडिओज़ मीडिया और सोशल मीडिया में वायरल किये जा रहे हैं, तो कभी यह झूठ फैलाया जा रहा है कि कश्मीर में अखबार नहीं छप रहे,पत्रकारों को काम नहीं करने दिया जा रहा, लोगों को दवाईयां नहीं मिल रहीं वगैरह, वगैरह।

370 हटने के बाद मैं 10 दिन श्रीनगर में था।सिर्फ श्रीनगर ही नहीं उत्तर कश्मीर में कुपवाड़ा और दक्षिण कश्मीर में अनंतनाग तक जाकर मैंने रोज़ रिपोर्टिंग की। मैं यह तो नहीं कहूंगा कि वहां के ज़्यादातर लोग 370 हटने से खुश हैं, जम्मू और लद्दाख के लोगों की तरह नाच-गाकर खुशी मनाना चाहते हैं पर ज़्यादातर कश्मीरियों को इसके हटने से कुछ फर्क भी नहीं पड़ रहा। कुपवाड़ा, हंदवाड़ा जैसे इलाकों में रहने वाले ग्रामीण कश्मीरियों को तो पता ही नहीं था कि 370 क्या बला है। इसके अलावा मेरे बार-बार पूछने पर भी ज़्यादातर कश्मीरी यह नहीं बता सके कि 370 था तो उसका उन्हें क्या फायदा मिल रहा था और अब हट गया है तो इसका उन्हें क्या नुकसान होगा। जिन कश्मीरी युवाओं से मैं 10 दिन में मिला उनमें से किसी को पता ही नहीं था कि 370 है क्या। कुछ कट्टरपंथी युवाओं ने कहा कि उनके बड़े-बुजुर्गों ने उन्हें बताया है कि 370 से उनकी अलग पहचान है और वो अपनी अलग पहचान बनाए रखना चाहते हैं। दुर्भाग्य से इस "अलग पहचान" के मायने कश्मीरी होना नहीं बल्कि मुस्लिम होना है।

370 हटने के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती इन कट्टरपंथी युवाओं को ही मुख्यधारा में शामिल करना है। 2 -3 दशकों से इन युवाओं के मन में मज़हब के नाम पर अलगाववाद और आतंकवाद का ज़हर भरा गया है। क्या केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर का तेज़ विकास करके इन युवाओं के मन से ज़हर निकाल पाएगी ? आने वाले महीनों और सालों में सबसे बड़ा सवाल यही होगा।

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Swadesh Digital ( 0 )

स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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