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कार्य संस्कृति पर असर डाल रही वेतन विसंगति

प्रधानमंत्री से ज्यादा वेतन तो कई राज्यों के मुख्यमंत्री और राज्यपाल पाते हैं।

कार्य संस्कृति पर असर डाल रही वेतन विसंगति

सियाराम पांडेय 'शांत'

कोई ऐसा राज्य नहीं, कोई ऐसा विभाग नहीं जहां वेतन विसंगति की समस्या न हो। इसका असर देश की विभागीय कार्य संस्कृति पर पड़ता है। मानव संसाधन और श्रम दिवसों का उचित उपयोग नहीं हो पाता। देश की सड़कों पर आए दिन आंदोलनों की गूंज सुनाई देती है। सड़कें बाधित होती हैं। जुलूसों और धरना-प्रदर्शन में सर्वाधिक का आधार वेतन विसंगति ही होती है। इस वेतन विसंगति के शिकार कर्मचारी और अधिकारी ही नहीं, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और राज्यपाल भी हैं। कई राज्यों के विधायक भी प्रधानमंत्री से अधिक वेतन पाते हैं। यह समस्या जटिल है। ऊपर से लेकर नीचे तक इसका प्रभाव है। अपने देश में 27 नक्षत्रों की मान्यता है। मनुष्य को भी अगर हम नक्षत्र मान लें तो देश में 27 तरह के इंसान पाये जाते हैं। ये 26 तरह के लोग ईश्वर के बनाए हुए नहीं हैं। ये मानव निर्मित व्यवस्था की उपज हैं। देश में 26 तरह के नागरिक हैं जिनमें आम नागरिक शामिल नहीं है। राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री आदि इन 26 नागरिकों की श्रेणी में आते हैं। इन्हें हम अतिविशिष्ट जन कह सकते हैं। जो एक बार अतिविशिष्ट हो गया, वह सामान्य जन की कोटि से ऊपर का इंसान हो जाता है। इतनी विषमताएं हैं, फिर भी हम समान नागरिक संहिता बनाने की बात कर रहे हैं। देश में वेतन विसंगति है। समान काम के समान दाम नहीं मिलते और हम आर्थिक विषमता दूर करने की बात करते हैं।

दिसम्बर 2018 तक देश में सरकारी और निजी क्षेत्र में नौकरी करने वालों की संख्या 39.70 करोड़ थी। रही बात वेतन विसंगति की तो यह पहले वेतन आयोग से लेकर सातवें वेतन आयोग की संस्तुतियों तक जारी है पहला वेतन आयोग 1946 में लागू हुआ था। आज हालात यह है कि प्रति एक लाख व्यक्ति पर 139 सरकारी कर्मचारी हैं। इन सरकारी कर्मचारियों में सर्वाधिक कर्मचारी डाक और रेलवे विभाग में कार्यरत हैं।

अब हम बात करते हैं प्रधानमंत्री के वेतन की, जो 2009 में एक लाख था। 2010 में बढ़कर एक लाख 35 हजार हुआ और 2012 में वह एक लाख 60 हजार हो गया था। जो अब तक वही है। यह और बात है कि 2018 में भी प्रधानमंत्री का वेतन बढ़ाने की बात हुई थी। प्रधानमंत्री से ज्यादा वेतन तो कई राज्यों के मुख्यमंत्री और राज्यपाल पाते हैं। यह स्थिति बहुत मुफीद नहीं है। दिल्ली में तो विधायक दो लाख 35 हजार रुपये का वेतन-भत्ता पा रहे हैं। तेलंगाना में विधायकों को सर्वाधिक ढाई लाख रुपये तक वेतन मिलता है। उत्तर प्रदेश में विधायकों को 1.87 लाख रुपये प्रतिमाह मिलते हैं। महाराष्ट्र में 1.70 लाख रुपये प्रतिमाह, जम्मू- कश्मीर और उत्तराखंड में विधायकों को प्रतिमाह 1.60 लाख रुपये वेतन मिलता है। मतलब अलग-अलग राज्यों में विधायकों के वेतन भी अलग-अलग हैं।

कुछ राज्यों के मुख्यमंत्रियों का वेतन तो 4 लाख रुपये तक पहुंच गया है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री का वेतन 4 लाख 10 हजार रुपये प्रतिमाह है। यह देश के विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों के वेतन से ज्यादा है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हर माह 3 लाख 90 हजार रुपये वेतन लेते हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री का वेतन 3.21 लाख रुपये है, जबकि उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्रियों का वेतन 3 लाख रुपये प्रतिमाह से अधिक है। 2 लाख रुपये से ज्यादा और तीन लाख रुपये प्रतिमाह से कम वेतन पाने वाले मुख्यमंत्रियों की सूची में हरियाणा, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, पंजाब, गोवा, बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और कर्नाटक राज्यों के मुख्यमंत्री शामिल हैं।

सबसे कम एक लाख पांच हजार पांच सौ रुपये वेतन त्रिपुरा के मुख्यमंत्री को मिलता है। मुख्यमंत्री का वेतन जहां इससे ज्यादा और दो लाख रुपये से कम है, उनमें ज़्यादातर उत्तर पूर्व के राज्य शामिल हैं। ओडिशा के मुख्यमंत्री का वेतन प्रधानमंत्री के वेतन के बराबर यानी 1.60 लाख रुपये है। इसमें संदेह नहीं कि यह पूरी तरह से राज्य की व्यवस्था और राजस्व की स्थिति से जुड़ा मामला है। देश के संविधान के अनुच्छेद 164 में यह विचार है कि मुख्यमंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है। राज्य की विधानसभा के निर्वाचित सदस्य विधायकों और विधायक दल के नेता के वेतन की राशि को लेकर निर्णय ले सकते हैं। जनप्रतिनिधियों के वेतन की विषमता इस ओर तो इशारा करती ही है कि उत्तर-पूर्व के राज्यों की आमदनी या आर्थिक हालात बहुत ठीक नहीं हैं। क्योंकि, उन राज्यों के मुख्यमंत्रियों के वेतन की राशि सबसे कम है। तेलंगाना, दिल्ली और उत्तर प्रदेश ऐसे राज्य हैं, जहां मुख्यमंत्रियों का वेतन राज्यपालों से ज्यादा है। भारत के प्रधानमंत्री का वेतन राष्ट्रपति के वेतन से कम होता है। देश के राष्ट्रपति का वेतन 5 लाख प्रतिमाह है। भत्ते अलग हैं। सेना में लंबे समय तक वन रैंक, वन पेंशन की समस्या बरकार थी। जिसका समाधान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल में हुआ था। निजी क्षेत्र में वेतन विसंगति आम बात है। लेकिन सरकारी क्षेत्र में तो समान पद, समान योग्यता के मामलों में समान वेतन मिलना ही चाहिए। लेकिन आज तक इस समस्या का समाधान नहीं हो पाया है। वेतन विसंगति का दायरा दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। जन प्रतिनिधि कानून बनाकर नौकरीपेशा लोगों को वेतन विसंगति के दलदल से बाहर निकाल सकते हैं। लेकिन, जब व्यवस्था के कुएं में ऊपर से ही भांग घुली हो तो फिर क्या कहा जाएगा?

सर्वोच्च न्यायालय भी इस मामले में सरकार को निर्देशित कर चुका है कि वह समान पद और समान योग्यता की स्थिति में समान वेतन भुगतान की प्रक्रिया सुनिश्चित कराए। लेकिन, ऐसा आज तक मुमकिन नहीं हो सका है। क्या विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों के वेतन में एकरूपता लायी जा सकती है? क्या प्रधानमंत्री का वेतन सम्मानजनक किया जा सकता है? जिस पर अक्सर चिंता व्यक्त की जाती रही है। प्रधानमंत्री की जिम्मेदारियां भी बहुत होती हैं। अनुशासन व्यवस्था बनाए रखने के लिए भी जरूरी है कि जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति का वेतन सामान्य जन प्रतिनिधि से अधिक होना चाहिए। जिस अधिकारी को अपने मातहत से कम वेतन मिलता है, उसका अवसादग्रस्त होना स्वाभाविक है। उसकी बात मातहत कम ही मानते हैं। इसलिए भी देश में एक सर्वमान्य वेतन नीति बननी चाहिए, जिसमें वरिष्ठता और कनिष्ठता का मुकम्मल ध्यान रखा जाए। वेतन किसे कितना दिया जाए, कितना नहीं, यह सरकार और निजी फर्म का नितांत वैयक्तिक मामला है, लेकिन वेतन निर्धारण से पूर्व उससे उत्पन्न होने वाले संकटों के प्रति भी सचेत होना चाहिए।

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