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सबरीमाला मंदिर : चिंता महिलाओं के हक की या धर्मांतरण की ?

कोर्ट के आदेश के सहारे मंदिर में दर्शन की कोशिश कर रही 50 वर्ष से कम उम्र की महिलाओं में कुछ मुस्लिम और ईसाई भी हैं।

सबरीमाला मंदिर : चिंता महिलाओं के हक की या धर्मांतरण की ?

सबरीमाला मंदिर को लेकर आस्था और न्याय की जंग जारी है। अब तो इसे राजनीतिक रूप भी दिया जा रहा है। कांग्रेस और भाजपा के विधायकों का केरल के मुख्यमंत्री द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठक से उठकर चले जाना इसी ओर इशारा करता है। मुख्यमंत्री पी.विजयन इस पूरे मामले को भाजपा की साजिश करार दे रहे हैं। कांग्रेस के खिलाफ उन्होंने एक शब्द भी नहीं कहा। इस तथ्य के मूल में जाने की जरूरत है।

सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्देश के बाद भी भगवान अयप्पा के भक्तों ने एक भी महिला को मंदिर में प्रवेश करने नहीं दिया है। 17 नवंबर से ढाई महीने तक चलने वाला पवित्र 'मंडल मकराविलाकु' माह शुरू हो रहा है। अभी तक 500 से ज्यादा महिलाओं ने केरल पुलिस की वेबसाइट पर इस बावत अपना पंजीकरण भी कराया है। ऐसे में मुख्यममंत्री द्वारा सर्वदलीय बैठक बुलाना उचित है लेकिन जरूरी नहीं कि उस बैठक के प्रस्तावों से सभी सहमत ही हों।

एक सप्ताह पहले कांग्रेस और भाजपा ने केरल में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरोध में प्रदर्शन किया था। फैसले में कोर्ट ने 10 से 50 वर्ष की बच्ची और महिलाओं को भी मंदिर में घुसने की अनुमति दी है। सर्वोच्च न्यायालय अपने निर्णय पर अडिग है। हर महिला को सबरीमाला मंदिर में दर्शन पाने का हक है लेकिन मंदिर की शुचिता का भी ध्यान दिया जाना चाहिए। केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी भी मंदिर की शुचिता पर बयान दे चुकी हैं। यह और बात है कि उनके बयान की आलोचना भी कम नहीं हुई। राज्य की बहुतेरी महिलाएं ऐसी भी हैं जो मंदिर की वर्षों पुरानी परंपरा के साथ हैं।

कोर्ट के आदेश के सहारे मंदिर में दर्शन की कोशिश कर रही 50 वर्ष से कम उम्र की महिलाओं में कुछ मुस्लिम और ईसाई भी हैं। सरकार को इस बावत अपना रुख जरूर स्पष्ट करना चाहिए। अब सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय को यथावत रखते हुए सुनवाई जनवरी तक के लिए टाल दी। मतलब निर्णय बरकरार है। महिलाएं 17 नवंबर से मंदिर में प्रवेश की जद्दोजहद करती रहेंगी। 28 सितंबर को इस बावत सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। केरल के सबरीमाला मंदिर में सभी महिलाओं को प्रवेश की अनुमति दे दी थी। चार-एक के बहुमत से हुए फैसले में पांच जजों की संविधान पीठ ने साफ कहा कि हर उम्र वर्ग की महिलाएं अब मंदिर में प्रवेश कर सकेंगी। अब सुनवाई जरवरी में होगी। सवाल यह उठता है कि अगर सुप्रीम कोर्ट जनवरी में अपने फैसले को बदल भी दे तो उससे क्या होगा? मंदिर की परंपराएं तो इस माह भी जारी हैं।

केरल में इस मुद्दे पर जमकर राजनीति हो रही है। भाजपा सबरीमाला को लेकर बेहद आक्रामक है वहीं कांग्रेस की प्रदेश इकाई भी कोर्ट के फैसले के विरोध में है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी गुड़ खाकर गुलगुले से परहेज वाली बात कर चुके हैं। उनका ममानना है कि किसी भी उम्र की महिला के मंदिर में प्रवेश पर रोक नहीं होनी चाहिए लेकिन राज्य इकाई का मत अलग है। यह क्या बात हुई। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पहले ही नसीहत दे चुके हैं कि सुप्रीम कोर्ट को ऐसे फैसले नहीं करने चाहिए, जिन्हें लागू न किया जा सके। इसमें संदेह नहीं कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सबरीमाला मंदिर में रजस्वला महिलाओं के प्रवेश को रोकने के लिए बड़े पैमाने पर उग्र प्रदर्शन हुए हैं और कुछ महिला कार्यकर्ताओं को प्रवेश से रोका गया है। तीन बार ऐसा हो चुका है और अब यह उनका चौथा प्रयास है। राज्य में वामदल की सरकार है जो चाहती है कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश लागू हो। कोच्चि के नेदुमबासरी हवाई अड्डे पर सामाजिक कार्यकर्त्ता तृप्ति देसाई को उनकी छह महिला साथियों के साथ भगवान अयप्पा के भक्तों के प्रबल विरोध के चलते बाहर ही निकलने नहीं दिया गया।

इस माहौल में केरल सरकार को अपनी भूमिका पर भी विचार करना चाहिए। भगवान अयप्पा का जन्म भगवान विष्णु के मोहिनी स्वरूप और भगवान शिव की वजह से हुआ था। उस समय तो भारत में इस्लाम धर्म का जन्म भी नहीं हुआ था, फिर सूफी संत बाबर भगवान अयप्पा के करीबी कैसे हो गए? सूफी संत बाबर उनके भक्त हो सकते थे, यह बात तो मानी जा सकती है। ऐसे में उनके मकबरे बाबर नाड़ा को मंदिर से जोड़ना कथमपि तर्कसंगत नहीं है। जब

इस मंदिर में सभी बिना किसी जाति भेद के जाते हैं तो इसमें इस्लाम और ईसाइयत के प्रवेश का तड़का लगाने की वाम दल सरकार को जरूरत क्यों पड़ गई, स्पष्ट तो यह भी होना चाहिए।

स्वामी अयप्पा मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के नाम पर चल रहे विवाद के बीच लगातार यह सवाल उठ रहा है कि आखिर इस मंदिर में ऐसा क्या है कि ईसाई और इस्लाम धर्मों को मानने वाले तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ता भी कम से कम एक बार यहां घुसने को बेताब हैं।

1980 से पहले तक सबरीमला के स्वामी अयप्पा मंदिर के बारे में ज्यादा लोगों को नहीं पता था। केरल और कुछ आसपास के इलाकों में बसने वाले लोग यहां के भक्त थे। 70 और 80 के दशक का यही वह समय था जब केरल में ईसाई मिशनरियों ने सबसे मजबूती के साथ पैर जमाने शुरू कर दिये थे। उन्होंने गरीबों और अनुसूचित जाति के लोगों को बरगलाकर बड़े पैमाने पर ईसाई बनाया । इसके बावजूद लोगों की मंदिर में आस्था बनी रही। इसका बड़ा कारण यह था कि मंदिर में पूजा की एक तय विधि थी जिसके तहत दीक्षा आधारित व्रत रखना जरूरी था। सबरीमला उन मंदिरों में से है जहां पूजा पर किसी जाति का विशेषाधिकार नहीं है। किसी भी जाति का हिंदू पूरे विधि-विधान के साथ व्रत का पालन करके मंदिर में प्रवेश पा सकता है।

यह मंदिर एक तरह से जाति-पाति को तोड़कर भगवान के हर साधक को वह उच्च स्थान देने का काम कर रहा था। यह कोई दूसरी संवैधानिक व्यवस्था कभी नहीं कर सकती है। सबरीमाला मंदिर में समाज के कमजोर तबकों की एंट्री और वहां से हो रहे सामाजिक बदलाव ने ईसाई मिशनरियों के कान खड़े कर दिए हैं। जिन लोगों को उन्होंने धर्मांतरित करके ईसाई बना लिया वे भी स्वामी अयप्पा में आस्था रखते हैं और कई ने ईसाई धर्म को त्यागकर वापस सबरीमाला मंदिर में 'स्वामी' के तौर पर दीक्षा ले ली। यही कारण है कि ये मंदिर ईसाई मिशनरियों की आंखों में लंबे समय से खटक रहा था। अमिताभ बच्चन, येशुदास जैसे कई बड़े लोगों ने भी स्वामी अयप्पा की दीक्षा ली है। यह भी एक वजह है कि परंपरा विरोधियों ने मंदिर में 10 से 50 साल तक की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को मुद्दा बनाकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका डलवा दी। यह याचिका कोर्ट में एक हिंदू नाम वाले कुछ ईसाइयों और एक मुसलमान की तरफ से डलवाई गई। 1980 में सबरीमला मंदिर के बागीचे में ईसाई मिशनरियों ने रातों रात एक क्रॉस गाड़ दिया था। फिर उन्होंने इलाके में परचे बांट कर दावा किया कि यह 2000 साल पुराना सेंट थॉमस का क्रॉस है इसलिये यहां पर एक चर्च बनाया जाना चाहिये। उस वक्त उस वक्त समाजसेवी जे शिशुपालन ने इस क्रॉस को हटाने के लिए आंदोलन किया था और उन्हें सफलता भी मिली थी। यह और बाद है कि आंदोलन की कीमत उनके नौकरी खोने के रूप में चुकानी पड़ी थी। राज्य में हिंदू धर्म को बचाने का यह आखिरी मौका माना गया है। केरल में गैर-हिंदू आबादी 35 फीसदी से भी अधिक हो चुकी है। अगर सबरीमाला की पुरानी परंपराओं को तोड़ दिया गया तो ईसाई मिशनरियां प्रचार करेंगी कि भगवान अयप्पा में कोई शक्ति नहीं है। ऐसे में 'चंद्र दर्शन' कराने वाली उनकी नकली दुकानों में भीड़ बढ़ेगी। नतीजा धर्मांतरण बढ़ सकता है। जिन हिंदू महिलाओं की बराबरी के नाम पर यह अभियान चलाया जा रहा है, वे खुद ही उन्हें रोकने के लिये मंदिर के बाहर दीवार बनकर खड़ी हैं। इसे क्या कहा जाएगा?

-- सियाराम पांडेय 'शांत'

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स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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