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रेगिस्तानीकरण से बचाकर एक जिले के कायाकल्प का जतन

मध्यप्रदेश में बीते डेढ़ दशक में किसी सेक्टर में क्रांतिकारी कार्य हुआ है तो वह सिंचाई क्षेत्र है।

रेगिस्तानीकरण से बचाकर एक जिले के कायाकल्प का जतन

-डॉ. नरोत्तम मिश्र

मध्यप्रदेश में बीते डेढ़ दशक में किसी सेक्टर में क्रांतिकारी कार्य हुआ है तो वह सिंचाई क्षेत्र है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी 23 जून को जिस मोहनपुरा वृहद सिंचाई परियोजना का लोकार्पण करने जा रहे हैं उसका कार्य महज 4 बरस पहले शुरू हुआ था। यह एक उपलब्धि मानी जाएगी। राजगढ़ जिले के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय लिखा जा चुका है। मैं पिछले दिनों इस कार्यक्रम की तैयारी देखने जब राजगढ़ पहुंचा तब स्थानीय बंधुओं ने बताया कि किसी समय राजगढ़ को पत्थरगढ़ कहा जाता था। नई सिंचाई परियोजनाओं से राजगढ़ से किसी मनुष्य को रोजगार के लिए पलायन नहीं करना होगा। वास्तव में ऐसी परियोजनाओं में पलायन जैसी समस्याओं का समाधान छिपा हुआ है। मध्यप्रदेश में सिंचाई क्षेत्र में समस्या गवर्नेंस की थी। जल उपभोक्ताओं संस्थाओं को सक्रिय करने और निर्मित जल क्षमता का उपयोग करने में मध्यप्रदेश सबसे आगे है। इस रेतीली, पथरीली और अन उपजाऊ धरती को उत्पादक भूमि में बदलने का करिश्मा मध्यप्रदेश की सरकार ने किया है।

वर्ष 2005 में नवम्बर माह की 29 तारीख को श्री शिवराजसिंह चौहान ने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इस दिन से मध्यप्रदेश में सिंचाई क्षेत्र के विस्तार के लिए जो ईमानदार प्रयास शुरू हुए उसकी वजह से आज मध्यप्रदेश कृषि क्षेत्र में इतनी उपलब्धियां अर्जित कर चुका है। रेगिस्तान वाले राज्य राजस्थान की सीमा से लगे हुए राजगढ़ जिले में मोहनपुरा वृहद सिंचाई परियोजना सारे क्षेत्र का नक्शा बदल देगी। कुल 3866.34 करोड़ लागत की इस परियोजना की सम्पूर्ण नहर प्रणाली से करीब सात सौ गांवों को सीधा लाभ होगा। परियोजना में बांध की कुल सकल भराव क्षमता 616.27 मिलियन घन मीटर है। सम्पूर्ण जिले में सिंचाई और पेयजल की सुविधा लोगों को प्राप्त होगी। कुल एक लाख 34 हजार 300 हेक्टेयर क्षेत्र में जल की अधिकतम क्षमता के फलस्वरूप सिंचाई का लाभ मिलेगा। रबी सत्र 2018-19 में सिंचाई शुरू करने के प्रयास किए गए है। बांध की पूर्ण भराव क्षमता पर डूब क्षेत्र 7056.718 हेक्टेयर है और 55 ग्राम प्रभावित हुए हैं।

डूब क्षेत्र में 22 ग्राम की आबादी पूरी तरह एवं 5 ग्राम की आंशिक रूप से प्रभावित हुई है जिनके विस्थापन और पुनर्वास का कार्य पूरा हो चुका है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नये स्थान पर विस्थापित ग्रामवासी अधिक बेहतर सुविधाओं के साथ रहने लगे हैं। राजगढ़ जिले में एक अन्य सिंचाई परियोजना कुंडलिया के बांध का निर्माण भी पूरा हो गया है। अगले वर्ष से 3450 करोड़ रुपए लागत की इस परियोजना से सवा लाख हेक्टेयर क्षेत्र को सिंचाई का लाभ मिलेगा। कुंडलिया मोहनपुरा से कुछ ही दूरी पर है। कुंडलिया परियोजना से राजगढ़ जिले की 65 हजार हेक्टेयर और आगर मालवा जिले की 60 हजार हेक्टेयर भूमि सिंचित होगी। यही नहीं पार्वती योजना की मंजूरी भी हो चुकी है, जिससे राजगढ़ और भोपाल जिले में कुल 48 हजार हेक्टेयर कृषि क्षेत्र में सिंचाई की जा सकेगी।

पार्वती नदी नरसिंहगढ़ के निकट है। इस परियोजना की लागत 1815 करोड़ रुपए है। इस तरह एक जिले में इन तीन सिंचाई परियोजनाओं की बदौलत जिले के करीब 4 लाख 28 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में से लगभग 3 लाख हेक्टेयर क्षेत्र सिंचित हो जाएगा। तीन चौथाई न कहकर हम यह कहें कि करीब-करीब पूरा जिला भरपूर पानी प्राप्त करेगा तो गलत न होगा। इस तरह राजगढ़ जिले के किसानों के घर समृद्धि की दस्तक पहुंच चुकी है। जिस तरह माननीय प्रधानमंत्री जी के लिए हर देशवासी के मन में बात चल रही है कि 'हर-हर मोदी, घर-घर मोदी।

ये जनता की भावना है। इसी ध्येय-वाक्य को अपनाते हुए मैं इस परियोजना और इस क्षेत्र के लिए ये कहूंगा कि घर-'घर गंगा, हर-घर चंगा तो गलत न होगा। यदि मध्यप्रदेश में सिंचाई सुविधाएं बढ़ाने का इतिहास देखें तो हम पाएंगे कि प्रथम बार वर्ष 1977 में जनता पार्टी सत्ता में आयी। सिंचाई की बड़ी-बड़ी परियोजनाओं का कार्य प्रारंभ किया गया। विंध्याचल की बाणसागर परियोजना का शिलान्यास 14 मई 1978 को मोरारजी देसाई तत्कालीन प्रधानमंत्री ने किया। बुंदेलखंड अंचल की बरियारपुर परियोजना का शिलान्यास 13 फरवरी 1978 को किया गया। महाकौशल अंचल में भी बावनथड़ी परियोजना का शिलान्यास नवंबर 1978 में श्री सखलेचा जी और महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री शरद पवार ने नवंबर 1978 में किया। वर्ष 1990 से 1992 के दौर में भी भाजपा शासन में सिंचाई क्षेत्र को प्राथमिकता दी गई। इसके बाद राज्य में वर्ष 2004 से सिंचाई के क्षेत्र पर सरकार ने विशेष ध्यान दिया। कृषि कैबिनेट गई। सौ दिवसीय कार्ययोजना बनाई गयी।

संकल्प के ज़रिये सिंचाई के लक्ष्य निर्धारित किये गये। किसान महापंचायत के जरिये किसानों की समस्याओं का आकलन किया गया। मंथन के जरिये अधिकारियों से चर्चा करके नियमों को सरल बनाया गया। इसका परिणाम है कि प्रदेश आज सिंचाई के क्षेत्र की प्रगति में देश में सबसे आगे है। मालवा की माही परियोजना, ग्वालियर की सिंध परियोजना, बुंदेलखंड की बरियारपुर परियोजना, विन्ध्याचल की बाणसागर एवं महान परियोजना, बालाघाट की बावनथड़ी परियोजना, छिंदवाड़ा की पेंच परियोजना को पूर्ण कराकर सिंचाई प्रारंभ की गई है। गांधी सागर बांध से 5 किलोमीटर अंडरग्राउंड नहर बनाकर मंदसौर जिले के भानपुरा, गरोठ में इस वर्ष से सिंचाई प्रारंभ की गई है।

यदि बात बड़े बांधों की करें तो इस वर्ष नवनिर्मित 5 बड़े बांध, मोहनपुरा, कुंडलिया, बानसुजारा, पारसडोह, हलोन में पहली बार जल संग्रह किया जायेगा। संभवत: हमारा प्रदेश देश का एकमात्र प्रदेश है जो एक ही वर्ष में 5 बड़े जलाशयों में जल संग्रह प्रारंभ कर रहा है। हमारी विकास यात्रा का श्रीगणेश 25 सितंबर 2006 को हुआ था, जब माननीय अटल बिहारी वाजपेयी जी ने बाणसागर परियोजना का लोकार्पण किया था। वर्ष 2004 से अब तक 8 बड़े, 25 मझौले और लगभग 2 हजार छोटे बांध बन चुके हैं। वर्ष 2004 तक प्रदेश में सात लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई होती थी जो बढ़कर 40 लाख हेक्टेयर हो गई है। हमारा लक्ष्य 80 लाख हेक्टेयर है ।

यह एक संयोग है कि हमारे प्रधानमंत्री जी स्वयं सिंचाई क्षेत्र पर विशेष ध्यान देते हैं। उन्होंने संकल्प दिया हर खेत को पानी और हमें सूत्र दिया 'पर ड्राप मोर क्रापÓ। हर खेत को पानी को पानी देने के उद्देश्य से हमने सारे संसाधन, सारी ताकत और जनता का साथ लेकर इसमें झोंक दी। हम साढ़े सात लाख से बढ़ाकर चालीस लाख लाख हेक्टेयर तक पहुंचे हैं और हमने अस्सी लाख हेक्टेयर का लक्ष्य रखा। वो आगामी 5-6 वर्षों में हम इसे पूरा कर लेंगे। हम जी-जान से इसे सार्थक करने में लगे हैं। प्रधानमंत्री जी ने जब 'पर ड्राप मोर क्रापÓ का नारा दिया, यह स्पष्ट हुआ कि वो दिन गए जब हम ज्यादा पानी से कम सिंचाई करें। अब उसी क्षमता से हम दुगने क्षेत्र में सिंचाई करने लगे हैं। हमारा सिंचाई क्षेत्र बढ़ा है। प्रति हेक्टेयर लागत भी उतनी ही रही हमारी परियोजनाओं में 3 से 4 लाख प्रति हेक्टेयर के भीतर आ रही, जिसमें बांध की लागत, पुनर्वास, किसान के खेत तक एक हेक्टेयर तक पानी पहुंचाने की पूरी लागत शामिल है। अब हम केवल माइक्रो इरिगेशन पर जा रहे हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार आज किसी क्षेत्र को रेगिस्तानीकरण से बचाना है तो जल प्रबंधन पर फोकस करना ही होगा। यदि लम्बे समय तक किसी भी इलाके की उपजाऊ भूमि का प्रबंधन सही तरीके नहीं होता तो वह इलाका रेगिस्तान में तब्दीाल होने लगता है। रेगिस्तानीकरण या मरूस्थलीकरण का सबसे गहरा प्रभाव उत्पादक क्षमता में कमी के रूप में देखा जाता है। जल इस पृथ्वी पर सभी के जीवन के लिए अनिवार्य है। पानी के समान बंटवारे के अभाव में भी आबादी को परेशान होना पड़ता है। बांधों के निर्माण से सिंचाई और पेयजल के बड़े काम आसान हो जाते है। यही नहीं उद्योगों की पानी की जरूरत भी पूरी होती है। बांध और जलाशय निकटवर्ती इलाकों के अन्य पेयजल स्रोत्रों को समृद्ध बनाते है। बाढ़ नियंत्रण, जल विद्युत उत्पादन, मनोरंजन और पर्यटन जैसे उद्देश्य भी बांध और जलाशय पूर्ण करते हैं। बहरहाल मध्यप्रदेश के राजगढ़ जिले को एक मॉडल के रूप में हमें स्वीकार करना होगा।

( लेखक मध्यप्रदेश के जल संसाधन, जनसम्पर्क, संसदीय कार्य मंत्री तथा राज्य सरकार के प्रवक्ता हैं। )


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स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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