Home > विशेष आलेख > राजनीति किस मोड़ पर ?

राजनीति किस मोड़ पर ?

आज की राजनीतिक परिस्थिति में केवल राजनीतिक कदम के लिए कई प्रकार के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं।

राजनीति किस मोड़ पर ?

आज की राजनीतिक परिस्थिति में केवल राजनीतिक कदम के लिए कई प्रकार के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। इस बात का भी किसी को ध्यान नहीं रहता कि उनके कारनामो से राष्ट्रहित कितना प्रभावित होता है और दुनिया में उनकी हरकतों का क्या प्रभाव होता है, राजनीतिक लक्ष्य राष्ट्र और समाज हित से परे हो जाता है तो फिर राजनीति देश के लिए संकट का कारण भी बन सकती है। राष्ट्र और समाज हित के नाम के राजनीति को किसी एक बिन्दु पर लिखने की अपेक्षा रहती है। राजनीति का भी धर्म राष्ट्र के लिए होता है। यदि नेतृत्व राष्ट्रहित को भी राजनीति की बलि चढ़ाने के लिए तत्पर होता है या राष्ट्रहित को राजनीति से विलोपित कर देता है तो ऐसी राजनीति राष्ट्र के लिए संकट का कारण बन जाती है। जिन जयचंद, मीर जाफर आदि गद्दारों के नाम सुनते हैं, उनके लिए अपना स्वार्थ सर्वोपरि था, उनके ध्यान में कभी नहीं आया कि उनके स्वार्थ प्रेरित कारनामो से देश कितना गहरे संकट में फंस जाएगा।

आज भारतीय राजनीति जिस मोड़ पर खड़ी है, उसमें इस सवाल का उत्तर तलाशना होगा कि राजनीति केवल दल हित के लिए है या इसका सरोकार राष्ट्रहित से है या नहीं? राजनीतिक धूर्तता का परिणाम जनजीवन और देश हित को प्रभावित कितना करेगा? गांधीजी ने भी कहा था कि बिना धर्म के राजनीति वैश्या के समान, क्या हम उसी ओर जा रहे है? इस बारे में जानने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की हत्या की साजिश के पुलिस को मिले पत्र के बारे में नेताओं की प्रतिक्रिया से यही लगता है कि नेतृत्व केवल अपने राजनीतिक स्वार्थ से अंधा है। प्रधानमंत्री पूरे देश का प्रतिनिधि है, जब वह प्रधानमंत्री हो जाता है तो वह केवल दल का नहीं रहता। उसके साथ देश की प्रतिष्ठा का सवाल जुड़ा रहता है, उसकी आवाज सवा सौ करोड़ लोगों की आवाज होती है।

ऐसी आवाज को कोई बंद करने की साजिश करता है तो यही आभास होता है, भारतीय राजनीति दिनोंदिन पथभ्रष्ट होती जा रही है, ऐसी राजनीति लोकतंत्र के लिए भी शुभ नहीं हो सकती। क्या हम शकुनी राजनीति के कपटजाल में फंस चुके है? नेतृत्व केवल अपने और अपने दल के लिए है? आरोपों की बौछार भी बिन बादल जैसी हो रही है, निराधार आरोपों से एक दूसरे को पटखनी देना ही कर्मकांड हो गया है। रा.स्व.संघ सामाजिक संगठन है। इसके कार्य और देशभक्ति पर कोई सवाल नहीं उठा सकता। चूंकि संघ के स्वयंसेवकों के नेतृत्व को जनता ने पसंद किया है, राहुल गांधी जैसे कांग्रेस के नेतृत्व को भाजपा संघ मय दिखाई देती है, यही कारण है कि भाजपा विरोधी को भाजपा में संघ के अलावा कुछ दिखाई नहीं देता। संघ को भी भाजपा की दृष्टि से देखते हैं।

गोपालदास मंगल, दतिया


Tags:    

Swadesh Digital ( 8810 )

स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


Share it
Top