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भारत में जनसंख्या नियंत्रण के लिए प्रधानमंत्री मोदी की पहल

भारत में जनसंख्या नियंत्रण के लिए प्रधानमंत्री मोदी की पहलFile Photo

स्वतंत्रता दिवस की 73वीं वर्षगांठ पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैसे तो अनेक मुद्दों को उठाकर देश की जनता को उनका समाधान निकालने का भरोसा जताया है। परंतु इसबार पहली मर्तबा शीर्ष स्तर पर मोदी ने जनसंख्या विस्फोट के परिप्रेक्ष्य में जागरुकता पैदा करने पर जोर दिया है। हालांकि उन्होंने कानून बनाकर इस विस्फोट को नियंत्रित करने की आवश्यकता नहीं जताई है। इसे हम मोदी की दूरदृष्टि भी कह सकते हैं क्योंकि यदि कानून की बात कही जाती तो कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दल इसे मुस्लिम आबादी पर हमला मानकर हल्ला मचाने की कोशिश करने लग जाते। बावजूद यह कोशिश अभी भी हो सकती है, दरअसल मुद्दाविहीन विपक्ष अब सरकार के उस हर फैसले के विरोध पर उतारू हो गया है, जो व्यापक देशहित में लिए गए हैं। अनुच्छेद-370 एवं 35-ए का समापन और तीन तलाक कानून बनाने का विरोध कर विपक्षी दल अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने में लगे हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिंदुओं की आबादी घटने पर कई बार चिंता जता चुका है। साथ ही हिंदुओं को ज्यादा बच्चे पैदा करने की सलाह भी संघ के सह कार्यवाहक देते रहे हैं। इन बयानों को अबतक हिंदु पक्षधरता के दायरे में समेटने की संर्कीण मानसिकता जताई जाती रही है। जबकि इसे व्यापक दायरे में लेने की जरूरत है। कश्मीर, केरल समेत अन्य सीमांत प्रदेशों में बिगड़ते जनसंख्यात्मक अनुपात के दुष्परिणाम कुछ समय से प्रत्यक्ष रूप में देखने में आ रहे हैं। कश्मीर में पुश्तैनी धरती से 5 लाख हिंदुओं का विस्थापन, बांग्लादेशी धुसपैठियों के चलते असम में जब चाहे तब दंगे होते रहते हैं। जबरिया धर्मांतरण के चलते पूर्वोत्तर राज्यों में बढ़ता ईसाई वर्चस्व ऐसी बड़ी वजह बन रही है, जो देश के मौजूदा नक्शे की शक्ल बदल सकती है। लिहाजा परिवार नियोजन के एकंगी उपायों को खारिज करते हुए आबादी नियंत्रण के उपायों पर नए सिरे से सोचने की जरूरत है।

हालांकि भारत में समग्र आबादी की बढ़ती दर बेलगाम है। 15 वीं जनगणना के हासिलों से साबित हुआ है कि आबादी का घनत्व दक्षिण भारत की बजाए उत्तर भारत में ज्यादा है। लैंगिक अनुपात भी लगातार बिगड़ रहा है। देश में 62 करोड़ 37 लाख पुरुष और 58 करोड़ 65 लाख महिलाएं है। शिशु लिंगानुपात की दृष्टि से प्रति हजार बालकों की तुलना में महज 912 बलिकाएं हैं। हालांकि इस जनगणना के सुखद परिणाम यह रहे हैं कि जनगणना की वृद्धि दर में 3.96 प्रतिशत की गिरावट आई है। लेकिन इसकी विसंगति यह है कि पारसियों, ईसाईयों और हिंदुओं में तो जन्मदर घटी है, लेकिन मुस्लिमों में बढ़ी है क्योंकि मुस्लिमों में यह भ्रम है कि इस्लाम उन्हें परिवार नियोजन की इजाजत नहीं देता। यह जन्मदर हिंदू परिवारों में 0-6 साल के बच्चों की उन्नति दर 1.5 फीसदी है, जबकि मुस्लिमों में 18 फीसदी है। उच्च शिक्षित व उच्च आय वर्ग के लोग एक संतान पैदा करने तक सिमट गए हैं, जबकि वे तीन बच्चों के भरण-पोषण व उन्हें उच्च शिक्षा दिलाने में सक्षम हैं। भविष्य में वे ऐसा करें तो समुदाय आधारित आबादियों के बीच संतुलन की उम्मीद की जा सकती है।

आबादी नियंत्रण के परिप्रेक्ष्य में हम केरल राज्य द्धारा बनाए गए 'कानून वूमेन कोड बिल-2011' को एक आदर्श उदाहरण मान सकते हैं। इस कानून का प्रारूप न्यायाधीश वीआर कृष्ण अय्यर की अघ्यक्षता वाली 12 सदस्यीय समिति ने तैयार किया था। इस कानून में प्रावधान है कि देश के किसी भी नगरिक को धर्म, जाति, क्षेत्र और भाषा के आधार पर परिवार नियोजन से बचने की सुविधा नहीं है। हालांकि दक्षिण भारत के राज्यों की जनसंख्या वृद्धि दर संतुलित रही है क्योंकि इन राज्यों ने परिवार नियोजन को सुखी जीवन का आधार मान लिया है। बावजूद आबादी पर नियंत्रण के उपाय तभी सफल हो सकते हैं, जब सभी धर्मावलंबियों, समाजों, जातियों और वर्गों की उसमें सहभागीता हो। हमारे यहां परिवार नियोजन अपनाने में सबसे पीछे मुसलमान हैं। मुस्लिमों की बहुसंख्यक आबादी में आज भी यह भ्रम फैला हुआ है कि परिवार नियोजन इस्लाम के विरुद्ध है। कुरान इसकी अनुमति नहीं देता। ज्यादातर रूढ़िवादी और दकियानूसी धर्मगुरू मुस्लिमों को कुरान की आयातों की गलत व्यख्या कर गुमराह करते रहते हैं।

इस बाबत यहां असम के डाॅ. इलियास अली के जागरुकता अभियान का जिक्र करना जरूरी है। डाॅ. अली गांव-गांव जाकर मुसलमानों में अलख जगा रहे हैं कि इस्लाम एक ऐसा अनूठा धर्म है, जिसमें आबादी पर काबू पाने के तौर-तरीकों का ब्यौरा है। इसे 'अजाल' कहा जाता है। इसी बिना पर मुस्लिम देश ईरान में परिवार नियोजन अपनाया जा रहा है। यही नहीं इसकी जबावदेही धर्मगुरुओं को सौंपी गई है। ये ईरानी दंपत्तियों के बीच कुरान की आयातों की सही व्याख्या कर लोगों को परिवार नियोजन के लिए प्रेरित कर रहे हैं। डाॅ. इलियास चिकित्सा महाविद्यालय गुवाहाटी में प्राध्यापक हैं। वे प्रकृति से धार्मिक हैं। उनसे प्रभावित होकर असम सरकार ने उन्हें खासतौर से मुस्लिम बहुल इलाकों में परिवार नियोजन के क्षेत्र में जागरुकता लाने की कमान सौंपी है। डाॅ. इलियास के इन संदेशों को पूरे देश में फैलाने की जरूरत है। जिससे भिन्न धर्मावलंबियों के बीच जनसंख्यात्मक घनत्व औसत अनुपात में रहे।

देश में पकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद और बांग्लादेशी मुस्लिमों की अवैध घुसपैठ, अलगावादी हिंसा के साथ जनसंख्यात्मक घनत्व बिगाड़ने का काम भी कर रही है। कश्मीर क्षेत्र से 1988 में आतंकी दहशत के चलते मूल कश्मीरियों के विस्थापन का सिलसिला जारी हुआ था,जो आज भी जारी है। विस्थापितों में हिंदू, डोंगरे, जैन, बौद्ध और सिख हैं। उनके साथ धर्म व संप्रदाय के आधार पर ज्यादती हुई और निदान आजतक नहीं हुआ। न्याय दिलाने की बात तो दूर, इनकी वापसी में जम्मू-कश्मीर की फारूख अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती और गुलाम नबी आजाद सरकारों ने कभी रुचि नहीं ली। बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी ने कश्मीर स्थित इनकी जायदाद पर कब्जा किया हुआ है। इन्हें सीमा पर से आया आतंकवाद संरक्षण दे रहा है। कश्मीर में यह स्थिति जनसंख्यात्मक घनत्व बिगड़ने के कारण ही उत्पन्न हुई है। जिसका परिणाम लोग अपने ही देश के एक हिस्से से खदेड़े गए शरणार्थी के रूप में भोग रहे हैं। हालांकि अब 370 की समाप्ति के बाद इनकी वापसी संभव लग रही है।

इधर, असम क्षेत्र में 4 करोड़ से भी ज्यादा बांगलादेशियों ने नाजायज घुसपैठ कर यहां का जनसंख्यात्मक घनत्व बिगड़ दिया है। नतीजतन, यहां नगा, बोडो और असमिया उपराष्ट्रवाद विकसित हुआ। इसकी हिंसक अभिव्यक्ति अलगाववादी आंदोलनों के रूप में देखने में आती रहती है। 1991 की जनगणना के अनुसार कोकराझार जिले में 39.5 फीसदी बोडो आदिवासी थे और 10.5 फीसदी मुसलमान। किंतु 2011 की जनगणना के मुताबिक आज इस जिले में 30 फीसदी बोडो रह गए हैं, जबकि मुसलमानों की संख्या बढ़कर 25 फीसदी हो गई। कोकराझार से ही सटा है, धुबरी शहर। धुबरी जिले में 12 फीसदी मुसलमान थे लेकिन 2011 में इनकी संख्या बढ़कर 98.25 फीसदी हो गई है। धुबरी अब भारत का सबसे घनी मुस्लिम आबादी वाला जिला बन गया है। 2001 की जनगणना के मुताबिक असम के नौगांव, बरपेटा, धुबरी, बोंगई गांव और करीमनगर जैसे नौ जिलों में मुस्लिम आबादी की संख्या हिंदु आबादी से ज्यादा है। तय है घुसपैठ ने आबादी का घनत्व बिगाड़ने का काम किया है।

यहां गौरतलब है कि असम समेत समूचा पूर्वोत्तर क्षेत्र भारत से केवल 20 किलोमीटर चौड़े एक भूखण्ड से जुड़ा है। इन सात राज्यों को सात बहनें कहा जाता है। यह भूखण्ड भूटान, तिब्बत, म्यांमा और बांगलादेश से घिरा है। इस पूरे क्षेत्र में ईसाई मिशनरियां सक्रिय हैं, जो शिक्षा और स्वास्थ सेवाओं के बहाने धर्मांतरण का काम भी कर रही हैं। इसी वजह से इस क्षेत्र का नागालैंड ऐसा राज्य है, जहां ईसाई आबादी बढ़कर 98 प्रतिशत के आंकड़े को छू गई है। बावजूद भारतीय ईसाई धर्मगुरू कह रहे हैं कि ईसाईयों की आबादी बीते ड़ेढ़ दशक में घटी है, इसे बढ़ाने की जरूरत है। चर्चों में होने वाली प्रार्थना सभाओं में इस संदेश को प्रचारित किया जा रहा है। ऐसे विरोधाभासी हालात में यदि नरेंद्र मोदी ने जागरुकता के जरिए आबादी नियंत्रण की वकालत की है, तो इसे गंभीरता से लेने की जरूरत है।

(प्रमोद भार्गव, लेखक वरिष्ठ साहित्यकार व पत्रकार हैं।)

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