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व्यंग्य : माइक उनके पास है, जो चाहें बोल सकते हैं

व्यंग्य : माइक उनके पास है, जो चाहें बोल सकते हैं

आरजे हिना का प्रश्न है- किस करने के लिये कितनी मुलाक़ातें होना आवश्यक है? अर्थात अमूमन कितनी मुलाकातों के बाद आप चुम्बन तक पहुँच जाते हैं। अब प्रश्न है तो उत्तर भी होना चाहिये।

सुधी श्रोतागण फोन लगा कर इस गम्भीर प्रश्न का उत्तर दे रहे हैं। आशा है इन चर्चाओं के साथ ही कार्यक्रम समाप्त होगा। (ज़ाहिर है मुझे सुनने में कोई दिलचस्पी नहीं है)। इसके अतिरिक्त वो कार्यक्रम आते हैं जिसमें लोग अपनी निजी समस्याएं आरजे को बताएंगे। और वो रेडियो प्रस्तोता किसी बड़े मनोचिकित्सक की तरह हर सवाल का उत्तर देगा/देगी। प्रमुख प्रश्न वहीं होंगे जो आप जानते हैं। किसी का प्रेमी धोखा दे गया है,तो किसी की प्रेमिका किसी अन्य प्रेमी से प्रेम कर बैठी है।

रेडियो स्टेशन उनका है, माइक उनके पास है, जो चाहें बोल सकते हैं। जिसको सुनना हो, सुने। नहीं सुनना हो, न सुने। बात भी सही है।परन्तु यहाँ एक समस्या है।

रेडियो स्टेशन भले ही उनका हो पर रेडियो हमारा है।रेडियो कार में चल रहा है और व्यक्ति अपने परिवार के साथ है। आजकल कार ही वह एकमात्र स्थान है जहाँ पूरा परिवार एकत्र होता है। पिछले कुछ समय में रेडियो सुन कर बच्चों द्वारा जो प्रश्न पूछे गये ,वो इस प्रकार हैं-

-पापा ये फ्लर्ट क्या होता है?

-ब्रेक अप किसे कहते हैं?

-पापा ये एक्स क्या है? रेडियो में मेरी एक्स ने ऐसा किया, मेरा एक्स ऐसा है-क्यों बोल रहे हैं?

-ये बार-बार बीप की आवाज़ क्यों आ रही है? क्या अपनी कार का रेडियो खऱाब है पापा?

-पापा आप कहते हैं कि सबसे आप करके बोला करो। पर रेडियो में तो अंकल तू-तू करके बोल रहे हैं?

अब कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या?

एक कार्यक्रम में एक आरजे किसी श्रोता से बहस कर रही है। तू-तड़ाक तो चल ही रही है। श्रोता कहता है- अरे सुन तो ले मेरी जान! आरजे उत्तर देती है- मैं तेरी जान-वान नहीं हूँ, चल आगे बोल! चर्चा अब छिछोरेपन के नवीन प्रतिमान बनाने की ओर अग्रसर है। लगता है कोई कानों में पिघला सीसा डाल रहा हो। मैं घबरा कर रेडियो बंद कर देता हूँ।

एक श्रोता से आरजे उनका नाम पूछती है। वे अपना नाम पम्पा बताती हैं। आरजे पहले हँसती है, फिर उनके नाम का मज़ाक बनाती है कि आपका ऐसा नाम किसने रख दिया-पम्पा। और मैं सोच रहा हूँ कितना सुंदर नाम है -पम्पा! पवित्र पाँच सरोवरों में से एक। यदि नहीं पता था तो गूगल ही कर लिया होता। और यदि गूगल नहीं करना था, तो भी एक रेडियो प्रस्तोता से शालीनता, सभ्यता की आशा की जाती है।

आजकल की पीढ़ी के लिये हो सकता है ये आश्चर्य की बात हो पर एक समय में उच्चारण और बातचीत का लहज़ा सीखने के लिये रेडियो सुना जाता था और टीवी देखा जाता था।

रचनात्मकता की चर्चा करें तो उसका आलम ये है कि एक एफएम स्टेशन नई पिक्चर के रिव्यू के बाद, उसके मूल्यांकन हेतु स्टार देने की जगह ,भांगड़ा नृत्य के समय मुँह से ओठों के द्वारा निकाली जाने वाली 'द्रुआ' आवाज़ से रेटिंग दे रहा है। पिक्चर अच्छी है तो प्रस्तोता चार बार द्रुआ की आवाज़ निकालेगा और एक बार थोड़ी सी दुर्र- अर्थात साढ़े चार स्टार। यही चैनल गानों की रेटिंग के लिये अभिनेता अक्षय कुमार की आवाज़ की नकल में आह की आवाज़ निकाल रहा है। गाना अच्छा है तो चार बार आह और एक बार अह- अर्थात साढ़े चार स्टार।

यदि हास्य की बात करें तो लगता है जैसे बिना किसी की बेइज़्ज़ती किये हास्य उत्पन्न ही नहीं हो सकता। बकरा, मुर्गा, गधा, उल्लू -इन नामों वाले कार्यक्रम हास्य पैदा करने का प्रयास करते हैं। हालाँकि इस देश का बच्चा-2 जान चुका है कि ये कार्यक्रम नियत(फिक्स) होते हैं। पर ये बात बच्चे जानते हैं, छोटे बच्चे नहीं। वे सवाल पूछते हैं।

एफएम रेडियो सुनते करीब अ_ारह-उन्नीस साल हो गये हैं। इन सभी वर्षों में एक चीज़ समझ आई कि निजी एफएम चैनलों का सबसे महत्वपूर्ण विषय बॉयफ्रैंड- गर्लफ्रैंड है। एफएम की सुई इन्हीं पर अटकी है। जबकि हमारे चारों ओर कितनी कला, साहित्य, संगीत, संस्कृति, फैली है। लेकिन नहीं!

इन पंक्तियों के लेखक को कुछ समय आकाशवाणी में युववाणी प्रस्तुत करने का सौभाग्य मिला है। जिस दिन पहली बार माइक पर बैठे तो लगा कि यह कितनी बड़ी शक्ति हमें मिल गई है।हमारे एक-एक शब्द को हज़ारों-लाखों लोग सुनेंगे। हम क्या नहीं कर सकते!(यदि शक़ हो तो भारत के स्वतंत्रता संग्राम के समय गुप्त रेडियो की भूमिका के बारे में पढिये!)

कहने का अर्थ है कि हमें अपनी जि़म्मेदारी का अहसास था। उस समय हमारे ऊपर इंटरनेट,गूगल बाबा का आशीर्वाद नहीं था। अगले कार्यक्रम के लिये कोई विषय दिया जाता और हम उसकी जानकारी खोजने निकल पड़ते। ग्वालियर के ज्ञान मन्दिर, किताब घर पर घण्टो बिताते।

अक्सर कार्यक्रम के लिये जो भुगतान मिलना होता था, उससे अधिक की किताबें खरीद लाई जातीं। फिर नोट्स बनते। कार्यक्रम अधिकारी यतींद्र भैया, तुलिका दीदी, आभा दी और अन्य सभी निर्देश देते। यतीन्द्र भैया तो चार पन्ने में से दो पन्ने काट भी देते (जो बाद में पता चला कि एडिटिंग कहलाती है)। पर आज तो समय अलग है।

आज तो हमारे पास इंटरनेट है, गूगल है। कल नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की जयंती थी। क्या उनकी जयंती का दायित्व केवल सरकार का है, हम लोगों का नहीं? कितना अच्छा होता यदि रेडियो सुन कर बच्चे पूछते कि पापा ये स्वतंत्रता क्या है, स्वतंत्रता संग्राम क्या होता है, सुभाष चन्द्र बोस कौन थे?

बंदर के हाथ में उस्तरा मुहावरे का यदि सबसे अच्छा उदाहरण पूछा जाय तो आजकल के एफएम रेडियो जॉकी से बेहतर उत्तर कोई नहीं होगा। ऐसा लगता है जैसे प्लैनेट ऑफ द ऐप्स पिक्चर की तरह रेडियो स्टेशन्स पर ऐप्स ने कब्जा जमा लिया हो और वे अपनी मनमानी कर रहे हैं।

यह सब इसलिये नहीं लिखा जा रहा कि रेडियो जॉकी अपनी गुणवत्ता सुधार लें। उसकी आवश्यकता नहीं है। पक्ष अपना प्रतिपक्ष ख़ुद बनाता है। आकाशवाणी की लेट-लतीफी, नवाचार की कमी से इन एफएम स्टेशन्स का ज़माना आया था। आजकल इन चैनलों की बजाय गीतों के मोबाइल एप आ गए हैं, जिन पर गाने सुने जाने लगे हैं।

यह केवल इसलिये लिखा जा रहा है कि जब भी इतिहासकार, पत्रकार बौद्धिक दिवालियापन के युग का उल्लेख करें तो इन लोगों के योगदान को न भूलें।

आज आरजे हिना ने पूछा है कि किस तरह की लड़कियों को अपनी गर्लड नहीं बनाना चाहिये?

-प्रिय अभिषेक

Naveen ( 0 )

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