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पवाया की पावन भूमि के रत्न भवभूति

पवाया की पावन भूमि के रत्न भवभूति

भवभूति समारोह ग्वालियर नगर की एक पहचान बन चुका है विगत 25 .30 वर्षों से लगातार यह आयोजन जीवाजी विश्वविद्यालय ग्वालियर में हो रहा है। इस आयोजन की अहम् भूमिका में, मध्य प्रदेश संस्कृत अकादमी भोपाल पूर्व में अब वर्तमान समय में कालीदास अकादमी उज्जैन अखिल भारतीय भवभूति समिति ग्वालियर, भवभूति समिति डबरा, नगर निगम ग्वालियर, और जीवाजी विश्वविद्यालय के सहयोग से यह आयोजन स्थाई समारोह के रूप में स्थापित हो चुका है। तीन दिवसीय अखिल भारतीय भवभूति समारोह में भारत के भिन्न-भिन्न स्थानों से विद्वान आकर भवभूति पर अपने विचार व्यक्त करते हैं, कालीदास अकादमी संस्कृत शिक्षकों एवं विद्वानों को शोधपत्र वाचन हेतु आमंत्रित करती है शोधछात्र भी शोधपत्र का वाचन करते हैं, बाहर से आये हुए कवि एवं स्थानीय कवि गोष्ठी में अपनी अपनी रचनाओं की मनोरम प्रस्तुतियां देते हैं। भवभूति समिति द्वारा निर्धारित विषय पर विद्यालय, महाविद्यालय विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राएं विभिन्न प्रतियोगिताओं में भाग लेते हैं। कुशल नेतृत्व वाले शिक्षक स्थानीय कलाकारों एवं छात्रों को संस्कृत नाट्य मंचन के लिए प्रशिक्षित करते हैं। प्रशिक्षण प्राप्त छात्र भवभूति के नाटको की मंच पर बहुत मनमोहक प्रस्तुति देते हैं। कार्यक्रम के समापन के एक दिवस पूर्व विश्वविद्यालय की बस से पवाया की यात्रा विशेष महत्व रखती है। पवाया यानि भवभूति की जन्मस्थली, पवाया पुराणों में पद्मावती नगरी के रूप में वर्णित है, प्राचीनकाल में पद्मावती ग्वालियर क्षेत्र की एक नागकालीन राजधानी थी। ऐतिहासिक दृष्टि से इस क्षेत्र का अत्यधिक महत्व रहा है। अभी कुछ समय पूर्व पुरातत्व विभाग द्वारा उत्खनन करने पर पुरातत्व संपदा में समकालीन सिक्के मिलने की पुष्टि की गई थी । 5 वीं सदी में गुप्त वंश द्वारा बनवाए गए ईंटों के 3 मंजिला मंदिर के अवशेष वर्तमान में अभी भी देखे जा सकते हैं स्थानीय विद्वानों द्वारा कहा जाता है कि पिरामिडनुमा मंदिर यह भवभूति की नाट्यशाला रही होगी इसकी ऊपरी मंजिल पर जाने के लिए दोनों तरफ सीढिय़ां हैं। पद्मावती का दुर्ग सिन्ध और पार्वती नदियों के संगम पर बना है जिसका निर्माण राजा पुष्पपाल परमार ने करवाया था। यह किला खण्डहर में तब्दील हो गया है।

सिंध नदी के जल प्रपात के पास पवाया के निकट उत्तर-पश्चिम में भव्य धूमेश्वर मंदिर स्थित है जो पत्थर, ईंट, गारे और चूने से निर्मित है। इसका निर्माण ओरछा महाराज वीर सिंह जूदेव प्रथम ने करवाया था। इस पूर्वाभिमुखी मंदिर में पुष्पगार, अंतराल, रूपमण्डल और मण्डप हैं। जगती पर चढऩे के लिए तीन ओर से सीढिय़ाँ बनी हुई हैं।

सिन्ध एवं पारा पार्वती नदियों के संगम पर स्थित प्राचीन नगरी पद्मावती ग्वालियर के दक्षिण में स्थिति है।

भवभूति के मालती माधव के नौवें अंक में इसका विवरण दिया है...

पद्मावती विमलवारि विशाल सिंधु,

पारासरित्परिकरच्छलतो विभार्ति ।

उत्तुंगसौधसुरमंदिर गोपुराट्ट,

संड़्घट्ट पाटित विमुक्त मिवान्तरिक्षम्।

सैषा विभाति लवणा....

महाकवि भवभूति ने मालती माधव के प्रथम अंक में अपने कुल गोत्र का पद्मपुर का वर्णन इस प्रकार किया है....

ते श्रोतियास्तत्त्वविनिश्चयाय,

भूरि श्रुतं शाश्वतमाद्रियन्ते।

इष्टाय पूर्ताय च कर्मणेअ्थान,

दारानपत्याय तपोअर्थमायु।।

दक्षिणापथ में पद्मपुर नाम का नगर है। वहाँ कुछ ब्राह्मज्ञानी ब्राह्मण रहते हैं, जो तैत्तिरीय शाखा से जुड़े हैं, कश्यपगोत्रीय हैं। अपनी शाखा में श्रेष्ठ, पंक्तिपावन, पंचाग्नि के उपासक व्रती सोमयाज्ञिक हैं एवं उदुम्बर उपाधि धारण करते हैं। इसी वंश में वाजपेय यज्ञ करने वाले प्रसिद्ध महाकवि हुए। उसी परम्परा में पाँचवें भवभूति हैं जो स्वनामधन्य भट्टगोपाल के पौत्र हैं और पवित्र कीर्ति वाले नीलकण्ठ के पुत्र हैं। इनकी माता का नाम जातुकर्णी है और ये श्रीकण्ठ पदवी, प्राप्त पद, वाक्य और प्रमाण के ज्ञाता हैं।

श्रीकण्ठ पदलाञ्छन: भवभर्तिनामष् इस उल्लेख से यह प्रकट होता है कि श्रीकण्ठ कवि की उपाधि थी और भवभूति नाम था। किन्तु कुछ टीकाकारों का यह विश्वास है कि कवि का नाम नीलकण्ठ था और भवभूति उपाधि थी जो उन्हें कुछ विशेष पदों की रचना की प्रशंसा में मिली थी। इस पक्ष की पुष्टि में महावीरचरित एवं उत्तररामचरित के टीकाकर वीर राघव ने इस वाक्य की व्याख्या इस प्रकार प्रस्तुत की है

श्रीकण्ठपदं लाञ्छन: पदवाक्य प्रमाणज्ञो भवभूतिर्नाम जतुकर्णीपुत्र: कविमित्त्रधेयमस्माकमिति भवन्तो विदांकुवन्तु।

इस व्याख्या के अनुसार श्रीकण्ठ भवभूति का नाम था क्योंकि लाञ्छन शब्द नाम का परिचायक है। साम्बा पुनातु भवभूतिपवित्रमूर्ति: कृशिव की भस्म से पवित्र निग्रहवाली माता पार्वती तुम्हें पवित्र करें इस श्लोक की रचना से प्रसन्न होकर राजा ने उन्हें वभूतिष् पदवी से सम्मानित किया था। सच्चाई कुछ भी हो तीन नाटकों को रचने वाले महाकवि भवभूति को उतनी महत्ता नहीं मिली जितनी कि कालीदास भास आदि कवियों को मिली है। फिर भी महावीर चरित उत्तररामचरितम मालतीमाधवम् भवभूति के तीनों नाटकों का संस्कृत साहित्य में विशेष स्थान है। ऐसा कौन संस्कृत का विद्वान होगा जो महाकवि भवभूति के नाम से परिचित नहीं होगा मानव हृदय के सूक्ष्म भावों का चित्रण करने वाले प्रकृति प्रेमी महाकवि भवभूति दार्शनिक, चिन्तक, वेद, सांख्य, उपनिषद योग के ज्ञाता भी हैं।

महाकवि भवभूति ने निराशा में भी आशा की किरण को देखा। उन्हें पूरा विश्वास था कि वह दिन अवश्य आएगा, जब कोई सहृदयी इन रचनाओं का संसार में आदर करेगा। कवि को विश्वास था की गुणग्राही लोग उत्पन्न होंगे और उसकी रचनाओं का उचित मू्ल्यांकन करेंगे निसंदेह यह कवि का विश्वास और उनकी उत्तम कोटि की रचनाधर्मिता ही है। जो महाकवि भवभूति विभूति बनकर जन-जन में लोकप्रिय हो गए हैं...

ये नाम केचिदिह न: प्रथयन्त्यवज्ञां

जानन्ति ते किमपि तान्प्रति नैष यत्न:।

उत्पत्स्यतेअस्ति मम कोऽपि समानधर्मा

कालो ह्ययं निरवधिर्विपुला च पृथ्वी॥

-डॉ ज्योत्सना सिंह जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर की सहायक प्रध्यापक

Naveen ( 1308 )

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