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तूणीर 'अब दीदीगिरी......'

तूणीर अब दीदीगिरी......

दादागिरी, भाईगिरी, उठाईगिरी, गुंडागर्दी, लुच्चई, लफंगई, फालतूगिरी, चोरी चकारी, ठगी, डकैती पहले अच्छे काम नहीं माने जाते थे। भले लोग इनसे दूर बहुत दूर रहते थे।

समय बदला, कलियुग का प्रभाव बढ़ा।

पहले राजनीति में भी भले लोग थे। सिद्धांतवादी और आदर्शवादी। सबके नायक, असली जननायक राजनीति में ही होते थे उन दिनों। उनका नाम पढक़र, सुनकर उन्हें देखकर श्रद्धा और आदर का ज्वार उमड़ पड़ता था सबके मन में। उन दिनों राजनीति को देश सेवा .. निष्काम समाजसेवा का पर्याय माना जाता था। अधिक से अधिक त्याग और बलिदान गर्वित करते थे सबको।

समय बदला, लोग बदले, मन बदला। नीयत बदली, सूरत, सीरत सब कुछ बदल गया है, बदलता जा रहा है अब।

अब राजनीति कई बार, कई बार क्या अधिकांशत: जितने हेय. छिछले शब्द ऊपर लिखने पड़े हैं उन शब्दों का पर्याय बन रही है, बन गयी है यह। अब जन सेवा-समाज सेवा नहीं, केवल और केवल अपनी और अपनों की सेवा करो और मेवा खाओ, जुगत लगाओ या ... सदैव असरदार कुर्सी पर विराजमान कैसे रहा जाए या उसे हथिया कर कैसे उस पर बैठा जाए, सारा जोड़ तोड़ इसी बात का होता रहता है।

विधि .. विधान, फिजिक्स, केमिस्ट्री, समाज शास्त्र, इतिहास, भूगोल, गणित, खगोल विज्ञान,ज्योतिष शास्त्र, जीव और वनस्पति विज्ञान, हावभाव सहित मनोविज्ञान, चिकित्सा शास्त्र, पत्रकारिकता, साहित्य, धर्म और अर्थशास्त्र, भाषाएँ, बोलियाँ, रीति- रिवाज, संस्कृति और संस्कार, वार त्यौहार, जयंती और पर्व, मेले- ठेले आदि इन सबको अपने घेरे में लेते हुए और अधिक प्रभावी होती जा रही है यह कुलटा राजनीति । अब ये सब इसमें समाहित हो गये और इससे ही प्रकट होते दिखाई देते हैं। राजनीति के इर्दगिर्द ये और इनके इर्दगिर्द घूम रही है यह बेहया राजनीति। गंदगी . सड़ांध का ढ़ेर , पूरे देश का कूड़ादान बनती जा रही है निर्लज्ज राजनीति।

जनाब जरा सोचिए तो सही! नैतिक मूल्यों की जमीन रसातलगामी हो रही है।

बंगाल अराजकता का शिरोमणि बनता दिख रहा है। वहाँ की दीदी जी निरंकुशता, अराजकता, गुंडई का प्रतीक बन कर संवैधानिक मानदंडों को नष्ट भ्रष्ट करने में जुट गई हैं। अलग-अलग प्रांतों में ठुकराए हुए , अधिकतम भ्रष्टाचार में लिपटे हुए, सड़े-गले बैंगन जैसे बेअसर क्षत्रप दौड़ गए टेका लगाने यानी भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी अराजकता का, निरंकुशता का समर्थन करने के लिए। और इस प्रकार ऊपर शुरू में लिखे हेय शब्दों में एक और शब्द जुड़ गया है .. 'दीदीगीरी' ।

लगता है फिलहाल 'दीदीगीरी' सबसे अधिक वजनदार शब्द होता जा रहा है। इसके आगे अन्य सभी महामना ठंडे पड़ते नजर आ रहे हैं।

एक और दिदिया जू का प्राकट्य हो रहा है उत्तर प्रदेश के रंगमंच से पतिदेव के भ्रष्टाचारलिप्त आभामंडल के साथ। कहते हैं यह भी बंगाली गीदड़ भभकी की तरह अग्नि ज्वाला बनकर रहे सहे नैतिक मूल्यों को जमींदोज करने के लिए कटिबद्ध रहेंगी ।

लोग कहते हैं कि इतने सारे असफल प्रयास केवल इसलिए हो रहें हैं कि वे सब मिलकर देश की आन बान शान को चार चांद लगाने के लिए अनथक परिश्रम कर रहे अविजित योद्धा की उजली, झकास छवि पर मुंह उठाकर थूक सकें । अफ़सोस है कि अभी तक वे इसमें सफल नहीं हो पाए हैं। हाँ ! नैतिक मूल्यों को पैरों तले रौंदने में वे अवश्य सफल हो रहे हैं।

बड़ी विकट स्थिति है यह !!

एक सुप्रसिद्ध कवि ने कहा है ..

'हम क्या थे, क्या हुए और क्या होंगे अभी

आज मिलकर साथ बैठें और विचारें हम सभी।'

-नवल गर्ग

Naveen ( 0 )

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