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नागरिकता संशोधन बिल, घड़ी की सुई घुमाने का प्रयास

नागरिकता (संशोधन) विधेयक पर कांग्रेस पहले दिन से ही मुखर है।

नागरिकता संशोधन बिल, घड़ी की सुई घुमाने का प्रयास

-सियाराम पांडेय 'शांत'

भारतीय नागरिकता संशोधन विधेयक पर राजनीति तेज हो गई है। इसे धर्म से जोड़कर देखा जा रहा है। भले ही यह विधेयक लोकसभा में पारित हो गया हो लेकिन राज्यसभा में इसे लेकर काफी विरोध हो रहा है। कांग्रेस इस बिल को संविधान विरोधी बता रही है। उसे लग रहा है कि इस संशोधन बिल के जरिये भाजपा राजीव गांधी के निर्णय को पलटना चाहती है। वह घड़ी की सुई घुमा रही है। असम गण परिषद केंद्र सरकार से अपना समर्थन वापस लेने की घोषणा कर चुकी है। प्रफुल्ल कुमार महंत कह रहे हैं कि असम की भाजपा नीत गठबंधन सरकार को भंग कर नए सिरे से आम लोकसभा चुनाव के साथ ही चुनाव कराए जाने चाहिए। कुल मिलाकर इस विधेयक को लेकर मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्ना वाली स्थिति है। इस विधेयक की खासियत यह है कि इससे बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आने वाले अल्पसंख्यक, यानी गैर मुस्लिम लोगों को भारतीय नागरिकता प्रदान करने का मार्ग प्रशस्त होगा। विपक्ष इसमें मुस्लिम नागरिकों की सहूलियत तलाश रहा है। असम में लाखों बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियों का प्रवेश हो चुका है। कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दलों को लगता है कि इससे भारत में रह रहे बांग्लादेशी घुसपैठी भगा दिए जाएंगे। वह सीधे तौर पर बांग्लादेशी मुस्लिमों की बात नहीं कर रही, भारतीय मुस्लिमों के संभावित उत्पीड़न के बहाने उनका बचाव कर रही है।

गृह मंत्री राजनाथ सिह की मानें तो यह विधेयक संविधान के खिलाफ बिल्कुल नहीं है। इससे तीन पड़ोसी देशों के प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को राहत मिलेगी। नागरिकता (संशोधन) विधेयक पर कांग्रेस पहले दिन से ही मुखर है। उसका तर्क है कि शीतकालीन शर्त के एक दिन पहले यह विधेयक क्यों लाया जा रहा है? कांग्रेस सांसदों ने राज्यसभा में इस पर जमकर हंगामा किया। सदन की बैठक एक दिन के लिए बढ़ाए जाने को लेकर अन्ना द्रमुक, तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के सदस्यों ने व्यवस्था का प्रश्न उठाया और इसे सदन संचालन सम्बंधी नियमों का उल्लंघन करार दिया। उनका आरोप है कि बैठक की अवधि बढ़ाने की घोषणा आसन से की जाती है लेकिन आसन ने न तो इसकी घोषणा की और न ही इसके लिए संशोधित कार्यसूची ही अधिसूचित हुई। अरुण जेटली ने भी सदन की कार्य अवधि बढ़ाने को सरकार और आसन का विशेषाधिकार बताया। राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने कार्य अवधि बढ़ाने की घोषणा नहीं किये जाने को निजी चूक बताया। सवाल यह उठता है कि जब उपसभापति ने अपनी गलती मान ली है तो हंगामे का कोई औचित्य बनता ही नहीं। कांग्रेस का तर्क है कि इस विधेयक के प्रावधानों से असम में सुरक्षा का संकट पैदा हो सकता है लेकिन किस तरह, इस पर प्रकाश डालना शायद कांग्रेस बताना नहीं चाहती।

विकथ्य है कि संविधान पूरे देश के लिए एकमात्र नागरिकता उपलब्ध कराता है। नागरिकता संबंधी प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 5 से 11 में किए गए हैं। भारतीय नागरिकता अधिनियम 1955 में पहली बार तो संशोधन हो नहीं रहा है। इसके पहले भी इसमें कई संशोधन हो चुके हैं। तब किसी राज्य में संकट नहीं पैदा हुआ तो अब कैसे हो सकता है, इस पर विचार करने की जरूररत है। नागरिकता (संशोधन) अधिनियम 1986, नागरिकता (संशोधन) अधिनियम 1992, नागरिकता (संशोधन) अधिनियम 2००3 और नागरिकता (संशोधन) अध्यादेश 2005, नागरिकता (संशोधन) अधिनियम 2003 को संसद ने संशोधित भी किया और कानूनी जामा भी पहनाया। सात जनवरी 2004 को भारत के राष्ट्रपति द्बारा नागरिकता (संशोधन) अधिनियम 2003 को स्वीकृति प्रदान की गयी और 3 दिसम्बर 2004 को यह अस्तित्व में आया। नागरिकता (संशोधन) अध्यादेश 2005 को भारत के राष्ट्रपति द्बारा प्रख्यापित किया गया था और यह 28 जून 2005 को अस्तित्व में आया।

भारतीय राष्ट्रीयता कानून क्षेत्र के भीतर जन्म के अधिकार के द्बारा नागरिकता और रक्त के अधिकार के द्बारा नागरिकता का अनुसरण करता है।

गृहमंत्री राजनाथ सिह ने स्पष्ट कर दिया है कि बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के अल्पसंख्यकों को भारत के अलावा कहीं और जाने का विकल्प नहीं है। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू समेत भारत के कई दिग्गज नेता पड़ोसी देशों के विस्थापितों को हमारे देश में शरण देने के पक्षधर रहे हैं। यह बिल नागरिकता बिल, 1955 की जगह लेगा। संशोधित बिल के बाद भारत सरकार, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई धर्म के लोगों को छह साल भारत में गुजारने पर भारतीय नागरिकता प्रदान कर सकेगी। पहले यह जरूरी अवधि 12 साल थी। साथ ही इसके लिए जरूरी दस्तावेज भी अब अनिवार्य नहीं होंगे।

लोकसभा में चर्चा से एक दिन पहले ही मोदी कैबिनेट ने इस बिल को हरी झंडी दे दी थी। असम के कई स्थानीय संगठन भी इस विधेयक की मुखालफत कर रहे हैं। असम गण परिषद इस संशोधन के खिलाफ है । उसका मानना है कि अगर यह बिल पास हो गया तो असम बर्बाद हो जाएगा। इस संशोधित बिल से असम में बांग्लादेशियों की अवैध घुसपैठ को और बढ़ावा मिलेगा।

गौरतलब है कि असम में नागरिकता संशोधन विधेयक-2016 के विरोध में 40 संगठनों ने बंद का आयोजन किया । यह बिल लोकसभा में 15 जुलाई 2016 को पेश हुआ था जबकि 1955 के नागरिकता अधिनियम के अनुसार, बिना किसी प्रमाणित पासपोर्ट, वैध दस्तावेज के बिना या फिर वीजा परमिट से ज्यादा दिन तक भारत में रहने वाले लोगों को अवैध प्रवासी माना जाएगा। यह भी विवाद है कि बिल को लागू किया जाता है तो इससे एनआरसी प्रभावहीन हो जाएगा। वैसे भी असम में एनआरसी को अपडेट करने की प्रक्रिया चल रही है। असमगण परिषद इस बिल के विरोध में राज्य के 50 लाख लोगों के हस्ताक्षर करा रही है, उसे वह संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजना चाहती है। कांग्रेस ने भी बिल को 1985 के असम समझौते की भावना के खिलाफ बताया है। उसका मानना है कि 1971 के बाद बांग्लादेश से आए सभी अवैध विदेशी नागरिकों को असम से निर्वासित किया जाएगा, भले ही वे किसी भी धर्म के हों। जेपीसी की टीम ने 7 मई को बिल को लेकर विभिन्न संगठन और व्यक्तियों की राय जानने की कोशिश की थी लेकिन स्थानीय विरोध के चलते उसके पैर उखड़ गए थे। इस टीम की अध्यक्षता भाजपा सांसद राजेंद्र अग्रवाल ने की थी। असम पब्लिक वर्क नागरिकता संशोधन विधेयक नाम के एनजीओ सहित कई अन्य संगठनों ने साल 2013 में राज्य में अवैध शरणार्थियों के मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। असम के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा का यह प्रमुख चुनावी मुददा था। 2015 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और निगरानी में यह काम शुरू हुआ था, जिसके बाद गत 30 जुलाई में फाइनल ड्राफ्ट जारी किया गया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने, जिन 40 लाख लोगों के नाम लिस्ट में नहीं हैं, उन पर किसी तरह की सख्ती बरतने पर फिलवक्त रोक लगा रखी है। बहरहाल, एनआरसी और नागरिकता संशोधन बिल को एक-दूसरे के प्रतिकूल माना जा रहा है। मोदी सरकार पर विपक्ष का आरोप है कि वह धर्म के आधार पर शरणार्थियों को नागरिकता देना चाहती है जबकि एनआरसी में धर्म के आधार पर शरणार्थियों को लेकर भेदभाव नहीं है। शंकाएं उपजी हैं तो उनका समाधान होना चाहिए लेकिन यह देश खाला का घर नहीं है, विचार तो इस पर भी होना चाहिए।

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स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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