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निर्गुण कौन देश को वासी

कहानी - डॉ. प्रतिभा त्रिवेदी

निर्गुण कौन देश को वासी

सविता ने जब गोविन्द को नथ दिखाया तो वह स्वयं हैरान था, इतनी बड़ी नथ कि चाहो तो गले में हसुली की तरह पहन लो। अब केवल गाँव ही नहीं बल्कि स्टेट यानी राज्य भी बदल गया था। वो अपनी जन्मभूमि से बहुत दूर चला आया था, फिर परिवार भी अब" हम दो से बढ़कर हमारे दो "का विस्तार पा गया था। इधर नौकरी की बढ़ती जिम्मेदारियां भी कुछ कम नहीं थी, लेकिन गाँव से अभी नाता था।

अच्छा अम्मा, हम अब निकलते हैं.. अपनी आँखो की तरलता छिपाते हुए बालगोविन्द ने कहा था।

अम्मा की मोतियाबिंद से भरी आंखों में केवल आंसू ही आंसू थे। सभी सात भाई बहनों में सबसे छोटा था बाल गोविद शायद इसीलिए अपनी अम्मा का दुलरुआ भी। गाँव में खेती किसानी खूब फैली हुई थी और गाँव के प्रधान होने का रुतबा पिता को मिला हुआ था। लेकिन जब उच्च शिक्षा के लिए बाहर इलाहाबाद पढऩे की बात आयी तो पिता के लाख विरोध करने पर भी अम्मा ही गोविन्द की ढाल बनकर पिता के सामने खड़ी हो गई थी।

गोविन्द ने बाहर जब पांव निकाले तब मालूम हुआ कि घर से बाहर आकर दुनिया की भीड़ में पांव जमा पाना इतना आसान भी नहीं है। लेकिन अब संभावनाओं का खुला आकाश था और परिश्रम से जीवन के सतरंगी ताने बाने बुनने थे। यहीं से शुरू हुआ था ऊंची उड़ानों का सिलसिला, पता ही नही चला कि पढ़ाई पूरी करते ही वो कब प्रतियोगी परीक्षाओं के चक्रव्यूह पार कर प्रशासनिक अधिकारी बन बैठा। अब तो कान्वेंट शिक्षिता कन्याओं के प्रस्ताव छप्पर फाड़ कर टपक रहे थे। लेकिन अम्मा ने तो बहुत पहले ही दूर के रिश्ते की भाभी की बहन को शादी में देखा था और दृढ़ निश्चय सा ले लिया था कि मेरे गोविन्द की यही पत्नी बनेगी।

अम्मा ने बहू की मुहँ दिखाई में अपनी बड़ी वाली नथ सविता को दी थी और कहा भी था- हमने सारी बहुओं से छिपाकर रखा था और यही सोचा था कि गोविन्दा की बहू के लिये भी कुछ छिपाकर रखना होगा । बाकी सब गहने तो बँट गये बस यही छुपा कर रखा था, सो तुम ले जाओ।

सविता ने जब गोविन्द को नथ दिखाया तो वह स्वयं हैरान था, इतनी बड़ी नथ कि चाहो तो गले में हसुली की तरह पहन लो। अब केवल गाँव ही नही बल्कि स्टेट यानी राज्य भी बदल गया था। वो अपनी जन्मभूमि से बहुत दूर चला आया था, फिर परिवार भी अब हम दो से बढ़कर हमारे दो का विस्तार पा गया था। इधर नौकरी की बढ़ती जिम्मेदारियां भी कुछ कम नहीं थी, लेकिन गाँव से अभी नाता था जैसे ही गहरी नींद आती- बस अम्मा की प्रभाती गाते पूरा आंगन लीपना - बुहारना , गाँव की अमराई में गर्मी की परवाह ना करके कच्ची अमिया तोडऩा। कुछ भी तो नहीं भूला था लेकिन जुबां मिली है मगर हम जुबां नहीं मिलता वाली विवशता तो थी ही।

पिता की अस्वस्थता का समाचार मिलते ही गांव में सपरिवार जाना हुआ था लेकिन जब पिता ने अन्तिम सांसे ली तब लोक सभा चुनावों के कारण सुदूर बस्तर में पदस्थ होने के कारण अंतिम दर्शन नहीं हो पाये थे, वह केवल अन्तिम संस्कार में शामिल हो पाया था। किन्तु उससे अधिक विषम परिस्थति तो सामने थी, अम्मा की कृशकाय काया और पिता का विछोह देखकर पहली बार गोविन्द ने अनुभव किया था कि आखिर ये उंची उड़ानें उसने क्या इन्हीं दिनों के लिये भरी थी? क्या यही उसकी मंजिल थी? लेकिन जाना तो पडेगा ही, बच्चों की पढाई लिखाई फिर नौकरी सभी कुछ तो थे जो उसे पुकार रहे थे। किसी लेखक की पंक्तियाँ याद आ रही थी

थोडा पढ़े तो हल से गये, ज्यादा पढ़े तो घर से गये।

अगले दिन सुबह सुबह वो अम्मा से विदा ले रहा था। अम्मा उसके दोनों बच्चों की बलैया ले रही थी, सविता को दूधों नहाओ पूतों फलो के शुभाशीष देते नहीं थक रही थी लेकिन जैसे ही विदाई के पूर्व अम्मा के पैरों को छूने झुका, अम्मा बिलख पड़ी थी, रुंधे गले से यही कहा था- बिटवा , तुम्हरे बब्बा गये, अब हम नाहीं बचेंगे।

बरसों पूर्व गाँव छोड़ते समय से आंखों में रोककर रखा गया आंसुओ का सैलाब आज गोविन्द की आँखों से बह निकला था। गाड़ी भले ही गंतव्य की ओर आगे जा रही थी किन्तु आज मन पीछे भाग रहा था। कहीं दूर सूरदास का भजन कानों में सुनायी दे रहा था...

निर्गुन कौन देश को वासी

को है जननी तात को कहियत।

को कहियत अविनाशी रे।

निर्गुन कौन देश को वासी रे।


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स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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