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इराक के नये गठजोड़ से हैरत

इराक के नये गठजोड़ से हैरत


- ललित मोहन बंसल

इराक़ में पिछले महीने 12 मई को हुए आम चुनाव में सब से बड़े दल 'सेरून एलायंस' के शिया नेता मुक्टडा अल-सद्र ने ईरान समर्थित कट्टरपंथी 'अल-फ़तह कुआएलेशन' से गठजोड़ कर अमेरिका और खाड़ी में अमेरिकी मित्र देशों- वहाबी सुन्नी देश सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और जॉर्डन आदि देशों को हैरत में डाल दिया है। इस निर्णय से अमेरिका समर्थित मौजूदा प्रधान मंत्री हैदर अल-आब्दी भी पसोपेश में हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के सत्तारूढ़ होने से पहले यही हैदर अल-आब्दी ईरान के सुपर धार्मिक नेता आयतुल्ला अल-खमेनी के चहेते थे। लिबरल शिया नेता मुक्टडा अल-सद्र ने चुनाव परिणामों के तुरंत बाद हैदर अल-आब्दी से हाथ मिलाए। उस समय उनके दिमाग़ में आईएसआईएस के विध्वंस के कारण बुनियादी ढांचे में सुधार और लेबनान में हिजबुल्ला तथा फ़िलिस्तीन में हमास के आतंकियों से लोहा लेने के लिए अमेरिकी सुरक्षा बलों के सहयोग की दरकार रही होगी।

पिछले महीने हुए चुनाव नतीजों पर नज़र डालें तो पहले स्थान पर 'सेरून एलायंस' (54सदस्य), दूसरे स्थान पर ईरान समर्थित कट्टरपंथी फ़तह कुआएलेशन (47सदस्य) और अमेरिका समर्थित मौजूदा प्रधान मंत्री हैदर अल-आब्दी के नसर कुआएलेशन (42सदस्य) तीसरे स्थान पर रही हैं, जबकि एक दर्जन से अधिक दलों ने अपने अपने सैन्य बलों की ताक़त पर थोड़ी-थोड़ी सीटें जीती हैं। ऐसी स्थिति में मुक्टडा अल सद्र के पास हैदर अल-आब्दी से हाथ मिलाने और छिटपुट दलों को निमंत्रण देने के अलावा कोई चारा भी नहीं था। फिर एक किंग मेकर बनने की चाह में अल सद्र यह भी चाहते थे कि आईएसआईएस की ओर से बुनियादी ढांचे के विध्वंस को दुरुस्त कैसे किया जाए? एक ओर उनके सामने चुनाव में किए गए वादों का सवाल था तो दूसरी ओर बुनियादी ढांचे और बाहरी ताक़तों से देश की सुरक्षा का। वह देश में अमेरिकी सेनाओं की मौजूदगी के ख़िलाफ़ जन जागरण करते आए हैं। एक अनुमान के अनुसार बुनियादी ढांचे के लिए एक सौ अरब डालर तथा आतंकवादी शक्तियों से लोहा लेने के लिए हथियार और लड़ाकू विमानों की भी उतनी ही दरकार थी।
इस बीच इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर के कमांडर क़ासिम सुलेमानी ने बग़दाद स्थित 'ग्रीन ज़ोन' में मुक्टडा अल-सद्र से भेंट में बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण और सुरक्षा का वास्ता भी दिया, लेकिन तब तक ईरानी क़वायद अल-सद्र के गले नहीं उतरी। इस बीच अमेरिकी दूत भी अल सद्र और आब्दी से मिल चुके थे। ईरान के कट्टरपंथी मुल्ला आयतुल्ला अल-खमेनी और उनकी इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर के कमांडर क़ासिम सुलेमानी ने उम्मीद नहीं छोड़ी। ईरान सहित खाड़ी देशों में कारोबार बढ़ाने के लिए उत्सुक चीनी हुक्मरानों ने भी अपने-अपने दांव लगाए। करबला और 'नजफ़' की एतिहासिक मस्जिदों के प्रमुख मुल्ला शेख़ फाहद अल-बिदायरी और आयतुल्ला अल-सिस्तानी, जो अल सद्र को करप्शन के ख़िलाफ़ आशीर्वाद दे चुके थे, साथ आए। बता दें, मक्का के बाद इन मस्जिदों में दुनिया भर से लाखों मुस्लिम ज़ियारत करने आते हैं। कहा जा रहा है कि रमज़ान का महीना ख़त्म होते ही सरकार के गठन का पहिया भी तेज़ी से चलने लगेगा। यह घोषणा तो पहल है, हालांकि छिटपुट दलों को सरकार में शामिल होने का निमंत्रण दिया जा चुका है।
मुक्टडा इन चुनाव में खड़े नहीं हुए थे, इसलिए वह प्रधान मंत्री के दावेदार नहीं हैं। ऐसी स्थिति में नेतृत्व कौन करेगा, बड़ा सवाल है। अल-फ़तेह एलायंस के नेता तथा बद्र संगठन के मुखिया हादी अल-अमीरी और पूर्व प्रधान मंत्री नूरी अल-मलीकि ताक़तवर नेता हैं। हादी अल-अमीरी ने 'पापुलर मोबीलाइज़ेशन फ़ोर्स' के प्रमुख के नाते अपनी पहचान बनाई है। वह शिया बहुल समाज में ईरानी मुल्लाओं के अज़ीज़ रहे हैं। शेख़ अल-खजाली ने भी अमेरिकी सुरक्षा कर्मियों को मौत के घाट उतार कर ईरानी इस्लामिक रिवोल्यूशनरी फ़ोर्स का दिल जीता है, लेबनान में हेजबुल्ला की छत्रछाया में इज़राइल में हमस से मिल कर और यमन में हौथी विदोहियों का दामन पकड़ कर सीरिया और अफ़ग़ानिस्तान में हलचल करते रहे हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोंपियो तो चेतावनी भी दे चुके हैं कि उनके मित्र देशों सऊदी अरब और इज़राइल में कोई उकसाने वाली कारवाई की गई तो वह मिलिट्री कारवाई करने को बाध्य होगा।

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स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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