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एक निष्काम कर्मयोगी का अवसान

मोहन नागर

एक निष्काम कर्मयोगी का अवसान

जिन कुष्ठ रोगियों के पास सामान्य मनुष्य जाने से भी घबराता है यहाँ तक की परिवार के लोग ही कुष्ठ रोगी का तिरस्कार कर देते हैं । ऐसे लोगों की सेवा में अपना पूरा जीवन तिल-तिल कर गला देने वाले बापट जी (दामोदर गणेश बापट) आज नहीं रहे ।

बिलासपुर के चाँपा कस्बे के पास रेलवे के एक अधिकारी संघ के स्वयंसेवक श्री महादेव गोविन्द कात्रे ने संघ के द्वितीय #सरसंघचालक पूज्य गुरुजी की प्रेरणा से कुष्ठ रोगियों की सेवा के लिए एक आश्रम खोला जो बाद में #कुष्ठ_निवारक_संघ चाँपा के नाम से प्रसिद्ध हुआ । कात्रे जी स्वयं कुष्ठ रोगी थे । वे इलाज के लिए बिलासपुर के पास स्थित बैतूल के ईसाई मिशनरी के अस्पताल गए । वहाँ उन्हें कहा जाता यीशु की आराधना करो स्वस्थ हो जाओगे । कात्रे जी ने कहा कुष्ठ रोग दवा से ठीक हो जाता है और हास्पीटल छोड़कर आ गए । #चाँपा के पास एक गाँव में एक सज्जन ने उन्हें इस काम के लिए जमीन दी और उन्होंने कुष्ठ रोगियों की सेवा शुरू कर दी । चाँपा क्षेत्र के आसपास पहले कुष्ठ रोग बहुत फैलता था । हर गाँव मे कुष्ठ रोगी तिरस्कार का जीवन जीते थे । मिशनरी के अस्पताल में जाओ तो वे ईसाई बना लेते । ऐसे में चाँपा का यह आश्रम रोगियों के लिए वरदान बना । कात्रे जी अकेले ही यह काम करते थे । अनेक लोग आते और उनके कार्य की प्रशंसा करके चले जाते । उन्हें सहयोगी की नितांत आवश्यकता थी । पर कोई वहाँ रात तक रुकना पसंद नहीं करता ।


सन 1972 में एक दिन एक छोटी कद काठी का एक नवयुवक आया । उसने कहा क्या मैं यहाँ आपका सहयोग कर सकता हूँ । #कात्रे जी ने कहा "कर पाओगे" ? युवक ने हाँ में गर्दन हिलाई । वह युवक बापट जी ही थे । ....और आज का दिन है लगभग पाँच दशक बाद उनकी अर्थी ही कुष्ठ आश्रम से उठेगी । #बापट जी ने कुष्ठ रोगियों की अकल्पनीय सेवा की । उनके बहते घावों को साफ करना । दिन में कई बार पट्टी बदलना । कुछ कुष्ठ रोगियों के हाथ गल जाते उन्हें भोजन कराना । कुष्ठ रोगियों के बच्चे भी साथ आते थे । उनकी पढ़ाई के प्रबन्ध के लिए एक छात्रावास वहीं शुरू किया । समाज के तिरस्कार और सम्मान के बारे में बापट जी ने एक बैठक में बताया था कि मुझे कई बार चाँपा जाना रहता तो सड़क पर खड़ा रहता, कोई बस वाला नहीं रोकता । अगर रोक दिया तो कोई बैठने नहीं देता । कई बार सात-आठ किलोमीटर पैदल ही चलकर जाना होता । क्योंकि लोगों में भ्रांतियाँ थी कि यह कुष्ठ रोगियों के पास रहता है तो इसको छूने से हमें भी कुष्ठ हो जायेगा । बापट जी आगे बताते हैं कि लैकिन धीरे-धीरे लोगों का भ्रम दूर हुआ और एक समय ऐसा आया कि बस में चढ़ते ही लोग खड़े हो जाते कि बापट जी यहाँ बैठिए । एक बार तो मैं बस में बैठ गया और अचानक ध्यान आया कि कुछ कागज आश्रम में रह गए । मैंने कंडक्टर को कहा कि मैं अगली बस से आ जाऊँगा कुछ आवश्यक कागज रह गए । मैं बस से उतरकर कागज लेकर वापस आया तो मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं था, बस वहीं खड़ी थी । लोगों ने ड्रायवर से कहा कि बापट जी आयेंगे तभी बस आगे बढ़ेगी ।

बापट ने अपने जीवन काल मे 26 हजार से भी अधिक कुष्ठ रोगियों के जीवन में उजाला किया । अपनी निःस्वार्थ सेवा से समाज के बीच में स्थान बनाना सबसे बड़ा पुरस्कार है । फिर भी भारत सरकार ने बापट जी की सेवाओं के लिए उन्हें 2018 में #पद्मश्री पुरस्कार से अलंकृत किया था । बापट जी संघ के प्रचारक थे । उनसे मेरा कई बार मिलना हुआ। बैतूल उनका आना जाना लगा रहता था। अनेक बार भारत भारती रात्रि विश्राम किया । उनके एक भाई आमला (बैतूल) में रेलवे में नौकरी करते थे।

उनके देहांत के पश्चात बापट जी ने उनका मकान विद्या भारती को दान कर दिया। बापट जी को ओर अधिक जानना है तो सुनील किरवई जी द्वारा लिखित पुस्तक "गोविंद माधवं" पढ़िए, जो कुष्ठ निवारक संघ चांपा के संस्थापक कात्रे जी के जीवन पर आधारित है। मैंने जब इस पुस्तक को पहली बार पढ़ा तो बहुत देर तक रोता रहा। समाज और यहाँ तक की अपने परिवार का भी तिरस्कार झेलकर किस तरह कात्रे जी ने कुष्ठ रोगियों की सेवा की। जब कोई कुष्ठ रोगियों के पास जाता तक नहीं था, तब बापट जी कात्रे जी के सहयोगी बनें।

ईश्वर उन्हें अपने लोक में स्थान दें । ॐ शान्ति ।।


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