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दिल्ली में धरने का तमाशा

दिल्ली में आम आदमी पार्टी के प्रमुख और मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल का धरना अब एक तमाशा का रुप लेता जा रहा है।

दिल्ली में आम आदमी पार्टी के प्रमुख और मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल का धरना अब एक तमाशा का रुप लेता जा रहा है। इतना ही नहीं इस धरने से दिल्ली का पूरा कामकाज लगभग ठप सा हो गया है, लेकिन आश्चर्य की बात तो यह है कि इस तमाशाई धरने को देश के चार राज्यों के मुख्यमंत्री का समर्थन मिल गया है। यह समर्थन भी ऐसे मुख्यमंत्रियों ने दिया है जो कहने को ही मुख्यमंत्री हैं, जिनका जनाधार कोई खास नहीं है। समर्थन देने वालों में कर्नाटक के मुख्यमंत्री कुमारस्वामी भी हैं, जो दूसरों की कृपा से ही अपना वजूद बनाए हुए हैं। जो स्वयं अस्थिरता की श्रेणी में सरकार चला रहे हैं, उनका समर्थन धरने को कितना वजनदार बनाएगा, यह बहुत बड़ा सवाल है। वास्तविकता तो यह है कि अरविन्द केजरीवाल की सरकार वर्तमान में कोई काम नहीं कर रही है, वे केवल धरना संस्कृति के सहारे ही समाचार पत्रों की खबरों में बने रहना चाहते हैं। दिल्ली के बारे में यह सच है कि आप सरकार से नाराज आईएएस अधिकारी हड़ताल पर हैं और दिल्ली का सारा कामकाज ठप पड़ा है। इस सारे मामले में कोई भी पक्ष सद्भावना से काम करने के बजाय नहले पे दहला मारने की कोशिश कर रहा है। अरविंद केजरीवाल द्वारा उपराज्यपाल के खिलाफ धरने को पार्टी नेता सर्जीकल स्ट्राइक करार दे रहे हैं। दरअसल केजरीवाल शुरू से ही धरने के पैंतरे को अपनाते आ रहे हैं जिसके द्वारा वह अपनी जिम्मेदारी से भी बचते हैं और लोगों की लोकप्रियता भी हासिल करते हैं।

मुख्यमंत्री का काम धरने देना नहीं बल्कि इस संबंधी में बातचीत का माध्यम अपनाना चाहिए। केजरीवाल आईएएस अफसरों को मनाने के लिए तैयार हैं। फिर भी मुख्यमंत्री केन्द्र तक समय पर नहीं पहुंचे, धरने के चौथे दिन केजरीवाल को प्रधानमंत्री याद आए हैं। सरकार के ऊंचे पद पर बैठे मुख्यमंत्री को केन्द्र से बातचीत समेत सौ तरीके अपनाकर भी टकराव वाली स्थिति से बचना चाहिए था। आम आदमी पार्टी ने अपने आप हास्यास्पद स्थिति बना ली है। यदि प्रधानमंत्री को ही उनकी सहायता करनी थी तब केन्द्र को चिट्ठी लिखने का फैसला पहले क्यों नहीं लिया गया? देश के इतिहास में यह अनोखा उदाहरण है जब किसी मुख्यमंत्री ने राज्यपाल के खिलाफ धरना दिया हो। आप की तरफ से राज्यपाल पर यह आरोप लगाना भी काफी हैरानीजनक है कि आईएएस उप राज्यपाल के इशारे पर हड़ताल कर रहे हैं। आईएएस अफसरों का हड़ताल पर जाना भी अनोखी घटना है। ऐसे टकराव को लम्बा खींचने से जहां प्रशासनिक ढांचा चरमराता है वहीं संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा को ठेस पहुंचती है। केंद्र को मामले में दखल देकर कोई ना कोई हल निकालना चाहिए। विरोध और लोकप्रियता हासिल करने के लिए संवैधानिक संस्थाओं की आड़ लेना चिंताजनक है। ये चीजें राजनीतिक लाभ के लिए ओछी राजनीति की निशानी हैं।




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स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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