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बंगाल का रहा है चुनावी हिंसा का इतिहास

बंगाल का रहा है चुनावी हिंसा का इतिहास

बंगाल का नाम सुनकर जहाँ रवीन्द्रनाथ टैगोर, बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय जैसे साहित्यकार और खुदीराम बोस, नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे स्वतंत्रता सेनानियों का बरबस ख्याल आता है, वहीं ठीक उसी तरह चुनावी माहौल में बंगाल में राजनीतिक हिंसा और बूथ लूटने जैसी घटनाएँ भी जेहन में आती हैं। बंगाल में चुनावी हिंसा के इतिहास को ध्यान में रखकर ही संभवत: चुनाव आयोग ने 7 चरणों वाले मतदान की सूची में बंगाल को शामिल किया। बंगाल का एक अजीब राजनीतिक माहौल रहा है, जो पार्टी सत्ता में रहती है वह अपने सामने विपक्ष को रहने नहीं देना चाहती। वाममोर्चा सरकार के कार्यकाल में कांग्रेस और फिर तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया गया, एक के बाद राजनीतिक हिंसा की कई घटनाएँ घटीं जो पूरे देश में चर्चित रहीं।

बदला नहीं, बदल चाई अर्थात बदला नहीं, परिवर्तन चाहिए का नारा देकर वर्ष 2011 में राज्य की सत्ता में आयी तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी के कार्यकाल की शुरुआत में तो इस नारे का असर रहा लेकिन वक्त बीतने के साथ ही तृणमूल कांग्रेस ने अपने संगठन के विस्तार के लिए माकपा के उन नेताओं को अपने साथ जोड़ लिया जो वाममोर्चा सरकार के जमाने में चुनावी मशीनरी को कंट्रोल करते थे। सत्ता ऐसी चीज है कि हाथ में आ जाये तो फिर कोई उसे खोना नहीं चाहता, इसमें अपवाद बहुत कम ही हैं।

जहाँ पूरे देश में चुनावी हिंसा की छिटपुट घटनाएँ सामने आयीं, वहीं बंगाल ने चुनावी हिंसा को लेकर राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियाँ बटोरीं। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी हर जनसभा में बंगाल में 7 चरणों में मतदान कराने और केन्द्रीय पुलिस बल की तैनाती को लेकर सवाल उठाती हैं लेकिन उनके सवालों का जवाब देश के सामने है। चुनाव आयोग की निगरानी में और केन्द्रीय पुलिस बल के घेरे के बावजूद हर चरण में बंगाल से हिंसा की घटनाएँ सामने आयी हैं। इसका मतलब क्या है, क्या इसका मतलब यह है कि बंगाल में चुनावी हिंसा की बीमारी लाइलाज हो चुकी है? हर चरण के मतदान के दौरान बंगाल की सत्ता में काबिज तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने न सिर्फ विपक्षी दलों के उम्मीदवारों का घेराव कर उन्हें अपमानित किया, गो बैक के नारे लगाये बल्कि योजनाबद्ध तरीके से मतदाताओं को आतंकित किये रखा। उम्मीदवारों को एक बूथ से दूसरे बूथ तक जाने में बाधा दी जा रही है। जब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जनसभाओं में यह कहती फिरें कि 23 मई को मतगणना के बाद राज्य में केन्द्रीय पुलिस बल या चुनाव आयोग नहीं रहेगा, लोगों को यहीं रहना है। इससे स्थिति समझी जा सकती है। तृणमूल कांग्रेस के कई नेता व मंत्री सभामंचों से यह कह चुके हैं कि केन्द्रीय पुलिस बल के जाने के बाद उन लोगों को सुरक्षा तृणमूल कांग्रेस कर्मी ही देंगे, इसमें धमकी साफ झलकती है। चुनाव आयोग से बंगाल में सभी विपक्षी दलों ने सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और राज्य पुलिस की भूमिका की शिकायत की थी। बंगाल पुलिस की हालत तो यह है कि विपक्षी दल उसे पुलिस नहीं, तृणमूल कार्यकर्ता बता रहे हैं। साधारण मतदाताओं की बात को छोड़ दें, राज्य सरकार के कर्मचारी जो चुनाव में मतदान कर्मी बनकर ड्यूटी कर रहे हैं, वे भी राज्य पुलिस की सुरक्षा में ड्यूटी करने को तैयार नहीं हैं। वे केन्द्रीय पुलिस बल की निगरानी में ही ड्यूटी करना चाहते हैं, इससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य पुलिस पर उन्हें भरोसा नहीं है कि वे सत्तारूढ़ दल के बूथ लुटेरों और गुण्डों से उनकी रक्षा कर सकेंगे। पिछले साल पंचायत चुनाव में हुई हिंसा से राज्य के विपक्षी दल सहमे हुए थे और यही कारण है कि लोकसभा चुनाव में केन्द्रीय बलों की माँग उठी थी।

इस बार बंगाल में हो रहे चुनाव में मतदाताओं का झुकाव किसकी तरफ है, यह बताना मुश्किल है। इसका कारण यह है कि इस बार सत्ताधारी दल बूथ कैप्चरिंग और धांधली उस तरह नहीं कर पाया जैसा अतीत में होता था। कुछ जगहों पर वोटरों को डराने और गड़बड़ी के हथकण्डे अपनाने के आरोप सामने आये लेकिन कुल मिलाकर यह कहा जाय कि ज्यादातर मतदाताओं ने खुलकर अपने मताधिकार का प्रयोग किया है। 15 मई को कोलकाता में अमित शाह के रोड शो के दौरान हुए हंगामे और विद्यासागर कॉलेज स्थित ईश्‍वरचंद्र विद्यासागर की मूर्ति तोड़ने के मामले ने राजनीति गरमा दी है। इस चुनावी महासमर में वाममोर्चा और कांग्रेस काफी पीछे छूट गये हैं, कुछ सीटों को छोड़ दें तो अधिकांश सीटों पर मुकाबला तृणमूल और भाजपा के बीच ही है। तृणमूल कांग्रेस के पास मजबूत सांगठनिक शक्ति है, इसके बावजूद यह तय है कि भाजपा बंगाल में इस बार अपनी सीटों की संख्या 2 से बढ़ाकर दहाई के अंक को छू सकती है। लेकिन दूसरी स्थिति यह है कि मतदाताओं को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रवाद की जो घुट्टी पिलायी है, उसका असर बंगाल में भी है। और यह असर ईवीएम में दिखा तो बंगाल में भाजपा 42 में से 25 सीटें भी जीत सकती है। नतीजे क्या होंगे, इसका एक अनुमान 19 मई को अंतिम चरण का मतदान खत्म होने के बाद विभिन्न एग्जिट पोल के माध्यम से मिलेगा लेकिन असली नतीजे 23 मई को मतगणना के बाद आयेंगे।

यह आलेख कोलकाता से प्रकाशित सलाम दुनिया हिन्दी समाचार पत्र के सम्पादक सन्तोष कुमार सिंह ने प्रेषित किया है।

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स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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