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अब सेक्यूलर लोगों की भी गौशालाएं

कांग्रेस के इस चुनावी वादे पर भाजपा का तीखा होना स्वाभाविक है।

अब सेक्यूलर लोगों की भी गौशालाएं

- डॉ. प्रभात ओझा

इतिहास के किसी विस्मृत से पन्ने में दर्ज है कि वर्ष 1966 के नवंबर में गोबध पर प्रतिबंध लगाने की मांग करते साधुओं पर देश की राजधानी में गोली चलाई गई थी। इंदिरा गांधी सरकार की नाक के नीचे यह सब हुआ। कहा तो यहां तक जाता है कि हिन्दू संतों पर जरूरत के मुताबिक कार्रवाई में कोताही न हो, इसलिए उन पर नियंत्रण के लिए गैर-हिंदू सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया था। भुला दिए गये इस वाकये को आज भाजपा के नेता याद कर रहे हैं और खासकर मध्यप्रदेश के लोगों को याद दिला रहे हैं। याद करना होगा कि जिन पांच राज्यों में इन दिनों विधानसभा चुनाव प्रक्रिया चल रही है, उनमें मध्य प्रदेश भी शामिल है। हर चुनाव के लिए राजनीतिक दल घोषणा पत्र जारी किया करते हैं। मध्य प्रदेश कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र को 'वचन पत्र' कहा है। ये वचन कहां तक निभाए जाएंगे, बाद की बात है। वैसे भी सरकार में आने के बाद किसी पार्टी ने अपना हर वादा पूरा किया हो, इतिहास में नहीं मिलता। आजकल किसानों का कर्ज माफ करने और लड़कियों की शिक्षा के लिए आर्थिक मदद से लेकर माध्यमिक शिक्षा हासिल करने वाले किशोरों को लैपटॉप और हर परिवार में टीवी सेट देने जैसे वादे आम हो चुके हैं। इन वादों के बीच मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस के वचन पत्र ने एक नायाब वादा (वचन) के लिए मीडिया का ध्यान आकृष्ट किया है। कांग्रेस ने वादा किया है कि राज्य में सरकार बनने की स्थिति में वह राज्यभर में गोशालाएं खोलेगी। ऐसे में राज्य की सत्ता पर कायम भाजपा के लिए 1966 का वह दौर याद करना खास हो जाता है, जब दिल्ली में गोभक्तों पर गोली चलाई गई थी।

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कांग्रेस के गोशाला खोलने सम्बंधी वचन को छलावा बताते हैं। प्रदेश के भाजपा नेता राज्य में कांग्रेस की दिग्विजय सिंह सरकार के दिन याद दिलाते हैं, जब गोचरान की भूमि सरकार ने अपने चहेतों को आबंटित कर दी थी। भाजपा नेता कहते हैं कि जब गायों के लिए चारागाह ही नहीं रहे तो वह सड़कों पर घूमने लगीं। उसी कांग्रेस पार्टी को अब गायों की चिंता हो रही है। बदले में कांग्रेस का कहना है कि पूजा-पाठ और गोसेवा को भाजपा ने अपने नाम पेटेंट नहीं कराया है कि इन्हें कोई और न अपना सके।

दरअसल, हिन्दू धर्म प्रतीकों पर राजनीति कोई नई बात नहीं रही। बहस तब से जोर पकड़ रही है, जब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने राज्य विधानसभा चुनावों में रैलियों के साथ मंदिर-मंदिर की यात्रा शुरू की। गुजरात और कर्नाटक विधानसभा चुनाव में यह साफ दिखाई दिया। कांग्रेस अध्यक्ष के एक खास अंदाज में जनेऊ पहनने को लेकर भाजपा ने उनकी जमकर आलोचना की थी। बदले में कांग्रेस अध्यक्ष अपनी धार्मिक यात्राओं से बहस को और अधिक हवा देते रहे। उन्होंने कैलास यात्रा तक कर डाली। चुनाव समर के दौरान धार्मिक यात्राएं कांग्रेस के मुफीद बैठ रही है। गुजरात में उसने अपनी स्थिति सुधारी थी, तो कर्नाटक में गठबंधन के सहारे ही सही, उसने अपनी सरकार बचा ली। अब कांग्रेस पार्टी मध्य प्रदेश में गोशालाएं खोलने की बात कर रही है। निश्चित ही यह सड़क पर घूमती आवारा गायों के लिए शरण स्थली हो सकती हैं।

कांग्रेस के इस चुनावी वादे पर भाजपा का तीखा होना स्वाभाविक है। आम तौर पर राम मंदिर के साथ गाय और गंगा संघ परिवार के एजेंडे में रहा है। इस पर खुद चलते हुए भाजपा अपने प्रतिद्वन्द्वी कांग्रेस पर हमलावर बनी रही। याद करना होगा कि 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान बिहार के नवादा में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने हरित क्रांति के साथ 'गुलाबी क्रांति' जैसे जैसे शब्द का इस्तेमाल किया था। उन्होंने कहा था कि मनमोहन सिंह सरकार हरित क्रांति (कृषि) की जगह गुलाबी क्रांति (मांस उद्योग) को बढ़ावा दे रही है। ऐसा मांस व्यापार पर सब्सिडी और टैक्स में छूट के कारण हो रहा है। गंभीर बात यह रही कि मनमोहन सिंह सरकार के पहले ही साल बजट में नए बूचड़खाने खोलने और उन्हें आधुनिक बनाने के लिए 15 करोड़ की सब्सिडी देने की व्यवस्था की गई। इसका परिणाम देखने को यह मिला कि अगले साल बासमती चावल के मुकाबले मांस का निर्यात अधिक हुआ।

मांस उद्योग में बीफ शब्द का इस्तेमाल बहुत होता है। मांस व्यापार भैंसों और बूढ़े अशक्त बैलों के बूते भी चला करता है, पर बीफ से आशय गोमांस ही हुआ करता है। ऐसे में यह बहस का विषय है कि हिन्दुओं की आस्था की प्रतीक गायों का वध महापाप है। इसे रोका ही जाना चाहिए। इसके विपरीत सरकारें चाहें जो भी हों, व्यापार के स्तर पर कोई नियंत्रण नहीं हो पाया। सांगठनिक स्तर पर अवश्य विहिप और संघ परिवार ने कुछ सकारात्मक कार्य किए हैं। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने देशभर में 120 कामधेनु नगर बनाने पर भी काम शुरू किया। संघ मानता है कि इससे हिंदू परंपरा में पवित्र माने जाने वाले पशुओं का सम्मान होगा और उनके साथ लोगों का रिश्ता मजबूत होगा । कामधेनु नगर दरअसल गोशालाएं ही हैं, जिन्हें रेजिडेंशल कॉलोनियों के निकट बनाने की योजना है। प्रारम्भिक बयान में तब संघ से जुड़े अखिल भारतीय गो सेवा के अध्यक्ष शंकर लाल ने कहा था कि गायों की रक्षा तभी की जा सकती है, जब वे दैनिक जीवन का हिस्सा बन जाएं। संघ ने तब पश्चिम बंगाल, राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश में 100 से अधिक स्थान चिह्नित किए थे। जोर इस पर दिया जा रहा है कि इन गोशालाओं में लावारिस के अलावा विशुद्ध भारतीय देसी नस्ल की गायें रखी जाएं।

असल में, गायों की रक्षा सिर्फ हिन्दू-मन को भावनाओं से जोड़कर नहीं की जा सकतीं। इसे समझने के लिए मांस उद्योग में लगे धन्नासेठों की सूची पर नजर डालनी होगी। आम धारणा है कि मांस व्यापार गैर हिन्दुओं का क्षेत्र है, जबकि हालात इसके ठीक उलट है। आज देश के सबसे बड़े चार मांस निर्यातक हिन्दू व्यवसायी ही है। इनके नाम अतुल सभरवाल, सुनील करन,मदन एबट और एएस बिंद्रा हैं। यह सच्चाई हर व्यक्ति की आंखें खोलने के लिए उदाहरण भर है कि गोरक्षा के क्षेत्र में करने के लिए बहुत कुछ बचा है। अभी गोशालाएं खोलने के नाम पर विवाद कायम है। क्या मांस निर्यातकों को इस दिशा में कुछ करने के लिए प्रेरित नहीं किया जाना चाहिए? इस दिशा में काम कोई भी करे, शुभ है। इतना जरूर है कि सेक्यूलर से गोभक्त बनने भर से काम नहीं चलेगा।

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स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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