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आर्थिक मोर्चे पर पाकिस्तान को करारा झटका

पाकिस्तान के लिए आर्थिक मदद का रुकना एक बड़े झटके के समान है, क्योंकि अभी पाकिस्तान के लिए रोजाना के खर्चों के लिए भी पैसे की व्यवस्था कर पाना काफी कठिन हो गया है।

आर्थिक मोर्चे पर पाकिस्तान को करारा झटका

वेब डेस्क/विनय के पाठक। दिवालिया होने के कगार पर खड़े पाकिस्तान को अमेरिका ने एक बार फिर झटका दिया है। अमेरिका ने पाकिस्तान को दी जाने वाली 1.66 बिलियन अमेरिकी डॉलर की मदद पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 19 नवंबर को ही पाकिस्तान को दी जाने वाली मदद पर रोकने की बात कही थी और 21 नवंबर को आधिकारिक तौर पर इस बात की घोषणा भी कर दी गई।

पाकिस्तान के लिए आर्थिक मदद का रुकना एक बड़े झटके के समान है, क्योंकि अभी पाकिस्तान के लिए रोजाना के खर्चों के लिए भी पैसे की व्यवस्था कर पाना काफी कठिन हो गया है। पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि उसके पास अभी अगले तीन महीने तक का खर्च करने लायक राशि भी नहीं बची है। और तो और, उसे डेट सर्विसिंग के लिए भी नए विदेशी कर्ज की बाट जोहनी पड़ रही है। डेट सर्विसिंग का तात्पर्य पुराने कर्जों की किश्त अदायगी से है। ऐसे में उसके सामने दिवालिया होने का खतरा बढ़ता जा रहा है।

पाकिस्तान को उम्मीद थी कि अमेरिका से मिलने वाली 1.66 बिलियन डॉलर की सुरक्षा सहायता राशि से वह अपने तात्कालिक संकट से कुछ राहत पा सकेगा। इसके विपरीत, अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता कर्नल रौब मैनिंग ने इस सहायता राशि पर रोक लगाने की घोषणा करते हुए स्पष्ट किया कि पाकिस्तान सुरक्षा सहायता के नाम पर अमेरिका से ली जाने वाली राशि के एवज में कभी भी आतंकवाद के खिलाफ कदम नहीं उठाता है। ऐसी स्थिति में उसको दी जाने वाली 1.66 बिलियन डॉलर की सुरक्षा सहायता राशि पर रोक लगा दी गई है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी कुछ समय पहले ही पाकिस्तान पर आरोप लगाया था कि उसने अमेरिका से सैन्य मदद के बदले में भारी भरकम राशि तो हमेशा ली है, लेकिन उसके एवज में उसने अपनी ओर से ऐसा कुछ भी नहीं किया है, जिसके आधार पर उसे इस सहायता राशि का हकदार माना जा सके। अपने 19 नवंबर के एक ट्वीट में उन्होंने कहा था कि 'हम पाकिस्तान को अरबों डॉलर इसलिए नहीं दे रहे हैं, क्योंकि उन्होंने हमसे पैसे लिए और हमारे लिए कुछ भी नहीं किया। बिन लादेन इसका मुख्य उदाहरण है। अफगानिस्तान भी वैसा ही एक देश है। वे उन कई देशों में से हैं, जिन्होंने अमेरिका से लिया, लेकिन बदले में कुछ भी नहीं दिया।'

यहां यह बताना प्रासंगिक होगा कि डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता में आने के बाद से ही अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्ते में तल्खी बढ़ गई है। पिछले साल अगस्त में भी जब ट्रंप ने अफगानिस्तान और दक्षिण एशिया को लेकर अपनी नीति की घोषणा की थी, तब उन्होंने पाकिस्तान को आतंकवादियों का सुरक्षित पनाहगाह बताया था। उनका कहना था कि पाकिस्तान में शरण पाने वाले आतंकवादियों ने ही अफगानिस्तान में अमेरिकी नागरिकों की और सैन्य अधिकारियों की हत्या की थी। इसके अलावा सितंबर 2017 में भी ट्रंप प्रशासन ने पाकिस्तान को दी जाने वाली 30 करोड़ डॉलर की सुरक्षा सहायता पर ये कहते हुए रोक लगा दी थी कि पाकिस्तान ने आतंकवादी संगठनों के खिलाफ कुछ भी नहीं किया है।

निश्चित रूप से पाकिस्तान को मिलने वाली राशि पर रोक लगने से इन दोनों देशों के बीच के संबंधों की तल्खी और बढ़ने की संभावना बन गई है। यह बात पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान के ट्वीट से भी जाहिर होती है। उन्होंने अपने ट्वीट में कहा है कि 'अमेरिका के झूठे आरोप पाकिस्तान की उन तकलीफों पर नमक छिड़क रहे हैं, जो तकलीफ उसने आतंक के खिलाफ अमेरिका की लड़ाई में जिंदगियां खोकर, अस्थिरता और आर्थिक हालत के रूप में झेली है। अमेरिका को ऐतिहासिक तथ्य बताए जाने की जरूरत है। पाकिस्तान को अमेरिका की लड़ाई में काफी नुकसान हुआ है। अब हम वही करेंगे, जो हमारी जनता और हमारे हित में होगा।'

स्पष्ट है कि दोनों देशों के बीच तल्खी बढ़ी है। इसका परिणाम पाकिस्तान की चीन पर निर्भरता बढ़ने के रूप में भी देखा जा सकता है। पाकिस्तान की कोशिश थी कि वह अमेरिकी सहायता राशि पाने के साथ ही अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से बेलआउट पैकेज पैकेज भी ले ले। ताकि उसे डेट सर्विसिंग में आसानी हो सके, लेकिन खबर है कि आईएमएफ के बेलआउट पैकेज पाने की पाकिस्तान की योजना भी खटाई में पड़ गई है। दो हफ्ते तक चली बातचीत में दोनों पक्षों के बीच सहमति नहीं बन सकी, क्योंकि आईएमएफ ने पाकिस्तान को सहायता देने से पहले उससे चीन से मिलने वाली वित्तीय सहायता की विस्तृत जानकारी मांगी है। इसके साथ ही आईएमएफ ने ईंधन की कीमत बढ़ाने और सख्त मौद्रिक नीति अपनाते हुए टैक्स में 150 अरब पाकिस्तानी रुपये की बढ़ोतरी करने जैसी शर्त भी रखी है। पाकिस्तान कि अभी जैसी आर्थिक स्थिति है, उसमें अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक ने सख्त मौद्रिक नीति अपनाने तथा 150 अरब रुपये का अतिरिक्त कर लगाने का सुझाव दिया है।

पाकिस्तान की परेशानी ये है कि देश की अर्थव्यवस्था के मद्देनजर वह फिलहाल 150 अरब रुपये का अतिरिक्त टैक्स लगाने का जोखिम लेने की स्थिति में नहीं है, क्योंकि ऐसा होने पर देश में गृहयुद्ध के आसार बन सकते हैं। वहीं आईएमएफ अपनी शर्तों को मानने पर ही उसे छह बिलियन डॉलर की वित्तीय सहायता देने की बात पर पड़ा हुआ है। साफ है पाकिस्तान के लिए सांप-छछूंदर की स्थिति बनी हुई है। वह न तो छह बिलीयन डॉलर पाने की आस छोड़ पा रहा है और न ही अपनी देश की जनता पर अतिरिक्त कर लादने की हिम्मत जुटा पा रहा है। ऐसी विषम परिस्थिति में पाकिस्तान की पूरी उम्मीद सऊदी अरब पर टिकी हुई है। हालांकि सऊदी अरब ने भी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान के हाल के दूसरे दौरे के बाद भी कोई स्पष्ट आश्वासन नहीं दिया है। पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ी परेशानी तो यह है कि वह चीन द्वारा उदार शर्तों पर दिए गए भारी-भरकम कर्ज के बोझ के तले बुरी तरह दबा हुआ है। चीन ने वन बेल्ट वन रोड परियोजना के तहत पाकिस्तान को भारी-भरकम कर्ज दिया हुआ है और अब वह कर्ज की किश्तों की नियमित अदायगी की स्थिति में ही नया कर्ज देने की बात कर रहा है। ऐसे हालत में अमेरिका और आईएमएफ से वित्तीय सहायता न मिल पाने से पाकिस्तान के लिए न तो किश्तों की अदायगी संभव हो पा रही है और न ही वो किसी विकास कार्य में खर्च कर पा रहा है।

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स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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