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कुंभ 2019 : तीन लोक का तीर्थ है प्रयागराज

कुंभ की परम्परा ऋग्वैदिक काल से प्रवाहमान भारतीय संस्कृति में छिपी चेतना व एक्य की भावना का प्रतिबिम्ब है। ये भारतीय चिन्तनधारा का राष्ट्रीय पर्व है। यह परम्परा अपनी पहचान कई शताब्दियों पूर्व से बनाए हुए है। पौराणिक दृष्टि से कुंभ स्नान का महत्व हजारों वर्ष प्राचीन है। यह राष्ट्रीय भावनात्मक एकता के रूप में आध्यात्मिक सर्वधर्म समभाव एवं अनेकता में एकता की भावना को विकसित करता है।

तीर्थराज प्रयाग में गंगा-यमुना और सरस्वती तीनों ही नदियों का संगम है। इसके समान तीनों लोकों में न तो अभी तक कोई तीर्थ हुआ है और न ही होगा। इसकी अनेक विशेषताएं वेदों, पुराणों व महाभारत आदि ग्रंथों में बताई गई हैं। प्रयाग को प्रजापति की यज्ञवेदी कहा गया है। यह देवों व चक्रवर्ती राजाओं की यज्ञ भूमि रहा है। प्रयाग को तीर्थराज इसलिए कहा गया है क्योंकि विभिन्न पुराणों में यहां उपस्थित तीर्थों की संख्या 60 करोड़ 10 हजार बताई गई है। कहा गया है कि गंगा-जमुना के मध्य के भूखण्ड में फैली हुई, रजतमयी बालुका के प्रत्येक कण में तीर्थों का वास है। मत्स्य पुराण में यह स्पष्ट लिखा है कि प्रयाग में स्थित पापों का हरण करने वाले तीर्थों की गणना सैकड़ों वर्षों में भी नहीं की जा सकती है। इसमें यह भी लिखा है कि सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा और अन्य देवगण प्रयाग के रक्षार्थ तत्पर रहते हैं। इन्द्र विशेष रूप से प्रयाग के रक्षक हैं एवं प्रयाग मण्डल की रक्षा अन्य देवताओं के साथ भगवान विष्णु करते हैं। यहां साठ हजार वीर पुरुष, गंगा और सूर्यदेव यमुना की रक्षा करते हैं। यहां विद्यमान अक्षय वट के रक्षक स्वयं शूलुपाणि शिव हैं। इसी प्रकार की बात अन्य पुराणों में भी आई है। महाभारत का कथन है कि यहां सभी देवता, दिशाएं, दिक्पाल, लोकपाल, साध्य, लोक सम्मानित पितर, सनत्कुमार, महर्षि, अंगिरा, निर्मल ब्रह्मर्षि, नाग, सुपर्ण, सिद्ध, सूर्य, नदी, समुद्र, गन्धर्व, अप्सरा तथा ब्रह्मा सहित भगवान विष्णु निवास करते हैं।

विभिन्न पुराणों के अनुसार माघ मास में सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने से प्रयाग में स्नान व दान आदि करने पर विशेष पुण्य प्राप्त होता है। क्योंकि उस समय समस्त तीर्थ, सभी पवित्र परियां, समस्त देवता-देवियां -अप्सरायें आदि पितृगण आदि त्रिवेणी में स्नान करने आते हैं। प्रयाग उन चार स्थलों में प्रमुख है जहां बारहवें वर्ष में कुंभ पर्व और उनके पश्चात छठे वर्ष में अर्ध कुंभ आता है। यहां आने वालों का स्वागत स्वयं भगवान करते हैं।


जो कुंभ पर्व देव लोक में बारहवें दिन आता है वह हम सभी व्यक्तियों के लिए बारहवें वर्ष प्रयागादि तीर्थों में आता है। यह भी कहा गया है कि भूलोक में प्रयागादि चार स्थानों पर अमृत कंभ में से अमृत की बूंदें भी गिरी थीं। जिससे इन स्थानों के जल में अमृत का प्रभाव आ गया। अत: इन स्थानों पर बारहवें वर्ष आयोजित स्नान पर्व कुंभ पर्व के नाम से प्रसिद्ध हुआ। विष्णुपुराण में कुंभ स्नान की महत्ता का वर्णन इस प्रकार है।

अश्वमेघसहाणि वाजपेयशतानि च।

लक्षंप्रद क्षिणा: पृथ्व्य: कुंभस्नानेन तत्फलम्।

अर्थात सह अश्वमेघ, शत वाजपेय और पृथ्वी की लक्ष प्रदक्षिणा करने से जो फल प्राप्त होता है, वही कुंभ स्नान से प्राप्त होता है।

कुंभ राष्ट्रीय भावनात्मक एकता के रूप में आध्यात्मिक सर्वधर्म समभाव एवं अनेकता में एकता की भावना को विकसित करता है। वस्तुत: यह जीवन में समत्व त्याग उदारता व एकता आदि का पर्व है। यह समन्वय, सहिष्णुता व संस्कृति का केन्द्र बिन्दु है। साथ ही यह भारतीय चिन्तन धारा का राष्ट्रीय पर्व है।

प्रयाग कुंभ की महत्ता सबसे अधिक है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार ब्रह्माण्ड की रचना से पहले जगतसृष्टा ब्रह्मा ने यहीं पर अश्वमेध यज्ञ किया था। इस यज्ञ के प्रतीक यहां आज भी हैं और यहां लगने वाले कुंभ के महत्व को बढ़ाते हैं। प्रयाग राज कुंभ में दान की परम्परा इसे और अधिक ऊंचाइयां देती हैं। राजा हर्षवर्धन यहां आकर अपना सर्वस्व दान कर देते थे।

पद्मपुराण में तीर्थराज प्रयाग की महत्ता का गान करते हुए यह लिखा है-

ग्रहाणी च यथा सूर्यो नक्षत्राणां यथा शशी।

तीर्थनामुत्रमं तीर्थ: प्रयागारव्यमनुत्तमम्।।

इसी प्रकार मत्स्य पुराण में प्रयाग के तीर्थराजत्व को इस प्रकार स्वीकार किया गया है-

तथा सर्वेषु लोकेषु प्रयागं पूजयेद्बुध:।

पूजते तीर्थराजस्तु सत्यमेव युधिष्ठिर:।।

मध्यकालीन भक्ति क्रांति के उद्गाता संत कवि गोस्वामी तुलसीदास जी ने तो त्रिवेणी के दर्शन मात्र से समस्त दु:ख दारिद्रय का भंजक बताया है-

चंवर जमुन अरु गंग तरंगा।

देखि होहि दुख दारिद भंगा।।

वस्तुत: पृथ्वी पर लगने वाले सभी कुंभों में प्रयाग कुंभ की महत्ता सर्वोपरि है। गंगा-जमुना का संगम स्वत: मोक्ष है और उसके ऊपर कुंभ का अत्यन्त पावन अमृत समागम। कुंभ की महिमा और वह भी त्रिवेणी पर लगे कुंभ की महिमा का गान इस प्रकार किया गया है-

कुम्भे स्नात्वा च पीत्वा च त्रिवेण्यां च युधिष्ठिर।

सर्वपापविनिर्मुक्ता: पुनाति सप्तमं कुलम्।।

अर्थात हे युधिष्ठिर। कुंभ की त्रिवेणी में स्नान करके तथा उसका जलपान करके व्यक्ति अपनी सात पीढिय़ों का उद्धार करता है।

ऋग्वेद में कहा गया है-

यत्र गंगा च यमुना च यत्र प्राची सरस्वती।

यत्र सोमेश्वरी देवस्तत्र माममृतं कृधींद्रायेन्दो परिव।।

अर्थात हे सोम। जिस तीर्थ में गंगा-यमुना, सरस्वती और शिव विद्यमान हैं वहां आप आकर अमरता प्रदान करें।

2019 के प्रयागराज कुंभ में समूचा भारत अपनी सारी विविधताओं, परम्परा और संस्कृति के साथ देखने को मिलेगा। यह कुंभ भव्य व दिव्य बने इसके लिए सरकार पूर्णत: कटिबद्ध है। इस कुंभ से पूरी दुनिया में भारत की गौरवशाली परम्परा, सभ्यता और संस्कृति का संदेश जाएगा। श्रद्धालुओं के लिए विभिन्न अखाड़ों के शाही स्नान इस बार विशेष कौतुल लिए होंगे। यहां इस बार के मेले में धर्म अध्यात्म के विभिन्न पहलुओं के साथ आधुनिक तकनीक का भी प्रर्दशन होगा। मेला क्षेत्र में विकास से सम्बन्धित भी काफी कुछ नया होगा। पूरे मेला क्षेत्र को दुधिया रोशनी से सजाया जा रहा है। स्वच्छ भारत मिशन के तहत विशेष प्रकार के शौचालय बनाए जा रहे हैं। जगह-जगह इलैक्ट्रानिक डिस्पले बोर्ड लगाए जा रहे हैं, जिन पर कुंभ की महत्ता के अलावा उत्तर-प्रदेश और भारत सरकार की विभिन्न लोक कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी है।

गोपाल चतुर्वेदी वरिष्ठ साहित्यकार व आध्यात्मिक पत्रकार हैं

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स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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