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संतुलन में रहना ही सबसे बड़ा धर्म है

संतुलन में रहना ही सबसे बड़ा धर्म है

संसार और ईश्वर के बीच संतुलन बना कर चलना ही मनुष्य का धर्म है। जीवन का प्रत्येक क्षण मनुष्य के लिए एक उपहार है। सामने जो क्षण है, उसे उसी रूप में पूरी तरह स्वीकार करना ही धर्म का मर्म है। ध्यात्मिक पथ पर तीन कारक होते हैं: बुद्ध- सत्गुरु या ब्रह्मज्ञानी; संघ- सम्प्रदाय या समुदाय और; धर्म- आपकी प्रकृति, आपका सच्चा स्वभाव। आप बुद्ध के जितना निकट जाएंगे, आपको उतना ही अधिक आकर्षण मिलेगा, आप ब्रह्मज्ञानी से कभी ऊबते नहीं। जितना समीप जाएंगे, उतनी ही अधिक नवीनता और प्रेम का अनुभव मिलता है।

गुरु एक द्वार है, और द्वार को दुनिया से अधिक आकर्षक होने की आवश्यकता है, ताकि लोग द्वार तक आएं। बाहर बारिश और बिजली कड़क रही है या चिलचिलाती धूप है और कोई सड़क पर है... उन्हें आश्रय की जरूरत है। वे अपने चारों ओर ढ़ूंढ़ते हैं, उन्हें एक द्वार दिखता है। द्वार अपनी ओर आमंत्रित कर रहा है, वह दुनिया की किसी भी चीज से अधिक आकर्षक, आनन्द और हर्षोल्लास से परिपूर्ण दिखता है। इतनी शांति, इतना आनंद और सुख दुनिया में और कुछ भी नहीं दे सकता है। द्वार तक आने पर, आप दरवाजे के अंदर प्रवेश कर जाते हैं और गुरु की आंखों से दुनिया को देखते हैं। यह एक संकेत है कि आप गुरु के पास पहुंच गए हैं। अन्यथा, आप सड़क पर खड़े हुए अभी तक द्वार को देखते रह सकते हैं।
एक बार आपने द्वार से अंदर प्रवेश कर लिया तो आप गुरु की आंखों से सारी दुनिया को देखेंगे। इसका क्या अर्थ है? हर स्थिति का सामना करते हुए आप सोचेंगे कि 'यह स्थिति यदि गुरुजी के सामने आती तो वह उसको कैसे संभालते?' 'यह जटिल परिस्थिति यदि गुरुजी के सामने आती तो वह उसे किस प्रकार से लेते?' 'अगर कोई गुरुजी को यह दोष लगाता तो वह उसको कैसे संभालते?' हर समय गुरु की आंखों से दुनिया को देखें। तो दुनिया और अधिक सुंदर लगती है। वह प्रेम, आनंद, परस्पर सहयोग, दया और सभी सद्गुणों से भरी हुई जगह है। दुनिया में और अधिक आनंद है। द्वार के माध्यम से देखने से कोई डर नहीं लगता है, क्योंकि वहां शरण है।
अपने घर के अंदर से आप कड़कती बिजली, तूफान और बारिश को देख सकते हैं। आप आराम से तपते सूरज को देख सकते हैं, क्योंकि अंदर वातानुकूलन है। वह ठंडा और बहुत ही सुखद है। बाहर बहुत गर्मी है। आपको बुरा नहीं लगता है, क्योंकि वहां ऐसा कुछ भी नहीं है, जो वास्तव में आपको विचलित कर पाए, परेशान करे, या अतृप्त करे। ऐसी सुरक्षा की भावना से परिपूर्णता और आनंद की भावना का आविर्भाव होता है। यही गुरु के होने का उद्देश्य है। दुनिया के सभी संबंधों में उतार-चढ़ाव आता है। आप रिश्तों को बनाते हैं और बिगाड़ते हैं। फिर राग और द्वेष होता है। यही दुनिया है, यही संसार है। परंतु, गुरु कोई संबंध नहीं है, गुरु एक सत्ता है। गुरु को अपनी दुनिया का एक हिस्सा भर ना बनाएं। गुरु की सत्ता को महसूस करें, जो शाश्वत है। वह आपके साथ पहले भी रह चुकी है, वह अभी आपके साथ है और भविष्य में भी रहेगी।

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स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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