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11वीं सदी का निर्मित है। मां जागेश्वरी देवी का मन्दिर

11वीं सदी का निर्मित है। मां जागेश्वरी देवी का मन्दिर

अशोकनगर/चंदेरी/स्वदेश वेब डेस्क। इन दिनों मध्यप्रदेश में नवरात्रि का पर्व धूमधाम से मनाया जा रहा है। सुदूर पहाड़ियों पर स्थित देवी मां के मंदिरों में सुबह से देर रात श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। गांवों से लेकर शहरों तक में माहौल भक्तिपूर्ण हो गया है| लोग देवी मां की आराधना में जुटे हैं। अशोकनगर जिले के चंदेरी नगर में स्थित मां जागेश्वरी देवी के दर्शन के लिए भी इन दिनों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है। बताया जाता है कि मां जागेश्वरी देवी यहां नवरात्रि में ही प्रकट हुई थीं।

ऐतिहासिक नगरी चन्देरी के कीर्तिदुर्ग की मनोहारी प्राकृतिक सुषमा से भरपूर पहाड़ी के मध्य एवं नगर के दक्षिण पूर्व में मां जागेश्वरी देवी का भव्य विशाल मंदिर निर्मित है, जहां प्रतिवर्ष सभी धर्मों के हजारों धर्मावलम्बी दर्शनार्थ आते हैं। यहां माता का जागृत रूप दिखाई देता है| इस कारण दर्शनार्थी अपनी मनोकामनाएं लेकर आते हैं। इसी कारण से इस स्थल का नाम जागेश्वरी देवी मन्दिर विख्यात है।

मंदिर का इतिहास

चन्देरी नगर के इतिहासकार एवं पुरातत्वविद् डॉ. अविनाश कुमार जैन ने बताया कि परवर्ती प्रतिहार वंश के सातवें राजा कीर्तिपाल (कूर्मदेव) के कुष्ठ रोग से पीडि़त हो गए। तब यहां के परमेश्वर तालाब से उनके कुष्ठ रोग का क्षय हुआ था। कुष्ठरोग से पीडि़त कूर्मदेव ने जब परमेश्वर के जल में स्नान किया, तो उनके शरीर का सम्पूर्ण कुष्ठ रोग दूर हो गया। यह चमत्कार देख उन्होंने जोर-जोर से चिल्लाकर अदृश्य शक्ति रूपी ईश्वर का धन्यवाद दिया| तभी बालिका रूप में एक देवी प्रकट हुईं। देवी ने राजा से कहा कि आप जहां राजा शिशुपाल ने यज्ञ कराया था, उस स्थल पर एक मन्दिर का निर्माण कराएं और उस मन्दिर के निर्माण के पश्चात मन्दिर की शुद्धि कर मेरा आह्वान कर नौ दिवस के लिए मन्दिर के द्वार बन्द कर दें| मैं वहां अपने स्वरूप में स्वत: प्रकट हो जाऊंगी। लेकिन जिज्ञासावश मन्दिर के द्वार तीन दिन बाद ही खोल दिये। इस कारण यहां पर पर्वत में देवी जी का मात्र मुख ही प्रकट हो पाया। शेष शरीर प्रकट नहीं हो सका।

देवी के प्रकट होने की अनेक मिलती-जुलती अनुश्रुतियां यहां प्रचलित हैं। इनमें से एक और अनुश्रुति इस प्रकार है कि कीर्तिपाल ने चन्देरी को स्थापित कर चन्देरी को ही अपना निवास स्थान बना लिया था। उनकी रानी देवीजी (माता) की अनन्य भक्त थीं। एक दिन स्वप्न में देवी जी ने रानी दर्शन दिये और कहा कि हम तुम्हारी श्रृद्धा-भक्ति से प्रसन्न हैं और हम यहां प्रकट होना चाहते हैं। तुम नवरात्रि के पूर्व राजा शिशुपाल के यज्ञ स्थल पर एक मन्दिर का निर्माण कराओ और नवरात्रि में नौ दिन मन्दिर के द्वार बन्द कर देना तो मैं वहाँ प्रकट हो जाऊंगी। उसी प्रकार मन्दिर के द्वार तीन दिन ही खोल दिये और देवी का मुख भाग ही दिखाई दिया।

देवी दर्शन के साथ अन्य दर्शन

इस प्रकार चन्देरी के संस्थापक कीर्तिपाल के समय के अनुसार यह मन्दिर लगभग 11वीं सदी का निर्मित है। इस मन्दिर में मां जागेश्वरी देवी जी के मन्दिर के दायें ओर शिव परिवार तथा बांई ओर गुरु दत्तात्रेय जी का मन्दिर निर्मित है। मन्दिर जी के परिसर में दो विशाल हजारिया शिवलिंग, बटुक भैरव जी तथा अनेक लघुरूप में शिवलिंग परिवार विराजमान हैं। पर्वत में गणेश जी एवं हनुमान जी की प्रतिमाओं के साथ क्षेत्रपाल महाराज भी उत्कीर्ण हैं, जिनके दर्शन कर दर्शनार्थी धर्मलाभ अर्जित करते हैं।

इस स्थल का अवलोकन करने वर यह ज्ञात होता है कि देवी जी के मन्दिर के निर्माण के उपरांत बुन्देला राजाओं के समय इस मन्दिर का विस्तार हुआ है। इस स्थल पर विराजमान गणेश जी की प्रतिमा पर उत्कीर्ण संवत् 1717 कार्तिक सुदी 11, (सन् 1660 ई.) के नागरी लिपि के अनुसार किसी धार्मिक महिला द्वारा यहां गणेश जी एवं भैरव देवजी की प्रतिमा उत्कीर्ण कराई थीं।

इसी प्रकार इस स्थल से श्री हनुमान जी की प्रतिमा पर उत्कीर्ण संवत् 1741 भद्रपद वदी 15, (सन् 1684 ई.) के लेख के अनुसार चन्देरी के धार्मिक अनुयायियों द्वारा दान राशि एकत्र कर इस मूर्ति का निर्माण कराया गया था। इसी प्रतिमा के समीप पर्वत पर एक और अस्पष्ट शिलालेख उत्कीर्ण है जो संवत् 1743 का है। यह स्थल मन को प्रफुल्लित करने वाला प्राकृतिक स्थल है। यहां पर प्राकृतिक रूप से पहाड़ों से जल झरता बहता है, जो एक लघु कुण्ड में एकत्र होता है। इसका जल अत्यन्त मीठा व स्वादिष्ट अनुभव होता है। मन्दिर परिसर में तीन विशाल कुण्ड भी निर्मित हैं।

स्वर्ग की सीढ़ी

इस मन्दिर परिसर के नीचे जाने पर भी कुण्ड बनाये गये हैं। नीचे के कुण्ड के समीप दालान में एक स्वर्ग की सीढ़ी निर्मित है। इस सीढ़ी का निर्माण पत्थर पर अंगूठे के निशान उकेर कर किया गया है। ऐसी अनुश्रुति है कि इस सीढ़ी पर जो भी अंगूठों को रख कर ऊपर तक चढ़ जाएगा, वह स्वर्ग पहुंच जाएगा। यह धार्मिक श्रद्धा कहें या इस स्थल पर आने के पश्चात् एक मनोरंजन का साधन, सभी के अपने-अपने भाव हैं।

सागर ताल

जागेश्वरी देवी के मन्दिर के नीचे एक सागर ताल है। जो वर्षा ऋतु में पर्वत के ऊपर से आते झरनों की कल-कल आवाज के साथ भर जाता है। इस ऋतु में इस मन भावक स्थल का सौन्दर्य चार गुना बढ़ जाता है। इस सागर ताल के द्वार पर तीन भाषाओं का एक शिलापट्ट अंकित है। जिसके अनुसार इसका निर्माण श्रीमंत सरकार महाराजा माधोराव साहब सिंधिया आलीजाह बहादुर के आदेश से सन् 1884 ई. में निर्मित हुआ था। इस ताल के दरवाजे के समीप ही राधाकृष्ण जी का एक मन्दिर निर्मित है।

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स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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