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सिंधिया को आखिर कौन सा पद चाहिए ?

दिग्गी के दौरे के बाद अब दो दिवसीय प्रवास पर आ रहे हैं सिंधिया

सिंधिया को आखिर कौन सा पद चाहिए ?

ग्वालियर, विशेष प्रतिनिधि। पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया का बार-बार किसी न किसी पद के लिए नाम सामने आता रहा है। जिसमें मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, राष्ट्रीय अध्यक्ष और प्रदेश अध्यक्ष के पद की दौड़ में उनका नाम शामिल रहा हैं। किंतु अभी तक स्वयं श्री सिंधिया की ओर से ऐसी कोई मंशा सीधे तौर पर सामने नहीं आई है कि वे आखिर कौन सा पद चाहते हैं? यदि सिंधिया के मन में किसी पद की बात है तो वे सीधे-सीधे हाईकमान से अपनी इच्छा जाहिर क्यों नहीं कर पा रहे, जबकि उनके समर्थक पूरे प्रदेश में भूचाल मचाए हुए हैं। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि श्री सिंधिया इस पूरे मामले में इतने समय से मौन क्यों हैं? उधर प्रदेश में सरकार बनने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने सिंधिया समर्थकों की वाट लगा रखी है।जहां श्री सिंधिया अभी तक एक भी राजनीतिक नियुक्ति नहीं करवा पाए हैं, वही महाराज के गढ़ में अशोक सिंह को अपेक्स बैंक का प्रशासक बनवाकर दिग्विजय सिंह ने उन्हें करारी चोट दे दी। फिर दो रोज पहले उनका ग्वालियर भिंड के दौरे में जिस तरह से स्वागत हुआ और उनके द्वारा प्रदेश अध्यक्ष के लिए युवा चेहरे को सामने रखा गया,उसमें भी कहीं न कहीं दिग्गी की कोई चाल मानी जा रही है। चूंकि श्री सिंधिया अब दो दिवसीय दौरे पर ग्वालियर आ रहे हैं तो सबकी निगाहें इस ओर है कि क्या वे मौजूदा राजनीतिक मसले पर कुछ बोलेंगे।

बात दिसंबर 2018 की है, जब प्रदेश में चुनाव होने के बाद 17 दिसंबर को मुख्यमंत्री पद के लिए कमलनाथ के नाम का ऐलान हुआ। इस घोषणा से न सिर्फ सिंधिया,बल्कि उनके समर्थक बेहद मायूस हो गए। फिर क्या था कई विधायकों और नेताओं ने शक्ति प्रदर्शन के लिए सीधे सिंधिया के दिल्ली स्थित सरकारी निवास पर धरना देना शुरू कर दिया। उनकी मांग थी कि यदि हमारे महाराज को मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया है तो उन्हें उपमुख्यमंत्री अथवा प्रदेश अध्यक्ष ही बना दिया जाए। यह धरना दो दिन चला। लेकिन जैसा कि यह माना जा रहा था कि इस धरने में सिंधिया समर्थक विधायकों की संख्या काफी होगी, किंतु वहां एक दर्जन के आसपास ही विधायक आए।जिससे साबित हुआ था कि सिंधिया खेमे में ज्यादा वजनदारी नहीं है।तब वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं एवं विधायकों से श्री सिंधिया ने कहा कि इस तरह धरना प्रदर्शन करना ठीक नहीं है। मेरी राहुल गांधी से बेहद नजदीकियां हैं वह मेरे दोस्त हैं। उन्हें अच्छा नहीं लगेगा। वे जरूर कोई अच्छा निर्णय लेंगे। इस आश्वासन पर सिंधिया समर्थक विधायक भोपाल में मुख्यमंत्री कमलनाथ के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुए। इसके बाद दिन पर दिन गुजरते गए, किंतु प्रदेश में सिंधिया को किसी तरह का पद नहीं मिला। इसके बाद लोकसभा परिणाम आए तो बेहद निराश राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने इस्तीफे की पेशकश कर दी। तब एक बार फिर अन्य वरिष्ठ नेताओं के साथ श्री सिंधिया का नाम इस पद के लिए चला कि उन्हें भी राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जा सकता है। किंतु 70 दिन तक चली पशोपेश के बाद गांधी परिवार की मुखिया सोनिया गांधी को यह पद मिला।यहां सिंधिया समर्थकों को एक बार फिर निराश होना पड़ा। क्योंकि उन्हें लगा था कि राष्ट्रीय अध्यक्ष न सही राष्ट्रीय संयुक्त अध्यक्ष पद जरूर सिंधिया को मिल सकता है। किंतु ऐसा भी नहीं हुआ इस बीच प्रदेश में मुख्यमंत्री कमलनाथ के साथ पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और उनके अन्य सहयोगियों ने पूरे प्रदेश में अपनी धाक जमाना शुरू कर दी। जिससे सिंधिया समर्थक मंत्री और विधायकों को कहीं न कहीं नीचा देखना पड़ा। इस दौरान सिंधिया समर्थक मंत्रियों की झड़प मुख्यमंत्री से कैबिनेट बैठक के दौरान हुई। यहां बात इसलिए ज्यादा तूल इसलिए नहीं पकड़ी, क्योंकि कमलनाथ की सरकार वैशाखियों पर है। उन्हें कहीं न कहीं डर है कि यदि अपने धड़े के कुछ विधायक टूटकर सामने के पाले में चले गए तो सरकार ढह जाएगी। यही कारण है कि वह अपने मंत्रिमंडल का विस्तार नहीं कर पा रहे। क्योंकि उसमें खराब परिणाम वाले कुछ मंत्रियों को हटाया जाना है, जिनमें कुछ सिंधिया समर्थक भी हैं।

खैर, लोकसभा परिणाम में श्री सिंधिया को भी गुना शिवपुरी में अप्रत्याशित हार का सामना करना पड़ा। जिसके बाद सवाल खड़े हो रहे हैं कि वे केंद्र में राजनीति करेंगे अथवा प्रदेश में। चूंकि प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है और सिंधिया खेमे का दखल बना रहे इसी दृष्टि से उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने की मांग उठ खड़ी हुई है।इसके लिए हाईकमान पर दबाव डालने सिंधिया समर्थक पूरे प्रदेश में लामबंद हो गए हैं। कहीं इस्तीफे का दौर चल रहा है तो कहीं धरना प्रदर्शन किए जा रहे हैं। किंतु इन सबके बावजूद स्वयं सिंधिया अभी भी चुप्पी साधे हुए हैं। इस बीच सोशल मीडिया पर उनके पुत्र महाआर्यमन सिंधिया और स्वयं उनके फेसबुक वॉल पर टराहट और व्यंग्यात्मक शैली में शेरो शायरियां आना शुरू हुई तो लगा कि इसमें कहीं न कहीं महाराज की ही सहमति है। ताकि दबाव के चलते उन्हें कोई बड़ा पद मिल जाए। यहां सवाल यह भी उठ रहा है कि पिछली लोकसभा में श्री सिंधिया के पास केंद्रीय मंत्री के अलावा संसदीय दल के सचेतक का भी पद था। ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष का पद उनके कद के हिसाब से छोटा है, किंतु उनके द्वारा इस पद के लिए इंकार नहीं किए जाने से तरह तरह की बातें हो रही हैं। इन चर्चाओं में यह बात भी सामने आई थी कि वे अपने समर्थक विधायकों के एक धड़े को लेकर या तो अलग पार्टी बना सकते हैं या फिर भाजपा में शामिल हो सकते हैं, तब उन्हें मुख्यमंत्री पद जरूर मिल सकता है। किंतु इन कयासों का पिछले दिनों उज्जैन दौरे के दौरान उन्होंने खंडन किया था।

इस बीच दिग्गी राजा ने अपने निकटतम सहयोगी ग्वालियर के अशोक सिंह को अपेक्स बैंक के प्रशासक जैसे महत्वपूर्ण पद पर पहुंचा दिया। यह नियुक्ति एक तरह से सिंधिया खेमे के लिए उन्हीं के गढ़ में धक्का है। क्योंकि श्री सिंधिया अभी तक ् अपने किसी भी समर्थक को कोई राजनीतिक पद नहीं दिला पाए हैं।इसके बाद रही सही कसर दो रोज पहले पूरी हो गई। जब दिग्विजय सिंह ग्वालियर प्रवास पर आए तो उनके स्वागत में तमाम कांग्रेस नेता रेलवे स्टेशन और अशोक सिंह के निवास पर पहुंचे।किंतु सिंधिया समर्थक मंत्री, विधायक और जिला कांग्रेस ने उनका बहिष्कार किया। जैसा कि दिग्विजय सिंह का स्वभाव है, उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष मामले में हांगकांग का उदाहरण देते हुए यह कह दिया कि प्रदेश अध्यक्ष युवा चेहरे को होना चाहिए। यह बात भी एक तरह से सिंधिया के लिए झटके से कम नहीं है। दिग्विजय सिंह के दौरे के बाद अब श्री सिंधिया 3 और 4 सितंबर को ग्वालियर के व्यस्ततम दौरे पर आ रहे हैं। ऐसे में पूरे प्रदेश के साथ ही ग्वालियरवासियों की निगाहें इस ओर हैं कि वे मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रम पर अपनी ओर से कुछ कहते हैं या नहीं। वैसे इस संदर्भ में शहर जिला कांग्रेस अध्यक्ष डॉ देवेंद्र शर्मा एवं ग्रामीण अध्यक्ष मोहन सिंह राठौड़ कहते हैं कि कांग्रेस एवं आमजन की मंशा है कि महाराज किसी बड़े पद पर आएं। इसी दृष्टि से उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने की मांग की जा रही है।इसमें स्वयं श्री सिंधिया की ओर से ऐसी मंशा व्यक्त नहीं की गई है।

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