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रेलवे की योजना से ट्रैक तो साफ हुए लेकिन कोचों के अंदर दम घुट रहा है यात्रियों का

रेलवे की योजना से ट्रैक तो साफ हुए लेकिन कोचों के अंदर दम घुट रहा है यात्रियों का

जैविक शौचालय से निकलने वाली गैस से यात्री हो रहे परेशान

ग्वालियर, न.सं.

रेलवे ट्रैक पर होने वाली गंदगी को कम करने और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए रेलवे ने ट्रेनों में जैविक शौचालय (बायोटॉयलेट) लगाए हैं। रेलवे की योजना से ट्रेक तो साफ हो गए हैं, लेकिन ट्रेनों के कोचों में दुर्गंध से यात्रियों का दम घुट रहा है। दरअसल बैक्टीरिया द्वारा मानव मल को पचाने के बाद निकलने वाली गैस से यात्रियों को यात्रा के दौरान खासी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। यात्री भी अब इसकी शिकायत करने लगे हैं। शौचालय के पास वाली बर्थ के यात्रियों को इससे ज्यादा परेशानी हो रही है। सामान्य और स्लीपर कोचों के अलावा एसी कोचों में यात्रियों को ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ता है। एसी कोचों में बिजली आपूर्ति व्यवस्थित नहीं होने और एसी के ठीक तरह से काम नहीं करने पर यात्रियों द्वारा सफोकेशन की शिकायत की जा रही है। रेलवे अधिकारियों के ट्विटर अकाउंट पर भी दुर्गंध संबंधी शिकायतें पहुंच रही हैं।

दुर्गंध के लिए यात्री भी जिम्मेदार

जैविक शौचालय वाले कोच में दुर्गंध के लिए यात्री भी जिम्मेदार हैं। दरअसल यात्रा के दौरान यात्री शौचालय में कागज व डायपर सहित अन्य सामग्री फेंक देते हैं, जिससे टैंक चौक हो जाता है। पानी नहीं निकलने की वजह से बैक्टीरिया काम नहीं कर पाते हैं और दुर्गंध बढ़ जाती है। चलती ट्रेन में जैविक शौचालय का संधारण नहीं हो पाता है और यात्रियों को दुर्गंध के बीच ही यात्रा करना पड़ती है।

कैसे काम करता है जैविक शौचालय

जैविक शौचालय का आविष्कार डिफेंस रिसर्च डेवलेपमेंट ऑर्गेनाइजेशन (डीआरडीओ) द्वारा किया गया है। इस तरह के शौचालय में नीचे की ओर एक टैंक होता है। इसमें एनरोबिक बैक्टीरिया होते हैं, जो मानव मल को पानी और गैस में बदल देते हैं। ये गैस टैंक से बाहर आ जाती है और पानी को ट्रीटमेंट के बाद बाहर निकाल दिया जाता है।

Naveen ( 0 )

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