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एक विलक्षण व्यक्तित्व: महिपति बालकृष्ण चिकटे

एक विलक्षण व्यक्तित्व: महिपति बालकृष्ण चिकटे

ग्वालियर में इन दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रतिनिधि सभा का आयोजन है। इसी प्रसंग को लेकर अंचल के एक तपोनिष्ठ प्रचारक के भावुक प्रसंग

हरिहर निवास शर्मा

आपातकाल के दौरान ग्वालियर केन्द्रीय काराग्रह में जिन महानुभाव से सर्वाधिक प्रभावित हुआ, वे थे ग्वालियर के शिक्षाविद श्री महीपति बालकृष्ण जी चिकटे। पूर्व में संघ प्रचारक रहे किन्तु बाद में ठाना कि संघ कार्य करना तो आत्म निर्भर होकर करना, अत: एक निजी विद्यालय में अध्यापक हो गये। नाम प्रचारक नहीं था किन्तु आजीवन प्रचारकवत ही कार्य किया, यहाँ तक कि अविवाहत ही रहे।

जब प्रचारक थे तब संघ ने योजना बनाई कि भिंड के दुर्गम क्षेत्र में शिक्षा के माध्यम से संघ कार्य किया जाए ! तत्कालीन भिंड प्रचारक स्व. मानिकचंद जी वाजपेई उपाख्य मामाजी के तत्कालीन कलेक्टर आर सी राय से अच्छे सम्बन्ध थे, अत: एक दुर्गम इलाके में 8 बीघा भूमि विद्यालय हेतु प्राप्त हो गई तथा जन सहयोग से विद्यालय निर्माण का कार्य प्रारम्भ हुआ ! अडोखर, टपरा तथा लहार के बीच स्थित इस स्थान पर पहुंचना तो आज भी काफी कठिन होता है, उस समय क्या स्थिति रही होगी, इसकी सहज कल्पना की जा सकती है ! सडक़ से 30 कि.मी. पैदल चलकर अथवा बैलगाड़ी से ही वहां जाया जा सकता था ! अडोखर से अ, टपरा से ट तथा लहार से ल अक्षर मिलाकर इस स्थान का नामकरण किया गया - अटल नगर ! और शुरू हो गया विद्यालय निर्माण का कार्य।

उन दिनों चूने से भवन निर्माण होता था तथा पत्थर के बड़े बड़े चक्कों से चूने को मिलाया जाता था ! इन चक्कों को दो बैल मिलकर खींचते थे ! देव योग से केवल एक ही बैल उपलव्ध हुआ ! काम को रुका देखकर चिकटे जी बैल की जगह स्वयं जुत गए ! ग्राम वासी कुछ समय तक तो यह तमाशा देखते रहे किन्तु फिर उन्हें लगा कि हमारे बच्चों की खातिर चिकटे जी इतना श्रम कर रहे हैं ! उनके ह्रदय में चिकटे जी के प्रति सम्मान जागृत हुआ और फिर तो क्या वृद्ध क्या जवान, सभी कार्य में जुट गए ! इस घटना के बाद से अवैतनिक प्रधानाचार्य चिकटे जी तो पूरे गाँव ही नही पूरे इलाके के लिए श्रद्धा का केंद्र बन गए ! इस घटना ने संघ कार्य स्थापित करने में अहम् भूमिका निर्वाह की !

उनका क्षेत्र में कितना सम्मान था, इसका उदाहरण है एक घटना

सनक सनंदन सनत्कुमार की तपोभूमि सनकुआ सेवढा पर प्रतिवर्ष मकर संक्रान्ती के अवसर पर मेला लगता है जिसमें लाखों श्रद्धालू पहुंचते हैं ! 70 के दशक में ग्वालियर से एक बार चिकटे जी के साथ वरिष्ठ संघ स्वयंसेवक श्री अरविंद धारप, श्री उदय काकिर्ड़े, श्री पद्माकर मोघे, श्री विवेक शेजवलकर (वर्तमान ग्वालियर महापौर) भी मेले के अवसर पर वहां पहुंचे ! लौटते समय बसों में भारी भीड़ थी ! ऊपर छत पर भी सवारी बैठी हुई थीं ! यह स्थिति देखकर इन लोगों को चिंता हुई कि वापस ग्वालियर कैसे पहुचेंगे ! किन्तु चिकटे जी मस्ती से मुस्कुराकर स्थिति का आनंद ले रहे थे ! शेष लोगों के अचरज का ठिकाना नही रहा जब देखा कि चिकटे जी को देखते ही लगभग पूरी बस के यात्री नीचे उतरकर अपनी अपनी सीट ऑफर करने लगे ! भिंड दतिया में इतना आदर सम्मान का भाव था चिकटे जी के लिए !

पूज्य सुदर्शन जी चिकटे जी की क्षमताओं से भली भाँति परिचित थे, अत: जब वे उत्तर पूर्व क्षेत्र प्रचारक नियुक्त हुए तब उन्होंने चिकटे जी को असम की जन जातीय भाषा को लिपि देने के दुष्कर कार्य हेतु आसाम भेजा !

उस समय पूर्वांचल की 82 जनजातियों में प्रत्येक का खानपान, रहन सहन तथा बोलियां अलग अलग थीं ! लगभग 16 जनजातीय भाषाओं की कोई लिपि नहीं थी ! इस स्थिति को देखते हुए अंग्रेजों ने ईसाईयत के प्रचार की दृष्टि से रोमन लिपि प्रारम्भ करवा दी थी ! किन्तु तभी बहां श्री के.ए.एन.राजा लेफ्टीनेंट गवर्नर होकर पहुंचे, उन्हें यह स्थिति सहन नही हुई और उन्होंने सरकारी कामों में नागरी लिपि प्रारम्भ करबाई ! जो लोग ईसाई नहीं बनना चाहते थे उन्हें इससे बड़ा आनंद हुआ !

प.पू. डाक्टर साहब की जन्म शताव्दी पर उनका जीवन वृत्त आसाम की जन जातियों में कैसे पहुंचाया जाए, इस पर विचार हुआ ! आसाम के दुरूह वनबासी अंचलों में घूम घूम कर चिकटे जी ने बंगला व असमिया भाषा, उसके उच्चारण तथा उच्चारण कर्ता की भाव भंगिमा का गंभीर अध्ययन किया ! उनके अथक परिश्रम के परिणाम स्वरुप ही पूज्य डॉ. हेडगेवार जी की जन्म शताब्दी वर्ष के दौरान उनकी बोली के शव्दों को नागरी लिपि में लिखकर बच्चों को बंटबाई गईं !

बंगला, मराठी, तेलगू, असमी, मणिपुरी, तमिल भाषाओं पर चिकटे जी का पूर्ण अधिकार था ! इंग्लिश में तो उन्होंने एम.ए. किया ही था ! उनका संस्कृत उच्चारण भी अत्यंत परिष्कृत था ! मीसाबंदी के रूप में एक सह बंदी से उन्होंने जर्मन भी पूरे मनोयोग से सीखी थी !

तो ऐसे विलक्षण व्यक्तित्वों की नींव पर स्थित है ग्वालियर अंचल का संघ कार्य !

Naveen ( 1696 )

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