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घर-घर दाना चुगने वाली "गौरैया" हो रही बिलुप्त, पर्यावरण के प्रति नहीं जागे तो...

कार्यालय में ग्रीन कॉरिडोर तैयार कर दे रहें पर्यावरण संरक्षण का संदेश... जंगल हैं तो मंगल हैं

ग्वालियर। आधुनिक युग में बढ़ते प्रदूषण से प्रकृति के हो रहे दोहन के प्रति लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से भू-अभिलेख आयुक्त कार्यालय मोतीमहल में पदस्थ प्रदीप लक्षणे पर्यावरण संरक्षण का सदेश दे रहे हैं। वह हैं। वह पिछले दो सालो से अपने कार्यलय परिसर में प्रदर्शनी लगाकर लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक कर रहे हैं।

लैंड रिकार्ड में ट्रेसर के पद पर कार्यरत प्रदीप लक्षणे ने ऑफिस के बाहर गंदगी व कचरे को साफ कर ग्रीन कॉरीडोर तैयार किया है। अपने वेतन से राशि खर्च कर लक्षणे ग्रीन कारपेट लाए हैं एवं उस कारपेट के ऊपर गमलों में पौधे लगाकर रख दिए हैं। उन्होंने कार्यालय परिसर में गंदी दीवार पर कलर भी करवाया है ताकि यहां से निकलने वाले लोगों को अच्छा महसूस हो। इसके लिए वे प्रतिदिन यहां खुद ही सफाई करते हैं।

उन्होंने बताया की हम अपने घर के आसपास हमेशा हरियाली और साफ़ सफाई देखना पसंद करते हैं।लेकिन लोग जिस कार्यालय में दिन के करीब आठ से दस घंटे बिताते हैं। वहां की सफाई पर ध्यान नहीं देते। घर से पहले ऑफिस को प्रथमिकता देते हुए उन्होंने अपने कार्यालय के आसपास की सफाई, पुताई एवं इसे ग्रीन कॉरिडोर में तब्दील करने का निर्णय लिया। जिससे समाज में स्वच्छता एवं पर्यावरण संरक्षण का सन्देश जाए।

कार्यालय में बनाया हैं ग्रीन कॉरिडोर

अपने ऑफिस के बाहर खाली पड़ी जगह पर ग्रीन कॉरिडोर बनाया हैं।उन्होंने बताया की इस जगह पर पहले गंदगी पड़ी रहती थी अब यहाँ उन्होंने सफाई कराकर पर्यावरण संरक्षण की प्रदर्शनी लगाईं हैं . इस प्रदर्शनी के लिए वह स्वयं के खर्च पर कारपेट, गमले आदि खरीद कर लाये हैं। उनका कहना हैं की कार्यालय में हरियाली को देखकर मन खुश रहता हैं साथ ही शुद्ध हवा भी मिलती हैं .

प्रतिदिन आधे घंटे पहले पहुँचते हैं ऑफिस

लक्षणे ने बताया की इस प्रदर्शनी को लगाने के लिए वह रोजाना सुबह आधे घंटे पहले ऑफिस पहुंच जाते है। अपने एक साथी कर्मचारी की सहायता से ग्रीन कारपेट बिछाकर उसे गमलो में लगें पौधों को सजाते हैं ।साथ ही खिलोने, पर्यावरण संरेखण के सन्देश वाले बैनर लगाते हैं शाम के समय फिर से सभी गमलों व कारपेट को वापस ऑफिस के अंदर रखते हैं ।

पर्यावरण के प्रति लोगों में जागरूकता लाने के लिए बनाया कॉरिडोर

उन्होंने बताया की बचपन में वह जब अपने घर के आँगन में बैठते थे तो कई गौरैया दाना चुगने आ जाती थी लेकिन समय के साथ पक्षियों की संख्या में कमी आती जा रहीं हैं। इसके साथ ही देश के बड़े एवं छोटे शहरों में सभी जगह नए मकान, कालोनियों की बसाहट होने से जहाँ कभी जंगल और खेत होते थे। वह सब खत्म होते जा रहें हैं, हमने अपने चारो तरफ एक क्रंकीट का जंगल बना कर तैयार कर लिया। जिसमें लोगों को सिर्फ प्रदूषित हवा मिल रहीं हैं। यहीं कारण हैं की पक्षियों और जानवरो की कई प्रजातियां विलुप्त होती जा रहीं हैं। पर्यावरण को लगातार पहुँच रहे नुक्सान से बचाने के लिए ही वह लोगों में जागरूकता पैदा करने के लिए एक छोटा सा प्रयास कर रहें हैं।

शासन ने किया सम्मानित

प्रदीप लक्षणे द्वारा पर्यावरण संरक्षण का संदेश देने के लिए किये जा रहें उनके इस कार्य के लिए कई सामाजिक संस्थाओ द्वारा सम्मानित किया जा चूका हैं. इसके साथ ही पिछले वर्ष स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर जिला कलेक्टर द्वारा भी सम्मानित किया जा चूका हैं।

घर-घर दाना चुगने वाली गौरैया के यह हैं आकड़े -

एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में पिछले कुछ सालो में गांव के साथ शहरो में 60 फीसदी की कमी आई है। इस रिपोर्ट के अनुसार देश में गौरैया के विलुप्त होने का मुख्य कारण है। गौरैया के रहने एवं खाने की वस्तुओ में कमी आना हैं। यह कमी हम इंसानो के आधुनिकता की और बढ़ने से आई है जैसे की गाँवों में किसानो द्वारा खेतों में कीटनाशकों का अंधाधुंध इस्तेमाल कर गौरेया का कुदरती भोजन भी खत्म कर दिया जा रहा है, जबकि गौरेया हानिकारक कीड़ों-मकोड़ों को खाकर फसल की रक्षा करती थी। शहरो में यह पक्षी घरो के अलावा पेड़ों पर भी घोंसला बनाती थी लेकिन रिहायशी इलाकों में अब पेड़ खत्म होते जा रहे हैं। इसके अलावा गौरेया घरों के झरोखों और आँगन में घोसला बनती थी लेकिन आधुनिक युग में अब ना तो घरों में झरोखे बचे हैं नाही आँगन ऐसे में सवाल यह हैं की गौरेया घोंसला कहां बनाए।

वनो एवं पेड़ो की कमी के यह हैं कारण -

विश्व में बढ़ती ग्लोबल वार्मिंग का मुख्य कारण हैं पेड़ो की अत्यधिक कटाई जिसका मुख्य कारण है टीसू पेपर का बढ़ता प्रयोग। टिसू पेपर के निर्माण के लिए प्रतिदिन 27000 पेड़ो की कटाई की जा रहीं हैं। इसके अलावा कागज के निर्माण के लिए भी पेड़ो की कटाई की जा रहीं हैं। पेड़ो की लगातार हो रहीं इस कटाई की वजह से जंगलो की संख्या में भी कमी आई हैं। देश के जिन स्थानों पर कभी बड़े घने जंगल हुआ करते थे वहां आज गिनती के कुछ पेड़ ही बचे हैं। जिसका विपरीत प्रभाव पर्यावरण पर पड़ने से जहाँ बारिश में कमी आई हैं वही वन्य जीवो के निवास स्थान घटने से जंगली जानवरो की कई प्रजातियां भी लुप्त होने की कगार पर पहुँच गई हैं।











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Rishav Tomar ( 0 )

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