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तीन तलाक : इसे मुस्लिम महिलाओं की नहीं केवल महिलाओं की जीत कहिए

निकाह फिल्म से तीन तलाक का दर्द समाज के सामने रखने वाली साहित्यकार और पटकथा लेखक "अचला नागर" से विवेक पाठक का साक्षात्कार

ग्वालियर। क्या सब्जी अच्छी न लगने पर किसी महिला को छोड़ा जाना चाहिए। क्या मूड खराब होने पर महिला से रिश्ता तोड़ा जाना चाहिए। क्या जीवन भर का साथ तीन बार तलाक बोलकर तोड़ा जा सकता है। क्या तलाक देकर फिर से महिला को अपनाने के लिए उसे परपुरुष के साथ समय बिताने की मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना देना उचित था।

ये तीखे सवाल हैं प्रख्यात साहित्यकार एवं मुंबई सिने जगत की ख्यात कथा, पटकथा एवं संवाद लेखिका श्रीमती अचला नागर के । संसद में मंगलवार को तीन तलाक के खिलाफ प्रस्ताव पारित होने को वे भारत में सामाजिक बदलाव का ऐतिहासिक व स्वर्णिम क्षण मानती हैं। श्रीमती नागर ने सन 1982 में निकाह फिल्म के जरिए तीन तलाक पर अपनी भाव प्रवण पटकथा एवं हृदय को द्रवित कर देने वाले संवादों से प्रहार किया था। यह फिल्म सन 1982 में भारतीय सिनेमा के प्रख्यात निर्देशक बी. आर. चोपड़ा के निर्देशन में आयी थी। तमाम शुरुआती विरोधों के बाबजूद उस समय के भारत में इस तीन तलाक के खिलाफ एक चेतना का संचार किया था। इस फिल्म के लिए उन्हें फिल्म फेयर अवार्ड मिला था एवं इसके बाद पटकथा लेखन एवं संवाद लेखन में उनकी ख्याति निरंतर बढ़ती चली गयी और आज वे देश की जानी मान पटकथा व संवाद लेखिका हैं। इसी तरह के अननिगत जनचेतना भरे प्रयासों एवं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संकल्प के बाद अब भारत में तीन तलाक को गैरजमानती अपराध बताने वाला कानून बनने जा रहा है।

वर्तमान में मुंबई में निवासरत लेखिका अचला नगर प्रख्यात साहित्यकार अमृतलाल नागर की सुपुत्री हैं एवं जन्म से साहित्यिक प्रतिभा की धनी हैं।

तीन तलाक पर निकाह की ख्यात पटकथा को याद करते हुए वे कहती हैं मैं मथुरा आकाशवाणी में थी और विभिन्न पत्र पत्रिकाओं के लिए लिखा करती थी। मैंने तीन तलाक पर एक कहानी तोहफा नाम से माधुरी पत्रिका में लिखी थी साथ ही उसके लिए एक मुझे टाइम्स ऑफ इंडिया समूह ने बी आर चोपड़ा साहब के साक्षात्कार के लिए भेजा। तब वे लघु फिल्मों का निर्माण कर रहे थे जब उन्होंने मेरी तीन तलाक पर कहानी के बारे में सुना तो उन्होंने उसमें दिलचस्पी दिखाई। असल में वे सामाजिक विषयों पर ही लगातार फिल्में बना रहे थे। उन्हे कहानी पसंद आयी और उन्होंने मुझे कहानी को विजुइलाइज करने को कहा। इसके बाद हमने लगातार कई दौर की बैठक की और आखिरकार निकाह की कथा पटकथा और दिल आंसुओं से भर देने वाले भावपूर्ण संवाद तैयार हुए। फिल्म को काफी अच्छा रिस्पांस मिला। रिलीज के बाद तीन तलाक की पीड़ा देख चुकीं तमाम महिलाएं जब मुझसे मिलती तो गले मिलकर रोने लगतीं। उन्होंने कहा कि आपने वो दर्द समझा जो सदियों से किसी ने नहीं समझा।

लेखिका अचला नागर तीन तलाक कानून को भारतीय समाज के लिए परिवर्तनकारी कदम बताती हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में तीन तलाक के खिलाफ कानून का फैसला कर भारत की अनगिनत महिलाओं को प्रताड़ना से मुक्ति दिलाई है। कहा जा रहा है कि यह मुस्लिम महिलाओं की जीत है मगर सही मायने में ये केवल और केवल महिलाओं की जीत है।

ये कानून परिवारों को जोड़ेगा

अचला नागर कहती हैं कि तीन तलाक की त्रासदी को सिर्फ महिलाएं ही नहीं बल्कि पुरुषों ने भी भुगता है। वे सवाल करती हैं कि क्या एक तलाक के बाद एक महिला के अलग होने और उस पर होने वाली ज्यादती के कारण क्या उसका परिवार प्रताड़ित नहीं होता। क्या महिला के पिता, भाई, चाचा और अन्य परिजन इसका गम नहीं भुगतते। यह कानून सच में दुनिया भर में बंद कर दी गई तीन तलाक की बुराई से भारत को मुक्त करेगा जिससे लाखों परिवार अब टूटने की बजाय प्रेम के धागों से जुड़ेंगे।

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