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गजराराजा चिकित्सा महाविद्यालय में अपात्र चिकित्सक भी अधिष्ठाता की दौड़ में

गजराराजा चिकित्सा महाविद्यालय में अपात्र चिकित्सक भी अधिष्ठाता की दौड़ में

ग्वालियर, न.सं.। गजराराजा चिकित्सा महाविद्यालय के पूर्व अधिष्ठाता डॉ. भरत जैन को जहां न्यायालय से कोई राहत नहीं मिली है वहीं अधिष्ठाता पद के लिए ऐसे चिकित्सक भी दौड़ में शामिल हो गए हैं, जो नियम अनुसार अपात्र हैं। इसको लेकर महाविद्यालय में यह चर्चा छिड़ गई है कि जो चिकित्सक डेढ़ वर्ष पहले ही प्राध्यापक बने हैं, उन्हें शासन अधिष्ठाता की दौड़ में कैसे शामिल कर सकता है?

राज्य शासन द्वारा गजराराजा चिकित्सा महाविद्यायल के अधिष्ठाता डॉ. भरत जैन पर एक तरफा कार्रवाई करते हुए उन्हें अधिष्ठाता पद से हटाकर उनका स्थानांतरण कर दिया गया है। इसको लेकर डॉ. जैन जब उच्च न्यायालय पहुंचे तो उनकी याचिका खारिज कर दी गई। इधर अधिष्ठाता पद पर को भरने के लिए विज्ञापन जारी किया गया है, जिसमें स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि जिनका प्राध्यापक पद का कार्यकाल पांच वर्ष हो, साथ ही विभागाध्यक्ष पद पर पांच वर्ष हो चुके हों, उन्हें पहले प्राथमिकता दी जाएगी। इसके बाद भी अधिष्ठाता पद के लिए ऐसे चिकित्सकों ने भी आवेदन कर दिया है, जिनके पास पांच वर्ष का प्राध्यापक पद का अनुभव ही नहीं है। इतना ही नहीं, राज्य शासन और चिकित्सा महाविद्यालय प्रबंधन एक चिकित्सक को लाभ पहुंचने के लिए टाइम स्केल प्रमोशन को मान्य करने की तैयारी में जुटा हुआ है, जबकि शासन व एमसीआई समयबद्ध पदोन्नति को अधिष्ठाता पद के लिए मान्य ही नहीं करता है।

यह हैं शासन के निर्देश

- शासन के निर्देश अनुसार समयबद्ध पदोन्नति प्राप्त प्राध्यापकों को अधिष्ठाता पद पर नियमित पदोन्नति के लिए पात्रता नहीं होगी, जब तक कि वे नियमित प्राध्यापक/अधिष्ठाता पद पर पदोन्नत होकर नियम अनुसार अर्हकारी सेवा अनुभव पूर्व नहीं कर लेते।

- समयबद्ध पदोन्नति प्राप्त प्राध्यापकों की सह प्राध्यापक के पद पर वरिष्ठता इस पदोन्नति से प्रभावित नहीं होगी। आर्थत उनकी वरिष्ठाता सह प्राध्यापक के पद की वरिष्ठता सूची में यथावत बनी रहेगी और उन्हें प्राध्यापक की वरिष्ठाता सूची में स्थान नहीं दिया जाएगा।

इन चिकित्सकों ने किए आवेदन, यह है योग्यता

- जयारोग्य चिकित्सालय के अधीक्षक डॉ. अशोक मिश्रा ने अधिष्ठाता पद के लिए आवेदन किया है, लेकिन डॉ. मिश्रा शासन के नए नियम आने के बाद वर्ष 2018 में ही नियममित प्रोफेसर बने हैं।

- आर्थोपेडिक विभाग के डॉ. आर.के.एस. धाकड़ वर्ष 2016 में नियमित प्राध्यापक बने, साथ ही डॉ. धाकड़ के पास पांच वर्ष का विभागाध्यक्ष का अनुभव भी नहीं है।

- क्षय रोग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. के.के. तिवारी दस वर्ष पूर्व ही नियमित प्राध्यापक बन चुके थे, साथ ही डॉ. तिवारी करीब दस वर्ष से विभागाध्यक्ष पद पर कार्यरत हैं।

- डॉ. शशि गंधी का भी नियमित प्राध्यापक का अनुभव दस वर्ष से अधिक है, साथ ही विभागाध्यक्ष के पद पर भी उन्हें पांच वर्ष से अधिक हो चुके हैं।

नहीं मिली शासन से अनापत्ति

न्यायालय के निर्देश अनुसार अगर कोई चिकित्सक अधिष्ठाता पद के लिए आवेदन करता है तो उसे शासन से अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) लेना आवश्यक है। इसी के चलते आवेदन करने वाले चिकित्सकों ने आवेदन करने के बाद शासन से एनओसी के लिए आवेदन भी किया है, लेकिन अभी तक चिकित्सकों को एनओसी प्राप्त ही नहीं हुई है।

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