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33 सालों तक ली फ्री जलसेवा, कम्पनियों से नही वसूली जलकर की 788 करोड़ की राशि

33 सालों तक ली फ्री जलसेवा, कम्पनियों से नही वसूली जलकर की 788 करोड़ की राशि

नौकरशाहों ने सरकार को लगाया करोड़ों का चूना

प्रशासनिक संवाददाता भोपाल

मध्यप्रदेश सरकार में नौकरशाहों की लापरवाही के चलते सरकारी खजाने को चूना लगाये जाने के कई उदाहरण पिछले दिनों सामने आए हैं। ताजा मामले का खुलासा कैग की उस रिपोर्ट से हुआ है जिसमें कहा गया है कि राज्य सरकार के नौकरशाहों की लेतलाली के कारण सरकार को 788 करोड़ रुपये का नुक्सान उठाना पड़ा।

कैग की रिपोर्ट में किये गए खुलासे में बताया गया है कि प्रदेश में नौकरशाहों की लापरवाही का ही परिणाम है कि सरकार को कम्पनियों से मिलने वाली कर (टैक्स) की राशि की वसूली नही की गई। इसकी परिणिति यह हुई कि कंपनियों पर बकाया कर (टैक्स) बढ़ता गया और सरकार का खजाना खाली होता गया। कैग द्वारा दस्तावेजों की जांच के बाद पाया गया कि अनूपपुर जिले की दो बड़ी कंपनियों जैतहरी स्थित हिन्दुस्तान पावर प्लांट (मोजरबेयर पावर प्लांट) तथा एशिया की सबसे बड़ी कागज निर्माण करने वाली कंपनी ओरियंटल पेपर मिल (ओपीएम) अमलाई के नाम भी शामिल हैं। जलकर वसूली की लापरवाही में कैग ने हिन्दुस्तान पावर प्लांट के ऊपर 17 करोड़ का जलकर बकाया तो ओपीएम अमलाई पर पिछले 20 सालों में 777 करोड़ बताया है। लेकिन अनूपपुर जलसंसाधन विभाग की रिपोर्ट में जैतहरी स्थित हिन्दुस्तान पावर प्लांट के लिए पिछले 4-5 माहों का ही सिर्फ 7 करोड़ 17 लाख 30 हजार 637 रूपए बकाया बताया गया है। विभाग के पास 10 करोड़ के बकाया संबंधी कोई बिल टेबल पर मौजूद नहीं है। जबकि ओपीएम अमलाई पर वर्ष 1998 में निर्धारित किए गए जलकर की राशि में पिछले 20 सालों से अब तक वसूली नहीं होने तथा मामला उच्च न्यायालय में लम्बित होने के कारण कोई भी राशि वसूली नहीं जा सकी है।

यानि जलसंसाधन विभाग के दस्तावेजों में पावर प्लांट पर 7 करोड़ 17 लाख 30 हजार 637 रुपए बकाया है। जिसे दिसम्बर माह में कंपनी को नोटिस जारी करते हुए भेजा जा चुका है। अगर कंपनी द्वारा इसका 25 प्रतिशत अतिरिक्त ब्याज के साथ भुगतान नहीं किया गया तो फरवरी माह में विभाग द्वारा पुन: नोटिस भेजने की कार्रवाई करेगी। विभागीय जानकारी के अनुसार पावर प्लांट जैतहरी के लिए वर्तमान में प्रतिवर्ष 26.40 एमसीएम (मिलियम घनमीटर) क्षमता पानी ग्रहण करता है। जबकि दस्तावेजों के अनुसार कंपनी ने स्थापना के दौरान एग्रीमेंट में चार यूनिट संचालित की मांग के अनुसार 75.68 एमसीएम पानी की मांग की थी।

लेकिन बाद में 1200 मेगावाट के दो यूनिट के कारण कंपनी ने बार बार पानी मांग में बदलाव किए। बताया जाता है कि कंपनी की एग्रीमेंट में 23 अक्टूबर 2008 की मांग के अनुसार 80.176 एमसीएम जल अधिग्रहण क्षमता था। लेकिन इसके बाद कंपनी ने बदलाव आरम्भ करते हुए 24 जून 11 को 75.60 एमसीएम की मांग रखी। इसके बाद फिर से कंपनी ने 24 जून 2017 को बदलाव करते हुए 34.56 एमसीएम जल आपूर्ति की मांग अपील की। जबकि 16 मई 2018 को कंपनी ने मात्र 26.40 एमसीएम क्षमता की मांग पर जलाग्रहण कर रही है। विभाग के अनुसार मोजरबेयर कंपनी का प्रतिमाह 31 लाख 27 हजार 857.65 रुपए बिल बनता है। इसमें पुराना बिल हो सकता है। लेकिन सभी कार्य भोपाल स्तर पर होते हैं। जिसके कारण पुराना हिसाब कितना होगा विभाग की जानकारी में नहीं है।

20 सालों में कोई भुगतान नहीं

इसके विपरीत 1965 से स्थापित ओपीएम अमलाई पर वर्ष 1998 में जलसंसाधन विभाग ने 1970 के अनुबंध के अनुसार जल कर निर्धारित किया। लेकिन कंपनी ने 1998 में पिछले 18 सालों के जल कर को देने से इंकार कर दिया। कंपनी का कहना था कि स्थापना के दौरान जलकर जैसी कोई अनुबंध नहीं थी। लेकिन 1970 के तहत अधिनियम में निर्धारण के बाद भुगतान करना आवश्यक बताया। इस दौरान विभाग ने कंपनी को पुन:अनुबंध कर पानी क्षमता कम करने की सलाह। कंपनी पुन:अनुबंध की बजाय न्यायालय का शरण लिया। 2009 में उच्च न्यायालय में विभाग की जीत हुई और कंपनी हार गई। उच्च न्यायालय ने कंपनी को 1 करोड़ 4 लाख 83 हजार भुगतान करने के निर्देश दिए। वहीं 2010 में कंपनी ने पुन:अनुबंध करते हुए 12.46 एमसीएम वार्षिक जलग्रहण का मसौदा तैयार किया। लेकिन कंपनी ने यहां न तो विभाग के 104 करोड़ का भुगतान किया और ना ही आगामी वर्ष के बिलों की भुगतान की। बताया जाता है कि कंपनी द्वारा बिल भुगतान नहीं करने के एवज में अनूपपुर तहसीलदार ने वर्ष 2014-15 में ओपीएम को कुर्की करने का आदेश जारी किया। जिसपर कंपनी ने पुन: उच्च न्यायालय की शरण ली। इसमें न्यायालय ने कंपनी की तरफ से दलील देते हुए आदेश को आगामी फैसले तक स्थगित कर दिया। आलम यह है कि कंपनी ने पिछले 20 सालों में कोई जलकर भुगतान ही नहीं करा।

33 सालों तक ली फ्री जलसेवा

विभागीय जानकारी के अनुसार ओपीएम की शुरूआत 1965 में हुई थी। लेकिन इस दौरान विभाग के पास जल निर्धारण की प्रक्रिया नहीं थी। जिसमें कंपनी ने सोन नदी के जल का भरपूर उपयोग किया। यह स्थिति 1965 से 1998 तक बनी रही। जहां 33 सालों तक कंपनी ने बिना एक पैसा शासन को भुगतान किए सोननदी के लाखों लीटर की क्षमता का उपयोग किया। वहीं 1998 में शासन द्वारा जलकर निर्धारण किया गया तो कंपनी ने पैतरा बदलते हुए उच्च न्यायालय की शरण ले ली। जलसंसाधन विभाग अनूपपुर के कार्यपालन अभियंता सीएम शुक्ला कहते हैं कि मोजरबेयर की रिपोर्ट गलत है, कंपनी ने बीच में कुछ भुगतान कराएं हैं। वर्तमान में 7 करोड़ 17 लाख की राशि शेष है। समायोजन के अभाव में सही आंकड़े सामने नहीं आए हैं। ओपीएम के लिए पूर्व में जलकर निर्धारण नहीं हुआ था, लेकिन अनुबंध में यह बात निहित थी कि जैसे ही निर्धारण होगा भुगतान करना होगा। 1998 से 2009 तक के भुगतान के साथ 2010 के बाद में कुछ राशियां ही जमा हो पाई। लेकिन पिछला सूद के कारण यह राशियां अधिक है, जिसे न्यायालय के स्थगन के बाद ही वसूला जा सकेगा।

Naveen ( 1696 )

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