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प्रतिष्ठा का प्रश्न बनीं ग्वालियर और भोपाल लोकसभा

प्रत्याशी कौन ? भोपाल में तलाश, ग्वालियर में इंतजार

प्रतिष्ठा का प्रश्न बनीं ग्वालियर और भोपाल लोकसभा

भोपाल/विनोद दुबेचुनाव की तारीखों की घोषणा से पहले तक मध्यप्रदेश में छिंदवाड़ा और गुना-शिवपुरी लोकसभा सीटों को लेकर सर्वाधिक चर्चा होती थी। लेकिन अब इन दोनों सीटों से कहीं अधिक चर्चा में ग्वालियर और राजधानी भोपाल की लोकसभा सीटें हैं। इन दोनों ही लोकसभा सीटों पर प्रत्याशी चयन को लेकर जिस तरह का मंथन भाजपा और कांग्रेस में चल रहा है, समझा जा सकता है कि दोनों ही दल इन दोनों ही सीटों पर किसी भी प्रकार की कोर-कसर छोड़ना नहीं चाहते।

मध्यप्रदेश की भोपाल लोकसभा सीट पर भाजपा भलें अपने प्रत्याशी का चयन नहीं कर पाई हो, लेकिन कांग्रेस ने दिग्विजय सिंह को यहां से टिकट देकर भाजपा को प्रत्याशी बदलने पर मजबूर जरूर कर दिया है। कुछ समय पहले तक भोपाल सीट से पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का नाम दावेदारों में भी नहीं था। इस सीट पर भाजपा संगठन की ओर से जहां बी.डी.शर्मा के नाम को शिखर पर माना जा रहा था, वहीं दावेदारों में पूर्व मंत्री उमाशंकर गुप्ता, वर्तमान सांसद आलोक संजर, पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर और महापौर आलोक शर्मा के नाम चर्चा में थे। हालांकि भाजपा की प्रदेश चुनाव समिति की बैठक के पहले तक केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर का नाम भी भोपाल सीट से दावेदारों में उछला। लेकिन मुरैना लोकसभा सीट से उन्हें प्रत्याशी बनाए जाते ही यह अफवाह ही साबित हो गया। खास बात यह रही कि कांग्रेस द्वारा दिग्विजय सिंह को भोपाल से प्रत्याशी बनाए जाते ही भाजपा में प्रत्याशी चयन पर मंथन नए सिरे से आरंभ हो गया। दिग्विजय सिंह को पटखनी देने के लिए सबसे बड़ा नाम शिवराज सिंह चौहान ही सामने आया। शिवराज ङ्क्षसह चौहान का नाम भोपाल से प्रत्याशी के रूप में उभरा तो विरोध जता रहे स्थानीय नेता भी मौन साधकर बैठ गए हैं। प्रत्याशी चयन को लेकर संगठन में लगातर मंथन जारी है। माना जा रहा है कि आगामी एक-दो दिन में केन्द्रीय नेतृत्व इस पर निर्णय लेकर नाम घोषित कर सकता है।

ग्वालियर में महल पर टिकीं नजरें

ग्वालियर लोकसभा सीट पर अभी दोनों ही प्रमुख दलों भाजपा और कांग्रेस में प्रत्याशी चयन को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। ग्वालियर जिला कांग्रेस और पार्षद दल ने प्रस्ताव पास कर राष्ट्रीय नेतृत्व को भेजा है कि ग्वालियर सीट से गुना सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया की पत्नी श्रीमती प्रियदर्शनी राजे सिंधिया चुनाव लड़ें। इस प्रस्ताव की चर्चा इसलिए भी प्रबल हुई है क्योंकि यह प्रस्ताव कांग्रेसियों के सांसद सिंधिया से मिलने के बाद पास किया गया। सिंधिया समर्थकों की सच्चाई यह है कि वह अपने महाराज की अनुमति या सहमति के बिना इतना बड़ा कदम उठा ही नहीं सकते। ग्वालियर लोकसभा सीट से श्रीमती सिंधिया चुनाव मैदान में उतरती हैं तो फिर सिंधिया भी गुना से चुनाव लड़ेंगे? अगर हां तो जयविलास पैलेस में दो सांसदों का निवास तय माना जा रहा है। भाजपा द्वारा केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर को मुरैना से प्रत्याशी बनाए जाने के बाद ग्वालियर लोकसभा सीट पर भाजपा की ओर से जहां महापौर विवेक शेजवलकर की दावेदारी को सबसे मजबूत माना जा रहा है, वहीं पूर्व खेल मंत्री यशोधरा राजे सिंधिया को भी प्रबल दावेदारों में माना जा रहा है। दावेदारों में मुरैना सांसद अनूप मिश्रा, पूर्व साडा अध्यक्ष जयसिंह कुशवाह, पूर्व मंत्री माया सिंह को भी दावेदार बताया जा रहा है। ग्वालियर में भाजपा के पास मजबूत और विजयी दावेदार तो हैं, लेकिन घोषणा अटकी है क्यों? चर्चा है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों की नजरें महल पर अटकी हैं। कांग्रेस का प्रत्याशी अगर जयविलास पैलेस से निकलकर आता है तो भाजपा के तीन प्रमुख दावेदारों का पीछे हटना तय माना जा रहा है। अगर ग्वालियर में कांग्रेस का प्रत्याशी महल से नहीं होगा तो महापौर विवेक शेजवलकर की दावेदारी मजबूत मानी जा रही है।

लोकसभा नहीं लड़ना चाहते शिवराज!


पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को लेकर चर्चाएं यह भी हैं कि वह स्वयं ही इस बार लोकसभा चुनाव नहीं लड़ना चाहते। न तो उनकी परंपरागत सीट रही विदिशा से और न ही भोपाल से। इसके पीछे तर्क दिए जा रहे हैं कि उन्हें आशा है कि लोकसभा चुनाव में भाजपा को अपार सफलता मिलेगी। परिणाम स्वरूप मप्र की गृहक्लेश में उलझी और जुगाडू बहुमत से बनी कमलनाथ सरकार की जमीन खिसकते देर नहीं लगेगी। ऐसी स्थिति में प्रदेश में मध्यावधि चुनाव होना तय है और सत्ता की चाबी भाजपा को मिलने का भरपूर अवसर भी। अगर वह संसद चले गए तो मप्र की राजनीति और सत्ता से वह दूर हो सकते हैं। शिवराज के लोकसभा चुनाव को लेकर लगाए जा रहे इन आंकलनों को लेकर सच्चाई जो भी हो, लेकिन प्रदेश में इस अंकगणित की चर्चा जरूर जोरों पर है।

कभी नहीं टकराए महल के प्रत्याशी?


ग्वालियर जयविलास पैलेस अर्थात सिंधिया परिवार के प्रत्याशियों के बारे में कहा जाता है कि महल से जो भी प्रत्याशी खड़ा होता है, उसकी जीत से महल की प्रतिष्ठा जुड़ी होती है। तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारिका प्रसाद मिश्र से विवाद के कारण राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ी, लेकिन उनके पुत्र माधवराव सिंधिया कांग्रेस से जुड़े रहे। परिवार में मतभेदों की चर्चा जरूर रही, लेकिन तीन पीडिय़ों में ऐसा कभी देखने में नहीं आया कि माँ-बेटे, बुआ-भतीजे अथवा मामी-महाराज ने कभी एक-दूसरे के विरुद्ध चुनाव लड़ा हो। न ही भाजपा और कांग्रेस ने इस परंपरा को तोडऩे की जिद ही ठानी। लोकसभा सीट गुना रही हो या ग्वालियर महल कभी नहीं हारा। अगर किसी एक सीट पर भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दल महल के प्रत्याशियों को उतारती तो महल के एक प्रत्याशी की हार निश्चित थी, जो महल की प्रतिष्ठा को खंडित कर सकती थी।

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स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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