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धरने पर ड्रामेबाज सरकार

धरने पर ड्रामेबाज सरकार

सरकार का गठन प्रशासनिक कार्यों के संचालन और जनता के हितों के काम के लिए होता है। केंद्र की सरकार हो, चाहे राज्य की सरकार सबका मूल काम अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले काम को सुचारु रुप से चलाते रहने की होती है। लेकिन, पिछले कुछ वर्षों से देश को एक नयी तरह की सरकार का भी अनुभव हुआ है। और वह है, ड्रामा करने वाली अरविंद केजरीवाल सरकार। आजाद भारत के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि किसी राज्य का मुख्यमंत्री अपनी मांग को लेकर पूरी रात उपराज्यपाल के आवास में धरने पर बैठा रहा।

अरविंद केजरीवाल अपने सभी सहयोगियों के साथ उपराज्यपाल अनिल बैजल के घर पर आंदोलन करने पहुंच गये और धरना दिया। उनकी मांग है की उपराज्यपाल अपनी ओर से पहल करके नौकरशाही की हड़ताल को खत्म करवाएं और काम रोकने वाले अफसरों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करें। इसके साथ ही केजरीवाल डोर टू डोर राशन सप्लाई की योजना को मंजूर करने की भी मांग कर रहे हैं। धरना देना केजरीवाल के स्वभाव में शामिल है। राजनीति में आने के पहले भी धरना देते थे और अभी भी दे रहे हैं। पहले धरना देने का उनका यह प्रयोग काफी सफल रहा और अन्ना हजारे की मदद से वह जनता में काफी लोकप्रिय भी हुए। इस लोकप्रियता का लाभ उन्होंने राजनेता बन कर उठाया, चुनाव में पहली बार केजरीवाल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला और उन्होंने जिस कांग्रेस के खिलाफ आंदोलन किया था, उसके साथ मिलकर ही सरकार भी बनायी, फिर कुछ दिन बाद इस्तीफा भी दे दिया। लेकिन, अगली बार वे रिकॉर्ड बहुमत के साथ सरकार बनाने में सफल रहे।

सरकार तो बन गई, लेकिन उनकी आदतें नहीं गई। कहते हैं कि किसी बेवकूफ से बेवकूफ व्यक्ति को भी प्रशिक्षण देकर कुछ समय में काम में दक्ष किया जा सकता है, लेकिन किसी व्यक्ति की एक बार जैसी प्रवृत्ति बन जाती है, उसे बदलना संभव नहीं होता। केजरीवाल के साथ भी कुछ ऐसा ही है। पहली बार जब उन्होंने सरकार बनायी थी, तब भी रेल भवन के बाहर धरना दिया था। बाकायदा टेंट हाउस से गद्दे, चादर, तकिया, रजाई आदि की व्यवस्था हुई थी और दिल्ली सरकार रेल भवन के सामने ही सो गई थी। कुछ महीने पहले भी उन्होंने सीसीटीवी लगाने के मसले पर अपने मंत्रियों और पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ धरना दिया था। अब वो एक बार फिर धरने का सहारा ले रहे हैं। इससे एक बात तो साफ हो गयी है कि केजरीवाल जी यही लगता है कि जिसे वे सही मानते हैं, वही सही है, बाकी दुनिया में सब कुछ गलत है। वे इस बात को नहीं समझना चाहते कि नियम-कायदा क्या है। बस अपनी मर्जी चलाना चाहते हैं।

अभी के उनके धरने का मूल विषय नौकरशाही की कथित हड़ताल रही। हालांकि आईएएस एसोसिएशन ने इस धरना के शुरू होने के पहले ही साफ कर दिया था कि कोई भी अधिकारी हड़ताल पर नहीं है। दिक्कत ये है कि केजरीवाल को लगता है नौकरशाही हड़ताल करके दिल्ली सरकार के कामकाज को बाधित कर रही है। वहीं अधिकारियों का कहना है कि वे हड़ताल नहीं कर रहे। बस नियमानुसार काम कर रहे हैं। उनका ये भी कहना है कि वे मंत्रियों का हर लिखित आदेश मानने के लिए तैयार हैं, लेकिन मौखिक आदेश पर वह अपनी ओर से कोई कदम नहीं उठाएंगे। देखा जाए तो इसे पूरी तरह से गलत नहीं कहा जा सकता। आम आदमी पार्टी की सरकार के अभी तक के कार्यकाल का जो अनुभव रहा है, वो सरकारी अधिकारियों के लिए काफी कड़वा रहा है। आरोप है कि मौखिक आदेश पर किये गये किसी भी कार्य में अगर परिणाम अच्छा रहा तो मंत्रिगण उसका श्रेय खुद लेते हैं, लेकिन अगर परिणाम अच्छा नहीं रहा तो उसका ठीकरा अधिकारियों के सिर पर फोड़ दिया जाता है।

इस बात को लेकर सरकार और नौकरशाही के बीच लंबे समय से तनातनी की स्थिति बनी हुई है। पिछले दिनों राज्य के मुख्य सचिव की मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के घर पर हुई पिटाई ने इस मसले को और तूल दे दिया है। उसके बाद से ही अधिकारियों ने मंत्रियों लिखित निर्देश देने की मांग करनी शुरू कर दी है। लेकिन ये बात केजरीवाल सरकार को पसंद नहीं आ रही है। अधिकारियों का कहना है कि केजरीवाल सरकार जिस तरह से उन्हें धमकाकर अपनी तानाशाही चलाना चाह रही है, वे उसका विरोध कर रहे हैं। संयोग से उपराज्यपाल अनिल बैजल ने यह कह कर आग में और घी डाल दिया कि केजरीवाल सरकार को कामकाज के संचालन के लिए अधिकारियों से बातचीत करनी चाहिए। केजरीवाल और उनके सहयोगियों का कहना है कि सरकार अधिकारियों से बात क्यों करें। अधिकारी सरकार के मातहत हैं, सरकार अधिकारियों के मातहत नहीं। आरोप प्रत्यारोप का ये सिलसिला बातचीत की संभावना को लगातार कम करता जा रहा है।

वैसे भी केजरीवाल का स्थायी आरोप है कि उपराज्यपाल केंद्र सरकार के एजेंट के तौर पर काम करते हैं और जानबूझकर राज्य सरकार के कामकाज में अड़ंगा डालते हैं। लेकिन खुद केजरीवाल मनमाने ढंग से और नियम विरुद्ध तरीके से काम करने के लिए जाने जाते हैं। पहले वे बिजली बिल का भुगतान नहीं करने वालों के कनेक्शन को नियम विरुद्ध जोड़ते थे, अब बात-बात पर उपराज्यपाल से झगड़ा करते हैं। जहां तक सरकार के कामकाज के निपटारे का प्रश्न है, तो इसको लेकर खुद अरविंद केजरीवाल कितने गंभीर हैं, इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे देश के संभवतः पहले ऐसे मुख्यमंत्री हैं, जिनके पास कोई भी विभाग नहीं है। यानी उनके पास कोई काम भी नहीं है। कोई काम नहीं है, तो उन्हें किसी गलत बात के लिए जिम्मेदार भी नहीं ठहराया जा सकता।
इसके साथ ही उनके पूर्व सहयोगी कपिल मिश्रा का आरोप है कि विधानसभा में उनकी उपस्थिति 10 फीसदी से भी कम रही है। अभी हाल में ही जब दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की बात को लेकर विधानसभा का विशेष अधिवेशन बुलाया गया तो उसमें भी आखिरी दिन केजरीवाल महज दो घंटे के लिए आए। दिल्ली के लिए इतने महत्वपूर्ण विषय पर केजरीवाल की सदन से अनुपस्थिति, कामकाज के प्रति गंभीरता को दर्शाने के लिए काफी है। इस सच को केजरीवाल को समझना ही पड़ेगा कि सरकार का काम आंदोलन करना या धरना देना नहीं है। सरकार का सरकार का काम प्रशासन चलाना है। आंदोलन करने का काम पार्टियों का होता है, सरकार का नहीं।
अरविंद केजरीवाल अपने ऊटपटांग और निराधार आरोपों की वजह से कई मुकदमों का सामना कर रहे हैं। कई मामलों में उन्हें माफी भी मांगनी पड़ी है। इसके बावजूद अगर उन्हें समझ नहीं आ सका है कि सरकार कैसी चलाएं कैसे चलानी चाहिए, तो फिर दिल्ली का भगवान ही मालिक है। उनको समझना चाहिए कि वह राज्य की जनता का भला करने के नाम पर चुने गए हैं। दिल्ली की जनता ने उन्हें ऐतिहासिक जीत दिल्ली के विकास के लिए दिलायी थी ना कि टकराव का रास्ता अपनाकर कामकाज से बचने के लिए। अपने पास कोई भी विभाग नहीं रखकर केजरीवाल खुद तो कोई काम नहीं ही करते हैं, लेकिन उनका यह रवैया दिल्ली के अन्य मंत्रियों और अधिकारियों को भी काम नहीं करने दे रहा है। अगर वे सच में दिल्ली का भला चाहते हैं, तो पहले हठधर्मिता छोड़नी होगी, सरकारी ड्रामा खत्म करना होगा और ईमानदारी से काम करना होगा। तभी दिल्ली की जनता को राहत मिलेगी।

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Swadesh Digital ( 0 )

स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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