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लोकसभा 2019 : कितनी सफल होगी चन्द्रशेखर राव की तीसरा मोर्चा बनाने की कोशिश

लोकसभा 2019 : कितनी सफल होगी चन्द्रशेखर राव की तीसरा मोर्चा बनाने की कोशिश

नई दिल्ली। बिना 'भाजपा-कांग्रेस' वाला तीसरा मोर्चा बनाने के लिए भ्रमण कर रहे तेलंगाना राष्ट्र समिति के अध्यक्ष व मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव की बीजू जनता दल के प्रमुख व ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक, तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख व पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से हो चुकी मुलाकात के बाद अब समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव, बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती और प्रधानमंत्री से गुफ्तगू पर विपक्षी दलों की निगाह है। इनमें ज्यादातर को लगता है कि के. चंद्रशेखर राव अपने को केन्द्रीय सत्ताधारी पार्टी के लिए अनिवार्य बनाये रखने की रणनीति के तहत यह उपक्रम कर रहे हैं, ताकि वह अपनी बेटी कविता को केन्द्र में स्थापित कर सकें और राज्य के लिए केन्द्र से फंड भी लेते रहें। इसके मद्देनजर सबकी निगाह उनकी प्रधानमंत्री से गुफ्तगू और उसके बाद उनकी गतिविधि पर है। प्रधानमंत्री से उनकी बढ़ती जा रही घनिष्ठता के कारण भी कांग्रेस व उसके सहयोगी के. चंद्रशेखर राव को संदेह की निगाह से देखने लगे हैं। इसीलिए कांग्रेस ने के. चंद्रशेखर राव पर प्रधानमंत्री के लाभ वाला एजेंडा आगे बढ़ाने का आरोप लगाना शुरू कर दिया है।

कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला का कहना है कि प्रधानमंत्री से के. चंद्रशेखर राव की घनिष्ठता उसी तरह बढ़ती जा रही है जैसे नीतीश कुमार की बढ़ती गई थी| बाद में क्या हुआ यह सबके सामने है। के. चंद्रशेखर राव गैर भाजपा, गैर कांग्रेस वाली तीसरे मोर्चे की कवायद भ्रमण की शाम वाली गुफ्तगू भविष्य की रणनीति का संकेत है। पूरी कवायद का ब्रीफ किसको किया जा रहा है, सबको पता है। लेकिन तेलंगाना राष्ट्र समिति के सांसद अपने अध्यक्ष द्वारा की जा कोशिश को समय की जरूरत बता रहे हैं। सांसद बीएन गौड का कहना है कि अपने हक के लिए छोटे दलों को एकजुट होना पड़ेगा| तभी केन्द्र में उनकी आवाज सुनी जाएगी। उनके नेता के. चन्द्रशेखर राव जो कार्य कर रहे हैं वह सभी गैर भाजपा गैर कांग्रेसी दलों के हित वाला है। इस बारे में भाजपा सांसद लाल सिंह बड़ोदिया का कहना है कि किस पार्टी का नेता किससे मिलता है, क्या गठबंधन बनाता है, इससे भाजपा व इसके नेता का क्या मतलब? राज-काज में मिलना-जुलना चलता रहता है| तरह-तरह की बातें होती रहती हैं, जिसको जहां अपना राजनीतिक लाभ दिखता है वहां हाथ मिलाता है, जाता है। यह तो होता रहता है। इसलिए इस पर हाय-तौबा का कोई मतलब नहीं है। (हि.स.)

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स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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