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चांद के दक्षिणी ध्रुव पर उतरने वाला पहला देश बनेगा भारत

'चंदा मामा' के घर मेहमान बनकर पहुंचेगा भारत

चांद के दक्षिणी ध्रुव पर उतरने वाला पहला देश बनेगा भारत

नई दिल्ली। चांद की धरती पर उतरकर भारत शुक्रवार और शनिवार की आधी रात को इतिहास रचने जा रहा है। चंद्रयान-2 का विक्रम लैंडर चांद के उस हिस्से पर उतरने जा रहा है, जहां आज तक कोई भी नहीं पहुंचा है। पूरा देश चंद्रयान-2 के चंद्रमा पर कदम रखने की ऐतिहासिक घटना का गवाह बनेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ केंद्रीय विद्यालय के 16 विद्यार्थी समेत देश भर से 76 बच्चे भी इसरो में मौजूद रहकर इस ऐतिहासिक पल के साक्षी बनेंगे।

हालांकि अमेरिका, रूस और चीन भारत से पहले चांद पर सॉफ्ट लैंडिंग भी कर चुका है। फिर भी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के दूसरे मून मिशन चंद्रयान-2 पर नासा सहित पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हैं क्योंकि इसका सबसे बड़ा कारण ये है कि चंद्रयान-2 का विक्रम लैंडर चांद के उस हिस्से पर उतरने जा रहा है, जहां आज तक कोई भी नहीं पहुंचा है। इसरो प्रमुख के सिवन और वैज्ञानिकों की पूरी टीम के लिए यह बेहद अहम और तनाव भरा समय है। चंद्रयान-2 के लैंड होते ही भारत चांद के दक्षिणी ध्रुव पर जाने वाला दुनिया का पहला देश बन जाएगा। इसरो ने अपनी वेबसाइट के जरिए बताया है कि चांद का दक्षिणी ध्रुव बेहद खास और रोचक है, क्योंकि यह हमेशा अंधेरे में रहता है। साथ ही उत्तरी ध्रुव की तुलना में यह काफी बड़ा भी है। हमेशा अंधेरे में होने के कारण यहां पानी होने की संभावना भी जताई जा रही है। इसरो ने चांद के इस हिस्से में मौजूद क्रेटर्स में सोलर सिस्टम के जीवाश्म होने की संभावना भी जताई है। चंद्रयान-2 से भेजा गया प्रज्ञान रोवर चांद के दक्षिणी ध्रुव की सतह पर घूम कर इन बातों का पता लगाएगा।

कैसे चांद पर उतरेगा विक्रम लैंडर

चांद पर उतरने के लिए विक्रम लैंडर अपनी प्रक्रिया 6 और 7 सितम्बर की दरम्यानी रात 1:40 बजे शुरू करेगा। 35 किमी. की ऊंचाई से चांद के दक्षिणी ध्रुव पर इसे उतारना यह इसरो वैज्ञानिकों के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण काम होगा। 15 मिनट की जटिल प्रक्रिया के बाद आखिरकार वह ऐतिहासिक पल आएगा जब रात 1:55 बजे विक्रम लैंडर दक्षिणी ध्रुव पर मौजूद दो क्रेटर मैंजिनस-सी और सिंपेलियस-एन के बीच मौजूद मैदान में उतरेगा। लैंडर के लिए 2 मीटर प्रति सेकंड की गति से चांद की सतह पर उतरने के यह 15 मिनट बेहद तनावपूर्ण होंगे। लैंडिंग के करीब 2 घंटे के बाद रात 3.55 बजे विक्रम लैंडर का रैंप खुलेगा। इसी के जरिए 6 पहियों वाला प्रज्ञान रोवर चांद की सतह पर उतरेगा। सुबह 5.05 बजे प्रज्ञान रोवर का सोलर पैनल खुलेगा जिससे वह ऊर्जा हासिल करना शुरू करेगा। ठीक पांच मिनट बाद 5.10 बजे प्रज्ञान रोवर चांद की सतह पर चलना शुरू करेगा। वह एक सेंटीमीटर प्रति सेकंड की गति से चांद की सतह पर 14 दिनों में 500 मीटर की दूरी तय करेगा। चन्द्रमा के हिसाब से यह एक दिन होगा क्योंकि एक लूनर डे पृथ्वी पर 14 दिनों के बराबर होता है। विक्रम लैंडर के चांद की सतह छूते ही वैज्ञानिकों को चंद्रमा से धरती की वास्तविक दूरी पता चल जाएगी, जो अभी तक पहेली बनी हुई है।

क्या करेगा प्रज्ञान रोवर चांद पर पहुंचकर

चंद्रयान-2 मिशन अब तक के मिशनों से अलग है। करीब दस वर्ष के वैज्ञानिक अनुसंधान और अभियान्त्रिकी विकास के बाद भारत के इस दूसरे चंद्र अभियान से चंद्रमा के दक्षिण ध्रुवीय क्षेत्र के अब तक के अछूते भाग के बारे में जानकारी मिलेगी। इस मिशन से व्यापक भौगौलिक, मौसम सम्बन्धी अध्ययन और चंद्रयान-1 द्वारा खोजे गए खनिजों का विश्लेषण करके चंद्रमा के अस्तित्त्व में आने और उसके क्रमिक विकास की और ज़्यादा जानकारी मिल पायेगी। इसके चंद्रमा पर रहने के दौरान कई और परीक्षण भी किये जायेंगे जिनमें चांद पर पानी होने की पुष्टि और वहां अनूठी रासायनिक संरचना वाली नई किस्म की चट्टानों का विश्लेषण शामिल हैं। चंद्रयान-2 से चांद की भौगोलिक संरचना, भूकम्पीय स्थिति, खनिजों की मौजूदगी और उनके वितरण का पता लगाने, सतह की रासायनिक संरचना, ऊपर मिट्टी की ताप भौतिकी विशेषताओं का अध्ययन करके चन्द्रमा के अस्तित्व में आने तथा उसके क्रमिक विकास के बारे में नई जानकारियां मिल सकेंगी।चन्द्रमा की संरचना समझने के लिए वहां की सतह में मौजूद तत्वों का पता लगाने और उनके वितरण के बारे में जाने के लिए व्यापक स्तर पर परीक्षण किये जायेंगे। साथ ही चन्द्रमा के चट्टानी क्षेत्र 'रेगोलिथ' की विस्तृत 3-डी मैपिंग की जाएगी। चन्द्रमा के आयनमंडल में इलेक्ट्रान घनत्व (डेंसिटी) और सतह के पास प्लाज़्मा वातावरण का भी अध्ययन किया जायेगा। चन्द्रमा की सतह के ताप भौतिकी गुणों (विशेषताओं) और वहां की भूकम्पीय गतिविधियों को भी मापा जाएगा। इंफ़्रा रेड स्पेक्ट्रोस्कोपी, सिंथेटिक अपर्चर रेडियोमीट्री और पोलरीमिट्री की सहायता से और व्यापक स्पेक्ट्रोस्कोपी तकनीकों से चांद पर पानी की मौजूदगी के ज़्यादा से ज़्यादा आंकड़े इकठ्ठा किए जायेंगे।

क्या होती है सॉफ्ट लैंडिंग

भारत पहली बार किसी उपग्रह पर अपने किसी यान की सॉफ्ट लैंडिंग कराने जा रहा है। इस मिशन के सफल होने पर भारत दुनिया का पांचवां देश होगा जिसके पास यह तकनीक होगी जो स्वदेशी तकनीक से सॉफ्ट लैंडिंग करेगा। सॉफ्ट लैंडिंग में खतरे भी बहुत हैं और तमाम सावधानियां भी बरतनी पड़ती हैं। आखिर क्या होती है सॉफ्ट लैंडिंग। हवाई जहाज से कूदने पर थोड़ी ऊंचाई के बाद पैराशूट खोलकर जमीन पर उतरने को भी सॉफ्ट लैंडिंग कहा जाता है। अगर हवाई जहाज से कूदने वाला व्यक्ति पैराशूट न खोले तो वह गुरुत्वाकर्षण शक्ति के प्रभाव और अपने वजन की वजह से तेजी से जमीन पर टकराएगा जिससे उसे भारी नुकसान हो सकता है या उसकी मौत हो सकती है लेकिन पैराशूट की वजह से वह सॉफ्ट लैंडिंग करता है। इसी तरह एयरपोर्ट पर लैंडिंग के वक्त विमान का पायलट पहले पिछले पहिए को रनवे पर लैंड कराता है, फिर अगले पहिए को। इससे प्लेन का वजन गति की दिशा में सही तरीके से नीचे आता है और लैंडिंग सेफ होती है। इसे भी सॉफ्ट लैंडिंग कहते हैं।

इसरो के पूर्व वैज्ञानिक विनोद कुमार श्रीवास्तव बताते हैं कि चांद पर गुरुत्वाकर्षण शक्ति धरती की अपेक्षा 1/6 कम है। यानी वहां गिरने की गति बढ़ जाएगी क्योंकि वहां वायुमंडल नहीं है, इसलिए घर्षण से गति कम करने की कवायद भी नहीं कर सकते। जब विक्रम लैंडर 35 किमी की ऊंचाई से चांद की सतह पर उतरना शुरू करेगा, तब उसके नीचे लगे पांचों इंजन को ऑन किया जाएगा जो इंजन अभी तक विक्रम लैंडर को आगे बढ़ाने का काम कर रहा थे। अब वही इंजन विपरीत दिशा में दबाव बनाकर विक्रम की गति को कम करके 2 मीटर प्रति सेकंड पर ले आएंगे। लैंडिंग से कुछ सेकंड पहले गति जीरो कर दी जाएगी। इससे विक्रम लैंडर अपने चारों पैरों के सहारे आराम से नीचे उतरेगा। ये सारा काम विक्रम में मौजूद ऑनबोर्ड कंप्यूटर करेगा। उसमें लगे सेंसर्स सही और गलत जगह की तलाश करेंगे, फिर विक्रम की लैंडिंग होगी।

बच्चों के चयन का ये था पूरा तरीका

इसरो ने भारत सरकार के साथ स्पेस क्विज प्रतियोगिता आयोजित की थी। इसे जीतने वाले चुनिंदा बच्चों को ही चंद्रयान-2 के चंद्रमा की धरती पर उतरने के ऐतिहासिक पल का साक्षी बनाया जा रहा है। इस क्विज के जरिए हर राज्य और केंद्रशासित प्रदेश से अधिक अंक प्राप्त करने वाले दो विजेताओं को चुना जाना था। ये आठवीं से दसवीं कक्षा के बच्चे हैं। इस तरह इसरो ने ऑनलाइन स्पेस क्विज के जरिए देश भर के विभिन्न केन्द्रीय विद्यालयों से 16 स्टूडेंट्स के अलावा 76 बच्चों को चुना है। इस क्व‍िज में देश भर के तमाम केन्द्रीय विद्यालयों से कुल 150279 स्टूडेंट्स शामिल हुए थे। चांद पर लाइव लैंडिंग देखने के लिए अहमदाबाद से निश्चल, अनुष्का अग्रवाल, बेंगलुरु के जीशान संजीब, करेरा (मध्यप्रदेश) की कनिष्का गुप्ता, चंडीगढ़ के अक्षत, दिल्ली कैंट के मनोज्ञ सिंह, लक्षद्वीप की नफरसथ निधा, असम की देवलीना हजारिका, चुरू (राजस्थान) की गरिमा शर्मा, जम्मू-कश्मीर के औजासव, सिक्किम के यश गुप्ता, छत्तीसगढ़ के श्रीजल चंद्राकर, मिजोरम की अन्या सिंह, शिलांग की अविप्सा पति, मणिपुर की सोनी नांगमैथम और अरुणाचल प्रदेश की तेजस्विनी का चयन हुआ है। इन सभी को बेंगलुरु स्थित इसरो के कमांड सेंटर में प्रधानमंत्री मोदी के साथ चंद्रयान-2 की लैंडिंग देखने के लिए बुलाया गया है जहां वे इस ऐतिहासिक पल के गवाह बनेंगे।

क्या है ऑर्बिटर

चंद्रयान-2 को 22 जुलाई को श्रीहरिकोटा प्रक्षेपण केंद्र से रॉकेट बाहुबली के जरिए प्र‍क्षेपित किया गया था। चंद्रयान-2 को मुख्य ऑर्बिटर कहा गया है जिसका वजन कुल 2,379 किलोग्राम है जिसकी विद्युत उत्पादन क्षमता 1,000 वॉट है। इसके बाद से मुख्य ऑर्बिटर चंद्रमा के चारों ओर चक्कर लगा रहा है। ऑर्बिटर की मिशन समयावधि एक वर्ष है और इसे 100X100 किलोमीटर लंबी चंद्र ध्रुवीय कक्षा में रखा जाएगा। इस दौरान मुख्य ऑर्बिटर में लगे टेरेन मैपिंग कैमरा (टीएमसी-2) 100 किमी. के ऊपर से चंद्रमा की सतह का रंगीन नक्शा बनाएगा और ढेरों तस्वीरें खींचेगा। इससे चांद के अस्तित्व में आने और उसके विकास होने के संकेत मिलेंगे। यह विक्रम लैंडर और बेंगलुरु में इंडियन डीप स्पेस नेटवर्क (आईडीएसएन) के वैज्ञानिकों के बीच सन्देश लाने-पहुंचाने का काम करेगा।

क्या है लैंडर विक्रम

लैंडर विक्रम मुख्य ऑर्बिटर के अन्दर का मुख्य भाग है जिसका वजन 1,471 किलोग्राम है और इसकी विद्युत उत्पादन क्षमता 650 वॉट है। चंद्रयान-2 के लैंडर का नाम भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम ए साराभाई के नाम पर रखा गया है। विक्रम के पास बेंगुलुरु के नज़दीक बयालू में आईडीएसएन के साथ-साथ ऑर्बिटर और रोवर के साथ संवाद करने की क्षमता है। लैंडर को चंद्र सतह पर सफल लैंडिंग करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। ऑर्बिटर के ऊपर लगे फ्यूल के एक्सटेंशन में रखा गया लैंडर विक्रम एक स्प्रिंग के दो तरफ क्लैंप और बोल्ट से जुड़ा था जिसे एक कमांड के जरिए 02 सितम्बर को ऑर्बिटर से अलग कर दिया गया। इसके बाद से लैंडर विक्रम ने अपने भीतर मौजूद प्रज्ञान रोवर को लेकर चांद की ओर बढ़ना शुरू कर दिया था। यह वैज्ञानिकों, ऑर्बिटर और प्रज्ञान रोवर के बीच सन्देश भेजने का काम करेगा। इसमें लगा रेडियो एनाटॉमी चांद की सतह पर इलेक्ट्रोन का घनत्व और तापमान के बारे में पता लगाएगा। इसमें लगे इलसा नामक यंत्र से चांद की जमीन पर हवा की गति बदलने का पता चल सकेगा।

क्या है रोवर प्रज्ञान

चंद्रयान-2 का रोवर, प्रज्ञान नाम का 6-पहिए वाला एक रोबोट वाहन है, जो संस्कृत में 'ज्ञान' शब्द से लिया गया है। रोवर प्रज्ञान लैंडर विक्रम के अन्दर का हिस्सा है। यह 500 मीटर (½ आधा किलोमीटर) तक यात्रा कर सकता है और सौर ऊर्जा की मदद से काम करता है। यह सिर्फ लैंडर के साथ संवाद कर सकता है। चांद की सतह पर लैंडिंग के करीब 2 घंटे के बाद रात 3.55 बजे विक्रम लैंडर का रैंप खुलेगा। इसी के जरिए 6 पहियों वाला प्रज्ञान रोवर चांद की सतह पर उतरेगा। इसी के जरिए चंद्रमा के दक्षिण ध्रुवीय क्षेत्र के अब तक के अछूते भाग के बारे में जानकारी मिलेगी। इसका वजन 27 किलोग्राम और विद्युत उत्पादन क्षमता 50 वॉट है। यह चांद की सतह पर मौजूद पानी या बाकी तत्वों का बारीकी से परीक्षण करेगा।

चंद्रयान-2 भेज चुका है धरती और चांद की तस्वीरें

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के सबसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट चंद्रयान-2 का सफर 22 जुलाई, 2019 को दिन के 2 बजकर 43 मिनट पर श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से शुरू हुआ था। चंद्रयान-2 ने लॉन्चिंग के ठीक एक माह बाद पहली बार 22 अगस्त को अपने एलआई4 कैमरे से पृथ्वी की तस्वीरें भेजीं थीं। इसके बाद चंद्रयान-2 ने पहली बार चांद की खूबसूरत तस्वीर भेजी। लैंडर विक्रम ने यह तस्वीर 2650 किलोमीटर की ऊंचाई से ली थी। इस चित्र में मरे ओरिएंटेल बेसिन और अपोलो क्रेटर्स की पहचान की गई। चंद्रयान-2 के कैमरे ने 26 अगस्त को चांद की कुछ और तस्वीरें भेजीं जो टेरेन मैपिंग कैमरा (टीएमसी -2) द्वारा चांद की सतह की लगभग 4375 किमी की ऊंचाई से ली गई थीं। इसरो के अनुसार इन तस्वीरों में जैक्सन, मच, कोरोलेव और मित्रा नामक स्थान दिखाई दिए हैं।

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स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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