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सत्ता पर खतरे को टालने के लिए इंदिरा गांधी ने किया आपातकाल का गुनाह

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को चुनाव में भ्रष्ट आचरण अपनाने का दोषी करार देते हुए उनके लोकसभा चुनाव को निरस्त कर उन्हें 6 वर्षो तक चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराया गया था।

सत्ता पर खतरे को टालने के लिए इंदिरा गांधी ने किया आपातकाल का गुनाह

नई दिल्ली। केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री व भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि 25 जून, 1975 की आधी रात में लगा आपातकाल न किसी बाहरी हमले के कारण था ना ही किसी युद्ध के चलते। यह कांग्रेस एवं इंदिरा गांधी की सत्ता पर खतरे को टालने के लिए किया गया गुनाह था। श्री नकवी ने एक ब्लॉग में कहा कि वैसे तो स्वतंत्र हिन्दुस्तान में तीन बार आपातकाल लगा। पहला आपातकाल 26 अक्टूबर 1962 में भारत-चीन युद्ध के समय घोषित हुआ, दूसरा आपातकाल 3 दिसम्बर 1971 को भारत-पाकिस्तान जंग के दौरान। इन दोनों आपातकाल के दौरान देश के लोग पूरी एकजुटता के साथ सरकार और सुरक्षा बलों के हर फैसले के साथ कंधे से कंधा मिला कर खड़े रहे।

पर तीसरे आपातकाल का प्रमुख कारण 12 जून, 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय का वह ऐतिहासिक फैसला था, जिसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को चुनाव में भ्रष्ट आचरण अपनाने का दोषी करार देते हुए उनके लोकसभा चुनाव को निरस्त कर उन्हें 6 वर्षो तक चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराया गया था।श्री नकवी ने अपने ब्लॉग में आगे लिखा कि 25 जून, 1975 को आधी रात में लगा यह आपातकाल न किसी बाहरी हमले के कारण था ना किसी युद्ध के चलते। शुद्ध रुप से कांग्रेस एवं श्रीमती गांधी के सत्ता पर खतरे को टालने के लिए किया गया गुनाह था। आपातकाल लागू करने के साथ ही कांग्रेस ने चुनाव संबधी नियम-कानूनों को अपनी निजी जरुरतों के हिसाब से संशोधित कर डाला, इंदिरा गांधी की अपील को उच्चतम न्यायालय में स्वीकार करवाया गया, ताकि इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा उनके रायबरेली संसदीय क्षेत्र से चुनाव रद्द किए जाने के फैसले को निष्प्रभावी किया जा सके।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि आपातकाल की घोषणा केवल कांग्रेसी सत्ता बचाने के लिए ही नहीं बल्कि इलाहबाद उच्च न्यायालय के फैसले और उच्चतम न्यायालय के अंतरिम फैसले का उलटना था, इसलिए इन फैसलों को पलटने वाला कानून ही नहीं लाया गया बल्कि इसका अमल भी पूर्व काल से लागू कर दिया। संविधान को संशोधित किया गया जिसके तहत राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, उपराष्ट्रपति और लोकसभा अध्यक्ष पर जीवन भर किसी अपराध को लेकर कोई मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। इस संशोधन को राज्यसभा ने पारित भी कर दिया, लेकिन इसे लोकसभा में पेश नहीं किया गया। सबसे शर्मनाक तो संविधान का 42वां संशोधन था, इसके जरिए संविधान के मूल ढाँचे को कमजोर करने, उसकी संघीय विशेषताओं को ध्वस्त करने और सरकार के तीनों अंगों के संतुलन को बिगाड़ने की साजिश की गई थी।

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स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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