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नागरिकता संशोधन बिल राज्यसभा से पास होने पर शाह बोले - नेहरु की एतिहासिक गलती सुधारी

नागरिकता संशोधन बिल राज्यसभा से पास होने पर शाह बोले - नेहरु की एतिहासिक गलती सुधारी

नईदिल्ली/वेब डेस्क। नागरिकता संशोधन विधेयक पर राज्यसभा में चर्चा का जवाब देते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि यदि देश का धार्मिक आधार पर बंटवारा न होता तो यह बिल न लाना पड़ता। अमित शाह ने कांग्रेस पर वार करते हुए कहा कि आखिर जिन लोगों ने शरणार्थियों को जख्म दिए हैं, वही अब जख्मों का हाल पूछ रहे हैं। उन्होंने कहा, 'यदि कोई सरकार पहले ही इस समस्या का समाधान निकाल लेती तब भी यह बिल न लाना पड़ता।'

गृह मंत्री ने महात्मा गांधी के भाषण का जिक्र करते हुए बिल का बचाव किया। उन्होंने कहा, महात्मा गांधी ने 26 सितंबर, 1947 को कहा था कि पाकिस्तान के हिंदू और सिख यदि वहां नहीं रहना चाहते हैं तो वे भारत आएं। उन्हें स्वीकार करना भारत सरकार की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा था कि भारत सरकार का जिम्मा है कि वह उन्हें रोजगार समेत तमाम अवसर दे।'

कांग्रेस के नेताओं का भाषणों का जिक्र करते हुए शाह ने कहा कि मुझे आइडिया ऑफ इंडिया न समझाएं। हम यही जन्मे हैं और यहीं मरेंगे। सात पीढ़ियों से हम यहीं रह रहे हैं। अमित शाह ने कहा कि मैं विदेश से नहीं आया हूं, यहीं जन्म लिया है।

यही नहीं इस बीच अमित शाह ने शिवसेना पर भी तंज कसते हुए कहा कि मैं हैरान हूं कि आखिर सत्ता के लिए लोग कैसे-कैसे रंग बदलते हैं। होम मिनिस्टर ने कहा कि शिवसेना ने लोकसभा में इस बिल का समर्थन किया था, लेकिन फिर क्या हुआ कि आज उसने अपना स्टैंड बदल दिया।

पाकिस्तान के पीएम इमरान खान ने कल जो बयान दिया और आज कांग्रेस के नेताओं ने जो बयान दिए हैं, वह एक समान हैं। उन्होंने कहा कि सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक और आर्टिकल 370 तक पर पाकिस्तान के पीएम और कांग्रेस के बयानों में कोई अंतर नहीं है। नागरिकता संशोधन विधेयक पर भी पाक और कांग्रेस की राय में कोई अंतर नहीं है।

देश के विभाजन के लिए सावरकर को जिम्मेदार ठहराने को लेकर शाह ने कहा कि यह जिन्ना की मांग के चलते हुआ था। उन्होंने कहा कि बंटवारा इसीलिए हुआ क्योंकि कांग्रेस ने विभाजन की मांग को स्वीकार किया। आखिर किसी ने भी विभाजन की बात की हो, लेकिन कांग्रेस ने इसे स्वीकार क्यों किया।

मुस्लिमों को दायरे से बाहर रखने के सवाल पर शाह ने कहा कि उनके लिए अलग से नागरिकता के लिए आवेदन का प्रावधान है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आने वाले 566 से ज्यादा मुस्लिमों को मोदी सरकार ने बीते 6 सालों में नागरिकता दी है।

होम मिनिस्टर ने विपक्ष पर ही सवाल उठाते हुए कहा कि हमने इस बिल में 6 धर्मों को शामिल किया है, यह पंथनिरपेक्षता है। लेकिन आपकी पंथनिरपेक्षता के दायरे में क्या सिर्फ मुस्लिम ही आते हैं। आर्टिकल 14 के उल्लंघन के आरोप का जवाब देते हुए शाह ने कहा कि हम इसमें किसी धर्म को शामिल नहीं कर रहे बल्कि अल्पसंख्यक वर्ग की बात है। यह कोई समुदाय नहीं है बल्कि एक वर्ग है।

विपक्ष पर तीखा तंज कसते हुए शाह ने कहा कि अंधेरे कमरे में बैठकर सोचें कि बिल कितना जरूरी है। अपने भाषण के दौरान विपक्षी सांसदों के हंसने पर शाह ने कहा कि जब आप हंसते हैं तो पीड़ित देखते हैं कि आप उनकी मुसीबतों पर हंस रहे हैं।

धर्म के आधार पर देश का विभाजन सबसे बड़ी भूल था, इसी के चलते यह बिल लाना पड़ रहा है। सावरकर और जिन्ना का जिक्र किया। शाह ने कहा कि नेहरू ने लियाकत अली के साथ 8 अप्रैल, 1950 में समझौता किया था। उस बिल का पाकिस्तान की ओर से पालन न होने के चलते इस बिल को लाने की जरूरत पड़ी है।

गृह मंत्री ने कहा कि पाक में लगातार अल्पसंख्यक घटते गए। जबकि भारत में चीफ जस्टिस, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति समेत तमाम पदों पर मुस्लिम समुदाय के लोगों को मौका मिला। ऐसे में पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के अल्पसंख्यक शरणार्थियों को नागरिकता नहीं देंगे तो फिर किसे देंगे।

अमित शाह ने कहा कि जिन लोगों ने यातनाएं दी हैं, वही अब जख्म के बारे में पूछ रहे हैं। उन्होंने कहा कि हम ऐसा बिल लाए हैं, जिसके कानून बनने पर शरणार्थी बिना भय के अपनी पहचान बता सकेंगे और कहेंगे कि हमें नागरिकता दो। इस बिल को ध्यान बंटाने के लिए लाने के आरोप का जवाब देते हुए शाह ने कहा कि हम इसे 2015 में ही लाए थे। आखिर तब हमें इसकी क्या जरूरत थी। हम चुनाव अपने नेता के दम पर लड़ते हैं।

सिब्बल के बयान पर हमला बोलते हुए शाह ने कहा कि आप ही कहते हैं मुस्लिमों में डर हैं। हम तो यही कहते हैं कि देश के गृह मंत्री पर भरोसा रखना चाहिए। होम मिनिस्टर ने कहा कि यह बिल किसी की नागरिकता नहीं छीनता है बल्कि शरणार्थियों को नागरिकता देता है। भारत के मुस्लिमों को हमने सम्मान दिया है।

अमित शाह ने कहा कि यह आश्चर्य की बात है कि बिल में मुस्लिमों के लिए प्रावधान न होने पर सवाल उठाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि छह समुदाय के लोगों को इसमें शामिल किया गया है, लेकिन इसके लिए कोई प्रशंसा क्यों नहीं की जा रही। उन्होंने कहा कि आखिर आप ही बताएं कि क्या पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में मुस्लिमों को अल्पसंख्यक माना जाएगा।

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