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अविस्मरणीय ! आत्मीय ! लेह-लद्दाख

प्रो. उर्मिला सिंह तोमर

अविस्मरणीय ! आत्मीय ! लेह-लद्दाख

'भारतीय साहित्य में लोकजीवन और हिमालय' इस विषय को लेकर अखिल भारतीय साहित्य परिषद एवं केन्द्रीय बौद्ध विद्या संस्थान लेह-लद्दाख के संयुक्त तत्वावधान में दो दिवसीय 03-04 अगस्त 2019 को राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें विचारकों एवं चिंतकों ने भारतीय साहित्य एवं लोक-जीवन में हिमालय की महत्ता को विविध प्रकार से वर्णित किया एवं हिमालय भ्रमण के दौरान ऊँचे-ऊँचे शिखरों, झरनो, नदियों, जन जीवन को नजदीक से जाना एवं अनुभव किया। उक्त संगोष्ठी में हिमालय और जन जीवन के संबंध में विचार व्यक्त करने के साथ साथ वहां के परिवेश को देखने का मुझे भी सुअवसर प्राप्त हुआ।

हिमालय की गोद में वसा लेह-लद्दाख जहाँ चतुर्तिक ऊँची-ऊँची चोटियों से घिरा परिवेश अनायास ही मानव मन को अत्यंत आकर्षित करता है। एक ओर कल-कल करती सिंधु के प्रबल प्रवाह से युक्त पावन लहरें जहाँ मानव जीवन को निरंतर प्रवाहित होने एवं अनवरत आगे बढऩे का संदेश देती सी प्रतीत होती हैं वहीं दूसरी ओर पर्वतराज हिमालय के उत्तुंग शिखर मनुष्य को सदैव ऊँचा उठने और ऊँचा सोचने हेतु प्रेरित करते दृष्टिगोचर होते हैं।

इस दृश्य की अनुभूति को कहना तो 'गूँगी केरी-शर्करा खाये और मुस्क्यायÓ बाली बात होगी।

इन पहाड़ों के बीच शाँति ऐसी कि ध्यानावस्थित होने को मन चाहे सर्वत्र परिवेश ऐसा जैसे प्रकृति ध्यानमग्न (मेडिटेशन) होने की प्रेरणा देती सी लगती है। न कोई क्रत्रिमता , न ही कोई हलचल, न शहरों जैसी चहल-पहल न कोई चीख-चिल्लाहट, न होड़- मारामारी, इतना शाँत वातावरण कि बार-बार-मन कह उठे कि बुद्धं शरणं गच्छामि संघं शरणं गच्छामि। लेह-लद्दाख के इस वातावरण को देख और जीकर ही ज्ञात हुआ कि महात्मा गौतम बुद्ध ने अपनी तपस्थली इस परिवेश को क्यों बनाया था।

उत्तुंग शिखरों (मानसरोवर) के मध्य से ही गंगा-यमुना, सिंधू, ब्र हपुत्र जैसी पुण्य सलिलाओं का उद्गम हुआ है जिनकी पावन धारा सदियों से भारत के धराधाम को पौषित और पल्लवित करती रही है। लेह-लद्दाख के निवासी इन उत्तुंग शिखरों के मध्य मानव जीवन के उज्ज्वल पक्ष को लेकर जीवन के मूलमंत्र शाँति-प्रेम और सद्भाव का संदेश देते प्रतीत होते हं।

रहने और व्यवस्थाओं के नाम पर बहुत ज्यादा स पन्नता न होने के बावजूद यहाँ का जन-जीवन शाँत और संतुष्ट है। अत्यंत विनम्र और सहृदयी ये लेह-लद्दाख के निवासी इन तीन-चार दिवसों में हमें जीत ले गये या यूँ कहें हमारे हृदयस्थ हो गये। मानव जीवन में आत्मीयता का क्या महत्व है? कोई इनसे सीखे। प्रेम शाँति का यह पाठ यदि पढऩा है तो अवश्य ही एक बार लेह लद्दाख आकर इनके बीच रहिये, इन्हें जानिये और अपने जीवन को सँवारिये।

सिंधु और झंस्कार नदियों का संगम हमें अलग-अलग रीति-रिवाज के होने पर भी मेल जोल से रहकर मानव जीवन को सफल बनाने का संदेश दे रहा था। वहीं हिमालय की ऊँची-ऊँची चोटियों के बीच विराजमान भगवान बुद्ध की विशाल प्रतिमाओं से युक्त मोनेस्ट्रियाँ हमें आध्यात्मिक जीवन में गहरे उतरने के लिए और मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य जानने के लिए जैसे कह रही थी अर्थात मानव जीवन के सत्य को उद्घटित एवं व्या यायित कर रही थी।

एक बार बहुत विचित्र सा लगा जब यहाँ अगस्त के महीने में गेंहू की बालियों युक्त फसल दिखाई दी, क्योंकि हमारे यहाँ यह फसल जनवरी-फरवरी में होती है। इस गेंहू की फसल को देखकर ज्ञात हुआ कि पंद्रह-बीस दिनों में यह पककर तैयार हो जाएगी। जिसे यहाँ के निवासी अगले छ:महीनों के जीवन यापन के लिए सुरक्षित रखते है। क्योंकि अक्टूबर से मार्च तक संपूर्ण परिवेश वर्फाच्छादित हो जाता है, तथा समस्त विभागों में छह महीने की छुट्टी हो जाती है।

महात्मा गौतम बुद्ध की पर परा के अनुयायी यह समस्त लेह-लद्दाख के निवासी संपूर्णता से बुद्ध की शरण में तथा आध्यात्मिता के रंग में रंगे हुए है। अनेक भिक्षु एवं भिक्षुणियाँ यहाँ अपना सर्वस्व समर्पित करके इस संस्कृति एवं अक्षुण्ण पर परा को निरंतर विकसित एवं संरक्षित करने में अपना योगदान दे रहे हैं।

यहाँ आने पर प्रथम दिवस ही निर्देशित किया गया है कि चौबीस से अडतालीस घण्टे पहले आराम कीजिए। तत्पश्चात भ्रमण हेतु निकलिए। क्योंकि स्वांस का सामांजस्य अचानक से परिवर्तित वातावरण में अनुकूलन नहीं कर पाता है, परिणाम स्वरूप सांस फूलने लगती है सिर में भारीपन एवं हाथ-पैर सुन्न से पडऩे लगते हैं। जलवायु एवं वातावरण में परिवर्तन होने से स्वांस लेने में कठिनाई होने लगती है। इस हेतु हम अपने साथ छोटे-छोटे ऑक्सीजन के सिलेण्डर साथ लेकर गये थे, जिसका अनेक बार सदुपयोग किया गया।

शहरों के जीवन यापन में जहँा अनंत संसाधनों का प्रयोग होता है और जीवन मे कृत्रिमता आती जा रही है। वहीं कम संसाधनों में जीवन यापन करना कोई इन लेह-लद्दाख के निवासियों से सीखे। हर व्यक्ति जैसे शांति पूर्वक चिंतन में डूबा हुआ है तथा अपने काम में रमा हुआ है, अपने आप में अवस्थित है।

यहाँ की अति प्राचीन बौद्ध पर परा को दर्शाने वाली थिक्से मोनेस्ट्री, आल्ची मोनेस्ट्री जो बुद्ध भगवान के करूणा और मंजूश्री भाव को दर्शाती हैं। जिसको इन्होने इस प्राचीन पर परा को वर्तमान तक अत्यंत मनोयोग से सहेजा हुआ है। यह अनुपम धरोहरें अनमोल है, जो हमारे समृद्ध अतीत को दर्शाती हैं।चतुर्दिक हिमालय की समृद्ध ऊँची-ऊँची चोटियॉ और सिंधु नदी की कल-कल धारा प्रवाह जिनके जीवन में रचा बसा हो वह तो प्रकृति की सुंदर सौगात है।

सिंधु एवं झंस्कार नदी का संगम स्थल ऐसा कि दर्शन कर मन में सिंधु की लहरें हिलोरे मारने लगीं हम सिंधु की लुभावनी लहरों में डूबने-उतराने लगे। हमारे मन प्रफुल्लता से पूरित होकर पुण्य सरिताओं की भाँति तरल हो गये, और एक नदी जैसे हमारे हृदयों में प्रवाहित होने लगी।

महात्मा बुद्ध की तपस्थली होने के परिणाम स्वरूप संपूर्ण परिवेश जैसे- बुद्ध की करूणामय हो गया है तथा चतुर्दिक इसी भाव की प्रधानता दृष्टिगोचर होती है। सुंदर प्राकृतिक परिवेश और करुणा से परिपूर्ण हृदय जन जीवन यहॉ का मूल है। ऐसी पावन भूमि के दर्शन कर वहाँ के सुंदर- सुखद परिवेश में कुछ दिन जीकर हम धन्य हुए तथा मानव जीवन के सार को अनुभव करने का अवसर पाया। त्याग और समर्पण का साक्षात उदाहरण कारगिल के शहीदों के लिए बनाया गया वृहत संग्रहालय 'हॉल ऑफ लैमÓ देखकर अपने देश के प्रति हजारों भारतीय सेना के जवानों के प्रति हमारा हृदय श्रद्धा और गौरव से भर गया।

ऊॅचे-ऊॅचे पहाड़, नदी की अविरल धारा तथा मनुष्य पशु पक्षी और प्रकृति का ऐसा सुंदर सामंजस्य कि व्यक्ति का मन तरल हुए बिना नहीं रहता है। इन पहाड़ों के बीच अनेक प्रकार की जड़ी बूटियाँ विराजमान है इन पर गहन शोध की आवश्यकता है। भारतीय साहित्य एवं लोक जीवन में हिमालय की महत्ता सदैव से प्रतिपादित की गई है। छायावाद की प्रसिद्ध कवयित्री जिन्हे आधुनिक युग की मीरा कहा जाता है ने भी अपनी 'हिमालयÓ नामक पुस्तक में हिमालय-महात् य का वर्णन किया है। इसके अतिरिक्त रामधारी सिंह दिनकर, सोहन लाल द्विवेदी आदि ने अपनी रचनाओं में हिमालय के महत्व को महत्वपूर्ण रूप से वर्णित किया है।

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