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ट्रम्प-किम मुलाकात एक ऐतिहासिक पल

वास्तव में रूस और चीन जैसे देश को छोड़ दिया जाय तो पूरी दुनिया में उत्तर कोरिया का कोई बड़ा हितैषी नजर नहीं आता।

ट्रम्प-किम मुलाकात एक ऐतिहासिक पल

वास्तव में रूस और चीन जैसे देश को छोड़ दिया जाय तो पूरी दुनिया में उत्तर कोरिया का कोई बड़ा हितैषी नजर नहीं आता। इस परिप्रेक्ष्य में दृष्टि गड़ा के देखें तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और किम जोंग की मुलाकात ने उत्तर कोरिया को यह अवसर दे दिया है कि वह न केवल अपना निर्वासन खत्म करे बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय बिरादरी से जुड़ने के अवसर का लाभ भी उठाये। बरसों की तनातनी मात्र एक मुलाकात से दुनिया के लिये राहत की सांस बन जायेगी ऐसी अवधारणा इतिहास में शायद ही हो। डोनाल्ड ट्रंप और उत्तर कोरिया के किम जोंग ने सिंगापुर में 12 जून 2018 को जो किया वह विश्व इतिहास के पन्ने पर चस्पा आम इतिहास तो नहीं कहा जायेगा। इसी वार्ता ने दोनों देशों के 68 बरस की शत्रुता का अंत कर दिया। गौरतलब है 1950 से 1953 के उत्तर व दक्षिण कोरियाई युद्ध के बाद अमेरिका और उत्तर कोरिया के राष्ट्राध्यक्षों की यह पहली मुलाकात थी। सिंगापुर के सेंटोसा द्वीप पर स्थित कैपिला होटल में 50 मिनट की ऐतिहासिक शिखर वार्ता ने जिस राह को अख्तियार किया वह कहीं न कहीं तीसरे विश्व युद्ध के आगाज का भी अन्त कहा जा सकता है। खास यह भी है कि आइजन हॉवर (1953) से लेकर बराक ओबामा (2016) तक 11 राष्ट्रपतियों ने उत्तर कोरिया से सम्बंध सुधारने की कोशिश की लेकिन सफलता डोनाल्ड ट्रंप के हिस्से में आयी।

ट्रंप और किम की शिखर बैठक ने उत्तर कोरिया को यह मौका दे दिया कि वह अपना परमाणु कार्य खत्म कर अपने देश को गरीबी और बदहाली से उबारे। ट्रंप ने भी इसकी सुरक्षा की गारंटी की बात कह दी है परन्तु उस पर प्रतिबंध जारी रहेंगे। रोचक यह भी है कि किम और ट्रंप जो एक-दूसरे को फूटी आंख नहीं भा रहे थे साथ ही शब्दों के बाण और धमकियां जहां दोनों ओर से अनवरत जारी थी वहीं सिंगापुर में दोनों गहरी सूझबूझ दिखा रहे थे। कई अवसर ऐसे भी देखे गये जब मनोवैज्ञानिक संतुलन के लिये ट्रंप ने किम के बांह और पीठ पर हाथ रखा, एक बार किम ने भी ऐसा किया। ट्रंप के हावभाव ने यह भी एहसास कराया कि अमेरिका ताकत वाला देश है। 71 वर्षीय ट्रंप और 34 वर्षीय किम के बीच वाकई में अच्छी कैमिस्ट्री देखने को मिली। उत्तर कोरिया में कम उम्र के लोगों को बड़ों से पहले स्थल पर पहुंचना होता है इसका निर्वहन करते हुए किम 7 मिनट पहले से वहां उपलब्ध थे। चन्द माह पहले दोनों देश शत्रुता के चरम बिन्दु पर थे और युद्ध के कगार पर पहुंच गये थे अब उनके बीच शान्ति का पर्व वाकई अद्भुत है। अमेरिका की आंखों में चुभने वाला किम अब ट्रंप के लिये प्रतिभाशाली हो गया है और व्हाइट हाउस में बुलाने लायक भी। दरअसल वैश्विक फलक पर कूटनीति सीधे राह पर नहीं चलती बल्कि यह अपना टेढ़ा-मेढ़ा स्वरूप भी अख्तियार करती है। उत्तर कोरिया भले ही राह से भटक कर साल 2006 से लेकर अब तक 6 परमाणु परीक्षण समेत कई बैलिस्टिक मिसाइल का परीक्षण कर दुनिया के लिये किरकिरी बना हो पर अमेरिका से सम्बंध जुड़ने के बाद सभी इसके घातक सिद्धांत से कमोबेश मुक्त महसूस कर रहे होंगे। इसमें सबसे ज्यादा दक्षिण कोरिया और जापान खुश होंगे। गौरतलब है कि ट्रंप ने मुलाकात से पहले जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे और दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून से फोन पर बातचीत की थी। वार्ता के बाद ट्रंप ने जापान और चीन के प्रयासों को लेकर उनकी सराहना भी की थी।

फिलहाल ट्रंप और किम की मुलाकात से दुनिया चैन की सांस ले सकती है मगर उत्तर कोरिया को वार्ता के लिये डोनाल्ड ट्रंप के समीप पहंचाने हेतु चीन और रूस की पर्दे के पीछे की भूमिका को कमतर नहीं आंका जा सकता। वार्ता से पहले किम ने दो बार चीन की यात्रा की जाहिर है कि चीन की सीख उसे काम आयी होगी। किम ने बीते कुछ महीनों में जिस तर्ज पर अपने को परिवर्तित नेता के रूप में परोसने की कोशिश की वह भी वार्ता की सफलता के लिये अहम सिद्ध हुआ। इस मुलाकात के वैश्विक पटल पर कई मायने निकाले जा सकते हैं परन्तु भारत के लिये उत्तर कोरिया एक नया बाजार हो सकता है और कोरियाई प्रायद्वीप में वह अपनी वृहद् नीति को तत्परता से आगे बढ़ा सकता है। जाहिर है यहां से अब आगे की कवायद कूटनीतिक व आर्थिक हितों को साधने की होगी। कोरियाई प्रायद्वीप अब एक साथ अमेरिका, चीन व जापान जैसी विश्व शक्तियों की कूटनीतिक गतिविधियों का बड़ा केन्द्र हो सकता है। ऐसे में भारत को भी अपने हितों को लेकर कुछ हद तक सतर्क रहना होगा। हाल ही के वर्षों में देखा गया है कि प्रशान्त महासागर के क्षेत्र में देशों की आक्रामक नीतियां रही हैं। अमेरिका और कोरियाई द्वीप समेत जापान के साथ यदि चीन का परिप्रेक्ष्य भी सकारात्मक होता है तो इस बदले हुए परिप्रेक्ष्य में भारत के हित प्रभावित हो सकते हैं पर सच्चाई यह भी है कि चीन को छोड़ सभी देशों से भारत के रिश्ते अच्छे हैं।

रिश्ते तो चीन से भी अच्छे हैं ऐसे में इसकी सम्भावना कम है परन्तु फिर भी सतर्क रहने की आवश्यकता रहेगी। भारत 2016 में चीन के बाद उत्तर कोरिया का दूसरा सबसे बड़ा कारोबारी साझेदार देश था। वह बड़े पैमाने पर यहां खाद्यान्न की आपूर्ति भी करता रहा। विदेश नीति के जानकार यह मानते हैं कि ट्रंप और किम की मुलाकात के बाद यहां की फिजा बदलेगी जरूर। इसमें दक्षिण कोरिया की भी भूमिका अहम मानी जा सकती है। गौरतलब है कि दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति मून पहले से ही भारत आने की तैयारी में है लेकिन उत्तर कोरिया में मचे घमासान के बीच यह सम्भव नहीं हुआ। सम्भव है कि अगले महीने जुलाई में उनकी यात्रा सम्पन्न हो।

किम जोंग ने भी कहा है कि दुनिया अब नया बदलाव देखेगी। ट्रंप और किम जोंग ने पनपते विश्व अशान्ति को शान्त कर दिया है परन्तु आतंकवाद से दुनिया अभी भी त्रस्त है। भारत के लिये आतंकवाद बड़ा पहलू रहा है। यही कारण है कि ट्रंप की निगाहें पाकिस्तान पर टेढ़ी ही हैं। भले ही उन्होंने पाकिस्तान को धूर्त देश घोषित किया हो पर आतंक को लेकर अभी अढ़ाई कोस भी नहीं चल सके हैं। सम्भव है कि उत्तर कोरिया से ध्यान हटाकर अब ट्रंप पाकिस्तान पर निगाहें लगायें। यदि पाक आयातित आतंक से भारत को राहत मिलती है तो यह उसकी बड़ी सफलता होगी और काफी हद तक चीन को भी सबक मिलेगा। सभी जानते हैं कि हर मौके पर चीन पाकिस्तान के साथ होता है।

फिलहाल सिंगापुर में इस साल की सबसे जबरदस्त तस्वीर तब देखने को मिली जब ट्रंप और किम टेबल टॉक कर रहे थे और दोस्ती की मिसाल के साथ इतिहास गढ़ रहे थे। वार्ता के दो दौर थे और इसकी गम्भीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ट्रंप ने दुनिया की सबसे बड़ी और खतरनाक समस्या का हल इस वार्ता को करार दिया। परमाणु बम पर बटन दबाने की धमकी देने वाले दोनों नेता आपस में मुस्कुरा और खिलखिला रहे थे। कह सकते हैं कि पहली मुलाकात का आगाज यह है तो किम द्वारा किये गये वायदे जिसे लेकर ट्रंप को पूरा विश्वास है कि निभाया जायेगा उस पर किम खरा उतरता है तो अमेरिका का उत्तर कोरिया के प्रति आने वाले दिनों में अंदाज कहीं अधिक सकारात्मक और अलग दिखेगा। सबके बाद दो टूक यह है कि 12 जून, 2018 अन्तर्राष्ट्रीय बिरादरी में एक ऐसी तिथि है जिसका मंथन कई अवसरों पर समय के साथ किया जाता रहेगा।
( सुशील कुमार सिंह : लेखक वाईएस लोक प्रशासन शोध प्रतिष्ठान के निदेशक हैं )

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