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जनसंख्या विस्फोट एक जटिल चुनौती

प्रवीण गुगनानी

जनसंख्या विस्फोट एक जटिल चुनौती

पूर्वोत्तर के राज्यों में पांथिक आधार पर हो रहा जनसांख्यिकीय असंतुलन और भी गंभीर रूप ले चुका है। आज अगर हम अरुणाचल प्रदेश की बात करें तो यहां की स्थिति अत्यंत चिंताजनक हो गई है। अरुणाचल प्रदेश एक ऐसा भारतीय भूभाग है जहां ईसाई आबादी में सबसे अधिक वृद्धि दर्ज हुई है। ईसाई जनसंख्या में यह वृद्धि साफ तौर पर ईसाई मिशनरीज की ओर से बड़े स्तर पर पूर्वोत्तर के राज्यों में चलाये गए सुनियोजित मतांतरण के षड्यंत्रकारी खेल की कलई खोलती है। ईसाई समुदाय की जनसख्या में 11.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी सहज नहीं बल्कि एक सोची समझी चाल व षड्यंत्र का एक भाग ही हो सकता है। अरुणाचल प्रदेश में वर्ष 2001 में ईसाई आबादी 18.5 प्रतिशत थी, जो 2011 में बढ़कर 30 प्रतिशत हो गई, जबकि हिंदू आबादी 2001 में 34.6 फीसदी थी जो कि घटकर 2011 में केवल 29 प्रतिशत रह गई। अरुणाचल प्रदेश में भारत में उत्पन्न मत-पंथों को मानने वाले जहां 1951 में 99.21 प्रतिशत थे, वे 2001 में 81.3 प्रतिशत व 2011 में 67 प्रतिशत ही रह गये हैं। केवल एक दशक में ही अरूणाचल प्रदेश में ईसाई जनसंख्या में 13 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

पूर्वोत्तर के ही मणिपुर राज्य में भी ईसाई धर्मांतरणकारी संस्थाओं ने अपने धन, बुद्धि व संसाधनों के बल पर ऐसा ही जनसांख्यिकीय विनाश मचाया है। मणिपुर की जनसंख्या में हिंदुओं का अनुपात 1951 में जहां 80 प्रतिशत से अधिक था, वह 2011 की जनगणना में 50 प्रतिशत ही रह गया है।

असम में तो बांग्लादेशी घुसपैठियों ने न केवल जनसांख्यिकीय चरित्र बदल दिया बल्कि वहां के मूलनिवासियों का जीना ही हराम कर दिया है। बांग्लादेश से अवैध पलायन के चलते 2047 तक असम में स्थानीय आबादी के सिमटकर अल्पसंख्यक हो जाने का खतरा है। इसके अतिरिक्त, देश के सीमावर्ती प्रदेशों यथा पश्चिम बंगाल व बिहार के सीमावर्ती जिलों में तो मुस्लिम जनसंख्या की वृद्धि दर राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है, जो स्पष्ट रूप से बांग्लादेश से अनवरत घुसपैठ का संकेत देता है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त उपमन्यु हजारिका आयोग के प्रतिवेदन एवं समय-समय पर आये न्यायिक निर्णयों में भी इन तथ्यों की पुष्टि की गयी है। यह भी एक सत्य है कि अवैध घुसपैठिये राज्य के नागरिकों के अधिकार हड़प रहे हैं तथा इन राज्यों के सीमित संसाधनों पर भारी बोझ बन सामाजिक-सांस्कृतिक, राजनैतिक तथा आर्थिक तनावों का कारण बन रहे हैं।

भारत में जनसांख्यिकीय असंतुलन एक बहुत बड़ी समस्या बन गया है। राष्ट्रीय, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक व आर्थिक स्तर पर यह जनसंख्या असंतुलन भारत को एक खतरनाक दिशा की ओर सतत खींच रहा है। जनसंख्या असंतुलन की ओर व इस कारण से उपज रही कई प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष समस्याओं की ओर समाज का ध्यान न जाना व समाज में इस संदर्भ में गंभीर विमर्श का प्रारम्भ न होना एक विनाशकारी लक्षण है। आज भारतीय समाज की सबसे बड़ी आवश्यकता है कि योजनाबद्ध तरीके से चल रहे जनसांख्यिकीय परिवर्तनों को समाज चिन्हित करे, उनका विश्लेषण करे, उसके कारकों को पहचाने व इस गंभीर समस्या के दुष्परिणामों से देश को बचाने हेतु यत्न-प्रयत्न प्रारम्भ करे।

देश में जनसंख्या नियंत्रण हेतु किए विविध उपाय अपने स्तर पर प्रभावी रहे हैं और पिछले दशक में जनसंख्या वृद्धि दर में पर्याप्त कमी आयी है। 2011 की जनगणना के पांथिक आधार पर किये गये विश्लेषण से विविध संप्रदायों की जनसंख्या के अनुपात में जो परिवर्तन सामने आया है, उसके दृष्टिगत जनसंख्या नीति पर पुनर्विचार की तीव्र आवश्यकता प्रतीत होती है। विविध धर्म, सम्प्रदायों की जनसंख्या वृद्धि दर में भारी अन्तर, सतत-अनवरत विदेशी घुसपैठ व मतांतरण के कारण देश की समग्र जनसंख्या विशेषकर सीमावर्ती क्षेत्रों की जनसंख्या के अनुपात में बढ़ रहा असंतुलन देश की एकता, अखंडता, सांस्कृतिक पहचान, आर्थिक आधार, शैक्षणिक स्तर के लिए गंभीर संकट का कारण बन गया है। यही नहीं जनसंख्या का यह बलात व योजनाबद्ध रीति से उत्पन्न किया गया असंतुलन अनेक स्थानों पर संवैधानिक चुनौतियां निर्मित कर रहा है।

सर्विदित है कि विश्व में भारत उन अग्रणी देशों में से था, जिसने वर्ष 1952 में ही जनसंख्या नियंत्रण के उपायों की घोषणा की थी, किंतु परिस्थितियों के कारण व व्यापक विमर्श के अभाव में भारत की जनसंख्या नीति सामयिक लक्ष्य तय नहीं कर पाई व सही दिशा में नहीं चल पाई। वर्ष 2000 में ही भारत में एक समग्र जनसंख्या नीति का निर्माण हुआ और तत्पश्चात जनसंख्या आयोग का गठन हुआ। भारत की इस नवनिर्मित जनसंख्या नीति का उद्देश्य 2.1 की 'सकल प्रजनन-दरÓ की आदर्श स्थिति को 2045 तक प्राप्त करना व इसे स्थिर रखकर स्वस्थ जनसंख्या के लक्ष्य को प्राप्त करना था। इस नीति से यह अपेक्षा रखी गई थी कि यह नीति अपने राष्ट्रीय संसाधनों और भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए प्रजनन-दर का यह लक्ष्य समाज के सभी वर्गों पर समान रूप से लागू करा पाएगी, किंतु अतिशीघ्र ही सभी वर्गों से इस प्रजनन दर की आशा रखना एक दिवास्वप्न सिद्ध हुआ। इस विराट किंतु महत्वपूर्ण लक्ष्य में देश के हिंदू समुदाय ने प्राणपण से सहयोग दिया किंतु मुस्लिम समुदाय ने जनसंख्या नीति के इस लक्ष्य की धज्जियां उड़ा दीं। 2005-06 के राष्ट्रीय प्रजनन एवं स्वास्थ्य सर्वेक्षण व वर्ष 2011 की जनगणना के 0-6 आयु वर्ग के पांथिक आधार पर प्राप्त आंकड़ों से 'असमानÓ सकल प्रजनन दर एवं बाल जनसंख्या अनुपात के खतरनाक संकेत मिलते हैं। यह खतरनाक संकेत इस तथ्य से भी प्रकट होता है कि वर्ष 1951 से 2011 के बीच जनसंख्या वृद्धि दर में भारी अंतर के कारण देश की जनसंख्या में जहां भारत के मूल मत पंथों के अनुयायियों का अनुपात 88 प्रतिशत से घटकर 83.8 प्रतिशत रह गया है, वहीं देश में मुस्लिम जनसंख्या का अनुपात 9.8 प्रतिशत से बढ़ कर 14.23 प्रतिशत हो गया है।

जनसंख्या असंतुलन अंक गणित की दृष्टि से

देश में बढ़ती जनसंख्या की समस्या एक बड़ी चिंता है किंतु जिस प्रकार षड्यंत्र पूर्वक जनसंख्या असंतुलन को बढ़ाया जा रहा है वह एक अतीव व गंभीर चिंतनीय विषय हो गया है। 2011 की जनसंख्या के आंकड़ों ने यह तथ्य देश के सामने रखा कि यदि जनसंख्या असंतुलन की यह दर जारी रही तो देश के अनेक राज्य सैकड़ों जिले (लोकसभा)व हजारों तहसीलें (विधानसभा) षड्यंत्र पूर्वक अशांति, सामाजिक वैमनस्यता व सांप्रदायिक बिगड़ाव व टकराव के शिकार हो जायेंगे।

वर्ष 2011 के जनगणना के आंकड़ों के अनुसार भारत में हिंदू जनसंख्या 96.63 करोड़ (79.8 प्रतिशत), मुस्लिम आबादी 17.22 करोड़ (14.2 प्रतिशत), ईसाई 2.78 करोड़ (2.3 प्रतिशत), सिख 2.08 करोड़ (1.7 प्रतिशत), बौद्ध 0.84 करोड़ (0.7 प्रतिशत), जैन 0.45 करोड़ (0.4 प्रतिशत) तथा अन्य धर्म और मत (ओआरपी) 0.79 करोड़ (0.7 प्रतिशत) हैं।

जनसंख्या के इन आंकड़ों के अनुसार 2001 से 2011 के बीच मुस्लिम जनसंख्या में बढ़ोतरी हुई और हिंदू जनसंख्या घटी है। सिख समुदाय की जनसंख्या में 0.2 प्रतिशत बिंदु पीपी की कमी आई और बौद्ध जनसंख्या 0.1 पीपी कम हुई। उपरोक्त अवधि में ईसाइयों और जैन समुदाय की जनसंख्या में कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन नहीं आया। वर्ष 2001 की जनसंख्या गणना के आंकड़ों के अनुसार भारत की कुल जनसँख्या 102 करोड़ थी जिसमें हिंदुओं की आबादी 82.75 करोड़ (80.45 प्रतिशत) और मुस्लिम जनसँख्या 13.8 करोड़ (13.4 प्रतिशत) थी। भारत में इस समय तक जनसंख्या गणना में किसी भी व्यक्ति की जाति सम्बंधित सूचना या जानकारी दर्ज नहीं की जाती थी। भारत में अंग्रेजों के शासन 1931 के बाद पहली बार स्वतंत्र भारत में, वर्ष 2011 में भारत में जाति आधारित जनगणना की गई थी।

ध्यान देने योग्य विषय है कि 2011 में भारत की मौजूदा आबादी 1 अरब 21 करोड़ थी। वर्ष 2001 से 2011 के मध्य भारत की जनसंख्या 17.6 प्रतिशत की दर से 18 करोड़ बढ़ी। उल्लेखनीय रूप ये वृद्धि वर्ष 1991-2001 की वृद्धि दर, 21.5 प्रतिशत, से करीब 4 प्रतिशत कम है। भारत की जनसंख्या वृद्धि दर में आई 4 प्रतिशत की कमी का एक मात्र व 100 प्रतिशत प्रभावकारी तत्व हिंदू समाज के लोग रहे। यह भी उल्लेखनीय तथ्य है कि इस अवधि में भारत की साक्षरता दर भी 64.83 प्रतिशत से बढ़कर 74.40 प्रतिशत हो गई, और यह वृद्धि भी लगभग पूर्णत: हिंदू समाज जनित ही रही।

इन सभी प्रकार की नई उपजती स्थितियों व समस्याओं के चलते आज आवश्यक हो गया है कि

1. देश में उपलब्ध संसाधनों, भविष्य की आवश्यकताओं एवं जनसांख्यिकीय असंतुलन की समस्या को ध्यान में रखते हुए देश की जनसंख्या नीति का पुनर्निर्धारण कर इस नीति को सभी धर्म, जाति, मत, पंथ सम्प्रदायों पर एक समान रूप से लागू किया जाए।

2. भारत की सीमाओं पर हो रही अवैध घुसपैठ को निर्णायक व पूर्ण रीति नीति से प्रतिबंधित किया जाए। एनआरसी यानी राष्ट्रीय नागरिक पंजिका का निर्माण कर भारत में आने वाले घुसपैठियों को नागरिकता, मतदान, बसाहट के अधिकारों से तथा भूमि खरीद के अधिकार से वंचित किया जाए।

3. देश में जनसंख्या असंतुलन के संदर्भ में इस प्रकार का वातावरण निर्मित किया जाए कि सभी भारतीय राष्ट्रीय जनसंख्या नियंत्रण व असंतुलन के प्रति स्वमेव चिंतित रहें। समाज में इतनी जागृति हो कि वह ऊपर से लेकर निचले स्तर जनसंख्या असंतुलन के कारणों व कारकों को चिन्हित कर शासन को उससे अवगत कराएं।

4. 2011 की जनसंख्या गणना के आंकड़ों ने यह घंटी बजा दी है कि देश में लागू जनसंख्या नीति की आद्योपांत (पूर्ण) समीक्षा हो ताकि कारण व निदान पर राष्ट्रीय विमर्श प्रारंभ हो।

5. भारत में कुछ संस्थाएं, एनजीओ, धार्मिक ट्रस्ट आदि सुनियोजित ढंग से मतांतरण, लव जिहाद, भूमि जिहाद, अधिक प्रजनन दर व बाहरी घुसपैठ के माध्यम से जनसंख्या असंतुलन को बढ़ाने के कार्य में लिप्त हैं इन्हें चिन्हित कर इनकी फंडिंग आदि की जांच की जाए। देश को जनसंख्या असंतुलन के दंश व इस दंश के दीर्घकालीन दुष्परिणामों से बचाने हेतु आज आवश्यक है कि हम इस ओर स्थिर चित्त होकर ध्यान देवें व इस पर राष्ट्रव्यापी चिंतन करें।

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