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प्रदूषण और प्राकृतिक आपदा से लाचार

प्रदूषण और प्राकृतिक आपदा से लाचार

देश के दो राज्य इन दिनों भीषण प्राकृतिक आपदा के शिकार बने हुए हैं। एक देश के दिल में स्थित दिल्ली तो दूसरा पूर्वी क्षेत्र में स्थित असम। दिल्ली में प्रदूषण की त्रासदी है तो असम के छह जिले हर बार की तरह बाढ़ की चपेट में आ गए हैं। दिल्ली के वातावरण में लोग सांस लेने में तकलीफ महसूस कर रहे हैं तो असम के छह जिलों में लोगों का जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। वहां स्थिति से निपटने के लिए बाढ़ प्रभावित इलाकों में एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीमों को मोर्चे पर लगाया गया है परन्तु दिल्ली सरकार को कुछ नहीं सूझ रहा। वह इस भीषण समस्या के समाधान निकालने के वजाए धरना-प्रदर्शन करने में लगी हुई है। दिल्ली में प्रदूषण का कारक पश्चिमी विक्षोभ बताया जा रहा है तो असम में ब्रहमपुत्र नदी का तांडव।

ब्रहमपुत्र नदी का तांडव तो लंबे अरसे से होता चला आ रहा है लेकिन दिल्ली पर जिस तरह प्रदूषण ने पैर पसारे हैं उससे राजधानी के लोगों में भय व तमाम आशंकाओं को जन्म दिया है। दिल्ली के ऊपर मंडराने वाला वायु प्रदूषण ने दिल्ली तक ही सीमित न होकर अपितु आसपास के राज्यों मसलन, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान और चंडीगढ़ तक दस्तक दे दी है। आलम यह है कि राजस्थान और बलूचिस्तान की ओर से जो गरम और धूल भरी हवाएं उठीं हैं, उससे आसमान में धूल की चादर बन गई है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने प्रदूषण के इस स्तर को बेहद खतरनाक बताया है। पर्यावरण विदों का कहना है कि दिल्ली के लोग जिस हवा में सांस ले रहे हैं उसमें धूल के खतरनाक कण भी अंदर जा रहे हैं। गत वर्ष सर्दियों में दिल्ली में प्रदूषण ने इसी तरह का कहर बरपाया था। दिल्ली में इस तरह के प्रदूषण के खतरे से बचने के लिए पर्यावरणविदों ने बहुत पहले आगाह किया था कि राजधानी में बल मारती डीजल से चलने वाली बसों का तुरंत विकल्प नहीं खोजा गया तो स्थिति भयावह हो सकती है।

दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित ने बसों को सीएनजी से चलाने का फैसला लिया था। लेकिन अनियंत्रित वाहनों की आपाधापी ने फिर से दिल्ली पर प्रदूषण का कहर बरपा दिया है। अनियंत्रित यातायात ने दिल्ली में एक ओर जहां प्रदूषण का कहर बरपाया है तो दूसरी ओर इससे लगने वाले जाम ने लोगों को किंतव्र्यविमूण कर दिया है। दिल्ली की सड़कों पर रोजाना 85 लाख गाडिय़ां दौड़ती हैं। कार प्रति किलोमीटर 48 ग्राम पीएम 10, और 30 ग्राम सल्फर आक्साइड छोड़ती है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि 85 लाख गाडिय़ां कितनी सल्फर आक्साइड छोड़ती होंगी? धूल की परत की वजह से दस किलोमीटर की से कम मोटाई वाले कणों की मौजूदगी का स्तर खतरे के मानक से कई गुना ज्यादा बढ़ गया है। ये कण सीधे सांस से भीतर जाते हैं। और गंभीर रोगो ंका कारण बनते हैं। राजस्थान से उठने वाली हवाओं ने धूल के साथ मिलकर वातावरण को विशाक्त कर दिया है। सिसे घुटन के हालात बन गए हैं। ऐसे हालात अभ्ज्ञी कुछ और दिन रहने की संभावना वयक्त की गई है। लोगों को कहा गया है कि चार या पांच घंटे से ज्यादा खुले वातावरण में न रहें। और खुले में आवाजाही से बचें।

गौरतलब है कि इस तरह की खतरे की घंटी तो बार बार बजती रही है पर क्या अब तक इससे कोई सबक लिया गया है? न तो नागरिक चौकस हुए हैं और न ही सरकारी प्रयास हुए हैं। हवा खराब न हो, इसके लिए शायद ही कोई ठोस कदम उठाए गए हों। इसके इतर दिल्ली में पहाड़ जैसे खड़े कूड़ाघर जहरीली हवा फैला रहे हैं तभी हम कुदरत की मार झेलने के लिए बेबस और लाचार नजर आ रहे हैं। क्या असम और उसके आसपास के पड़ोसी राज्य भी बाढ़ के कहर के इस सिलसिले से कभी निजात पा सकेंगे? या फिर हर बार की तरह कुदरत का नैसर्गिक खेल समझकर उसकी मार झेलने के लिए बेबस बने रहेंगे?

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Swadesh Digital ( 0 )

स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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