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उत्तराखंड में भारत के अंतिम गांव माणा का पकौड़ा व तुलसी की चाय

बद्रीनाथ की तरह माणा गांव भी छह माह तक यानि अक्टूबर-नवम्बर से मार्च तक बर्फ से ढका रहता है

उत्तराखंड में भारत के अंतिम गांव माणा का पकौड़ा व तुलसी की चाय

बद्रीनाथ धाम से लगभग तीन किलोमीटर दूर भारत की उत्तरी सीमा का अंतिम गांव उत्तराखंड का चमोली जिले का माणा गांव ऐतिहासिक महत्व का है और इस गांव से तिब्बत चीन की सीमा लगभग 43 किलोमीटर दूर है। माणा गांव के बाद तिब्बत चीन सीमा के बीच कोई आबादी नहीं है, लेकिन भारत-तिब्बत सीमा सुरक्षा बल के जवान सालोंभर देश की शरहदों की सुरक्षा के लिये तैनात रहते हैं।

बद्रीनाथ की तरह माणा गांव भी छह माह तक यानि अक्टूबर-नवम्बर से मार्च तक बर्फ से ढका रहता है और इस दौरान माणा गांव की आबादी शून्य हो जाती है। क्योंकि यहां के लोग इस दौरान पांडुकेश्वर जोयाीमठ चमोली तथा गोपेश्वर जैसे स्थान पर चले जाते हैं । यहां के बच्चे छह माह माणा गांव में पढ़ते हैं और छह माह पांडुकेश्वर में पढ़ते हैं। माणा के लोगों को गर्म कपड़े बनाने में महारथ हासिल है और तुलसी से बनी चाय यहां की प्रमुख विशेषता है। गांव के शुरू में ही एक दुकान है जहाँ महिला पकोड़ा बना रही होती है और तुलसी की चाय मिलती है । गुजरने वाले हर तीर्थयात्री यहां पकौड़े व तुलसी से बनी चाय पीकर थकान मिटा लेते हैं |

दरअसल, इस गांव के लोग आॅर्गेनिक फार्मिंग करते हैं इसलिये यहां की सब्जियां और आलू तथा प्याज से बने पकौड़े का स्वाद लाजवाब होता है। दाल में पड़ने वाला खास मशाला फरण यहां के लोग बेचते हैं और इसका कारोबार खूब चलता है।

पकौड़ा और चाय बेचने वाली एक महिला से जब इस संवाददाता ने जानना चाहा कि वह महिला कितना कमा लेती है तो महिला ने कहा इन दिनों वह डेढ से दो हजार रुपये प्रतिदिन कमा लेती है। यहां आनेवाले पर्यटक ही पकौड़ों और चाय का आनंद लेते हैं। यहां के घर मिट्टी-पत्थरों और टीन से बने होते हैं। इस गांव में रंडपा जनजाति के लोग निवास करते हैं। गुप्त गंगा और अलकनंदा नदी के संगम पर स्थित माणा गांव में गर्मी के दिनों में बड़ी संख्या में देश विदेश के पर्यटक आते हैं। माणा गांव में भी छोटी-छोटी दुकानें हैं जहां जरुरी के सारे समान मिलते हैं। इन दुकानों में लगे टेलीविजन पर इनदिनों लोग विश्व कप फुटबॉल का भी आनंद ले रहें हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार माणा गांव को महाभारत काल का गांव माना जाता है। कहा जाता है कि इस गांव में ही व्यास और गणेश गुफा मौजूद हैं। इसी गुफा में व्यासजी ने महाभारत का सृजन किया था।

माणा गांव के पास ही सरस्वती नदी है और इसपर बना पुल भीमापुल कहलाता है। मान्यता है कि पांडव स्वर्गा रोहिणी के लिये जब जा रहे थे तो द्रौपदी सरस्वती नदी पार नहीं कर पायी तो पांडवों ने सरस्वती से रास्ता देने का अनुरोध किया, लेकिन सरस्वती नहीं मानी। बलशाली भीम ने दो बड़े पत्थल लुढकाकर यहां पुल बना दिया तथा भीम ने अपनी गदा से सरस्वती नदी पर वार किया, जिससे यह नदी थोड़ा आगे चलकर अलकनंदा में मिलती है और विलुप्त हो जाती है। यह नदी आज भी भीमा पुल के पास पूरी गर्जना के साथ बहती है लेकिन आगे चलकर विलुप्त हो जाती है और फिर इलाहाबाद में गंगा और जमुना नदी से मिलती है। इस गांव के बारे में मान्यता है कि यह श्रापमुक्त गांव हैं और यहां आने वाले लोग सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं।

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स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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