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कितना सफल होगा कांग्रेस का पिछड़ा कार्ड

कांग्रेस पार्टी ने जिस तैयारी और उम्मीद से राजधानी दिल्ली में पिछड़ा वर्ग सम्मेलन बुलाया था उसकी तात्कालिक परिणति हमारे सामने है।

कितना सफल होगा कांग्रेस का पिछड़ा कार्ड

- अवधेश कुमार

कांग्रेस पार्टी ने जिस तैयारी और उम्मीद से राजधानी दिल्ली में पिछड़ा वर्ग सम्मेलन बुलाया था उसकी तात्कालिक परिणति हमारे सामने है। कांग्रेस इसे जिस तरह ले लेकिन सोशल मीडिया में तो कोका कोला की शुरूआत एक शिकंजी वाले द्वारा तथा मैकडोनाल्ड की एक ढाबे वाले द्वारा किए जाने का वक्तव्य ही चर्चा में है। मुख्य मीडिया ने भी इसे स्थान दिया है। इस तरह की हास्यास्पद बातें कांग्रेस जैसी देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष करेगा इसकी उम्मीद कतई नहीं की जा सकती। कम से कम राहुल गांधी का भाषण तैयार करने वाले आसानी से इस पर रिसर्च कर सकते थे। यदि राहुल गांधी यह कहना चाहते थे कि हमारे यहां आम हुनर वाले लोगों को उस तरह का अवसर और सहयोग नहीं मिलता जिस तरह विदेशों में तो इसके लिए दूसरे उदाहरण दिए जा सकते थे। हालांकि वो कोई भी उदाहरण देते तो उनसे यही पूछा जाता कि इस स्थिति के लिए मुख्य रुप से किसे जिम्मेवार माना जाए? आरंभ से शासन करने वाली पार्टी ने जो ढांचा तैयार किया उसकी ही परिणति तो है यह। पीछे की बात जानें भी दें तो इसका जवाब उन्हें देना ही चाहिए कि इस स्थिति को बदलने के लिए नरेन्द्र मोदी सरकार से पूर्व आपकी यूपीए सरकार ने क्या-क्या कदम उठाए? दस वर्ष कोई छोटी अवधि नहीं होती। दस वर्षों में ढांचे को ऐसा स्वरुप दिया जा सकता था कि हमारे यहां भी एक मोची जूता की कंपनी खड़ी करके उद्यमी बन जाता। ऐसा एक भी उदाहरण यूपीए शासनकाल में नहीं मिलेगा। सम्मेलन में उन्होंने कहा कि पिछड़ी जातियों में हुनर की कोई कमी नहीं। उनके लिए बैंको का दरवाजा खुलना चाहिए। तो आपने खोला क्यों नहीं? सत्ता जाने के बाद ही आपको याद आया है कि ऐसा होना चाहिए।

वास्तव में मुख्य चुनावोंं में लगातार पराजय से उबरने की छटपटाहट में कांग्रेस जो कवायदें कर रहीं हैं उनमें कोई समस्या नहीं है। हर पार्टी चुनाव में विजय के लिए जितना यत्न संभव हो करती है। उसमें जातीय समीकरण बनाना भी शामिल है। इसलिए कांग्रेस अगर पिछड़ी जातियों के बीच अपना जनाधार बढ़ाने के लिए काम करना चाहती है तो उसे अस्वाभाविक नही कहा जा सकता। किंतु राजधानी दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में आयोजित पिछड़ा वर्ग सम्मेलन से यह साफ हो गया कि उसके पास इसकी न कोई ठोस योजना है न दिशा। यही कारण है कि पिछड़ी जातियों से संबंधित ऐसे मुद्दे उठाने से राहुल गांधी वंचित रह गए जिनको सुनने के बाद शायद लोग इस प्रयास को गंभीरता से लेते। केवल यह कह देने से तो पिछड़ी जाति के मतदाता उसकी ओर आने से रहे कि भाजपा सरकार पिछड़ी जातियों की उपेक्षा कर रही है और कांगेस उन्हें उचित हिस्सेदारी देगी। राहुल गांधी ने कहा कि कांग्रेस अति पिछड़ी जातियों को विधानसभा, लोकसभा व राज्य सभा में पूरा प्रतिनिधित्व देगी।

इसके पहले अप्रैल में कांग्रेस ने संविधान बचाओ दलित सम्मेलन किया था। उसमें दलितों को केन्द्रित ऐसी ही बातें राहुल गांधी ने कही थी। कांग्रेस अगर समझती है कि ऐसे सम्मेलन बुलाने और उसमें इस तरह के भाषण से उसका सोशल इंजीनियरिंग का लक्ष्य पूरा हो जाएगा तो स्पष्ट है कि अभी तक वह यह समझ ही नहीं पाई है कि ये वर्ग उससे विलग क्यों हैं। जो आरोप राहुल गांधी भाजपा सरकार पर लगा रहे हैं वहीं आरोप भाजपा कांग्रेस पर लगा रही है। वह कह रही है कि कांग्रेस अपने शासनकाल में पिछड़ों एव दलितों का जीवन स्तर सुधारने में पूरी तरह विफल रही। यही आरोप भाजपा उन पार्टियों पर भी लगा रही है जिनकी पूरी राजनीति ही पिछड़ों तथा दलितों पर टिकी है। यह सच है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को अन्य पिछड़ी जातियों का एक तिहाई से ज्यादा मत मिला था। यही स्थिति दलित समुदाय में भी थी। यह अपने-आप तो नहीं हुआ। राहुल गांधी और उनके रणनीतिकारों को समझना चाहिए कि दलित सम्मेलन करने के बावजूद कर्नाटक चुनाव में उसे दलितों का अपेक्षित वोट नहीं मिला। हालांकि उसने जद-एस के साथ मिलकर सरकार बना ली लेकिन वह चुनाव हार गई थी। आज की स्थिति मेंं सबसे ज्यादा दलित एवं पिछड़े सांसद तथा विधायक भाजपा के हैं। अगर इसको धक्का पहुंचाना है तो कांग्रेस को अपनी सोशल इंजीनियरिंग अभियान को ज्यादा तर्कपूर्ण और धारदार बनाना चाहिए था जो वह नहीं कर पाई है।

हालांकि लोकतंत्र के भविष्य के लिए तो अच्छा यही होगा कि पार्टियां जातियों और संप्रदायों के समीकरण से ऊपर उठकर आचरण करें। चुनावी विजय के लिए जातीय-सांप्रदायिक समीकरणों पर फोकस ने हमारे लोकतंत्र को विकृत ही किया है। किंतु अभी ऐसा हो रहा है और कांग्रेस भी इसमें शामिल है इसलिए इस समय यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो गया है कि आखिर उसका यह प्रयास कितना असरदार साबित होगा? 2019 के आम चुनाव के पूर्व राजस्थान, मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव हैं। इनमेंं भाजपा का शासन है। वहां कांग्रेस अकेले ही भाजपा के मुकाबले में है। इन तीनों राज्यों में पिछड़ी जातियों एवं अनुसूचित जाति-जनजाति की संख्या अच्छी है। वे चुनाव परिणाम को निर्धारित कर सकते हैं। अगर कांग्रेस पार्टी पिछड़ी जातियों में पैठ बनाना चाहती है तो उसे यह भी बताना होगा कि उसके यहां इस जाति का चेहरा कौन है। भाजपा के पास तो सबसे बड़ा पिछड़ा चेहरा नरेन्द्र मोदी हीं हैं। नरेन्द्र मोदी सरकार ने पिछले वर्ष ही अति पिछड़ा वर्ग में आरक्षण के लिए क्रीमी लेयर यानी मलाईदार परत की जो सीमा 6 लाख थी उसे 8 लाख कर दिया। यानी अब आठ लाख तक की आय वाले आरक्षण का लाभ ले सकेंगे। यह सही था या गलत इस पर तो बहस हो सकती है पर एक बड़ा निर्णय था इससे असहमति नहीं हो सकती। इस कारण आरक्षण के दायरे में बड़ी आबादी आ गई। इसी तरह उसने 15 जातियों को अति पिछड़ा वर्ग में शामिल किया।

राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने अन्य पिछड़ी जातियों मेंं उप श्रेणी बनाने का सुझाव दिया था। इसका आशय यह था कि इनके अंदर भी जो जातियां आरक्षण का लाभ अपनी आबादी के अनुरुप नहीं पा रहीं हैं उन पर फोकस किया जाए। इसके लिए मोदी सरकार ने एक आयोग का गठन कर दिया था। इसे ऐसी जातियों को चिन्हित करना था जो आरक्षण का सबसे ज्यादा लाभ ले रहीं हैं तथा ऐसी जातियों को भी जो लाभ लेने में पीछे हैं। इसे मोस्ट बैकवार्ड क्लास यानी अति पिछड़ी जातियां नाम दिया जा रहा है। स्वयं प्रधानमंत्री ने घोषणा कर दी है कि इन जातियों को आरक्षण का पूरा लाभ मिले इसके लिए सरकार जल्द ही कदम उठाने वाली है। उन्होंंने कहा कि सरकार चाहती है कि यह वर्ग घोषित सीमा के अंदर सरकार की आरक्षण नीति से ज्यादा लाभान्वित हो। इसका मतलब है कि सरकार आयोग की रिपोर्ट के आधार पर इनको अति पिछड़ा वर्ग के लिए घोषित 27 प्रतिशत आरक्षण में एक निश्चित हिस्सा दे सकती है। पिछड़े वर्ग में अति पिछड़ा वर्ग की संख्या काफी मानी जाती है लेकिन वे बिखड़े हुए हैं।

मोदी सरकार का यह निर्णय कितना सही है इस पर बहस हो सकती है। पर इन जातियों की संख्या हर राज्य में हैं जो अपने को उपेक्षित महसूस करते हैं। संभव है सरकार के इस कदम के बाद वो वर्ग भाजपा का समर्थन आधार बन जाए। यही आशंका कांग्रेस एवं अन्य पार्टियों को अंदर से परेशान कर रही है। राहुल गांधी ने हालांकि कहा कि सरकार पिछड़ा वर्ग को भी बांटने का प्रयास कर रही है लेकिन इससे कोई अंतर आएगा ऐसा नहीं लगता। मोदी सरकार ने पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने के लिए संसद में विधेयक लाया था। लोकसभा मेंं यह पारित हो गया, पर राज्यसभा में कांग्रेस ने उसमें संशोधन प्रस्ताव लाकर अड़गा लगा दिया। पिछड़ी जातियों को साथ लाने की राजनीति में उसे भाजपा के इस प्रश्न का जवाब भी देना होगा कि ऐसा क्यों किया गया।

मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह अपनी सभाओं में यह आरोप लगाते हैं कि पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैघानिक दर्जा देने के उनके कदम को कांग्रेस ने राज्य सभा में अपनी संख्या बल के आधार पर रोक दिया है। इस आधार पर वे कांग्रेस को पिछड़ा विरोधी भी साबित कर रहे हैं। पिछड़ा वर्ग सम्मेलन में राहुल गांधी इस पर कुछ बोेले ही नहीं। कांग्रेस क्या सोचती है कि पिछड़ी जातियों के अंदर जो पढ़ी-लिखी और जागरुक जनता है वह नहीं जानती कि विधेयक को कांग्रेस ने रोका। वह निश्चय ही सम्मेलन में यह अपेक्षा कर रही होगी राहुल गांधी इस पर बोलेंगे। राहुल की इस पर खामोशी से भाजपा को और बल मिला है। वह आने वाले चुनाव में न केवल विधेयक रोकने के कांग्रेस के रवैये को जोर-शोर से उठाएगी, बल्कि अति पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण की सीमा के अंदर विशेष व्यवस्था किए जाने का हर संभव प्रचार करेगी। क्या कांग्रेस के पास इनका कोई ऐसा उत्तर है जिससे इनमें आने वाली जातियों के मतदाता प्रभावित हो सकें? अभी तक तो ऐसा उत्तर नहीं मिला है।

( लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं )


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