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नड्डा को अभी साबित करना है...

नड्डा को अभी साबित करना है...

नई दिल्ली। जगत प्रकाश नड्डा को भाजपा का कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किए जाने के बाद मंगलवार को पार्टी मुख्यालय में जश्न का माहौल था। पार्टी के दिग्गज नेताओं में गृहमंत्री अमितशाह से लेकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, दोनों उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य व दिनेश शर्मा, संगठन महामंत्री रामलाल, कार्यलय प्रभारी व महासचिव अरूण सिंह, डा अनिल जैन, आदि ने उन्हें विशेष कक्ष में बधाई दी तो काॅमन हाॅल में आम कर्ताओं ने नड्डा को पुष्पगुच्छ से सम्मानित किया। यह सिलसिला कोई तीन घंटे तक चला। कार्यकर्ताओं की लंबी-लंबी कतारों में 'नड्डा जिंदाबाद' के नारे लग रहे थे तो स्वागत द्वार पर खड़े बैंडकर्मी नई-नई धुन व तान छेड़कर माहौल में चार चांद लगा रहे थे। सुदूर क्षेत्रों से आए कार्यकर्ताओं की जुबानी में नड्डा को भाजपा का मील का पत्थर बताया गया। नड्डा के प्रति कार्यकर्ताओं का यह अंदाज बयां करता है कि मृदुभाषी, विनम्र स्वभाव और पब्लिीसिटी से दूर रहने वाले नड्डा जल्द ही कार्यकर्ताओं का दिल जीत लेंगे। वे अनुशासन प्रिय हैं तो कठोर परिश्रमी भी। नड्डा मोदी-शाह के विश्वसनीय पात्र हैं।

हर पार्टी और सरकार में कोई चेहरा विशेष उत्थान या पतन का कारक होता है। नरेंद्र मोदी ने बतौर प्रधानमंत्री अगर सरकार में अपनी चमक बिखेरी तो संगठन को चतुराई से संचालित कर अमित शाह ने उसे नई उंचाई प्रदान की। फिर नड्डा भी तो उसी पाठशाला से निकलकर आए हैं, जहां से उनके पूर्वगामी तपकर कुंदन बनकर निकले। वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के तपे हुए अनुभवों से निकले हैं। तब उम्मीद की जानी चाहिए कि नड्डा भी पार्टी के बढ़े हुए कदमों को और आगे ले जाएंगे। हां चुनौतियां आगे उनकी परीक्षा लेंगी। आगे कुछ ही माह बाद महाराष्ट, झारखंड और हरियाणा के विधानसभा चुनावों में उन्हें इस परीक्षा से गुजरना है। लेकिन, इसके लिए अमित शाह अध्यक्ष के तौर पर उनका मार्गदर्शन करते रहेगे।

भाजपा काॅडर आधारित पार्टी होने के नाते इसमें पतन की गुंजाइश कम ही रहती है। क्योंकि सामूहिक निर्णय की परंपरा व्यक्ति या पदाधिकारी को गलत निर्णय नहीं करने के लिए बाध्य करती है। फिर भाजपा के पास मशीनरी है, टूल है, हार्ड कोर ग्रुप है। जिसके चलते पार्टी के संचालन में कठिनाई की गुंजाइश कम ही रहती है। सारे कठिन और महत्वपूर्ण निर्णय तो ताकतवर संसदीय बोर्ड ही करता है। भाजपा में निचले पदों पर रहकर कार्यकर्ता तमाम जिम्मेदारियों का निर्वहन करना सीख जाते हैं। यही अनुभव उन्हें लगातार आगे बढ़ाता है। नड्डा पिछले कई सालों से संगठन में विभिन्न पदों पर कार्यक्षमता दिखाकर संघ और संगठन की पहली पसंद बनते गए। 2014 में अगर 80 सीटों ंवाले उत्तर प्रदेश में प्रभारी के तौर पर अमित शाह ने कमाल की पारी खेली तो क्या 2019 में उसी प्रदेश में चुनौतियां क्या कम थीं? जब जरूरत पड़ी तो नड्डा ने बतौर प्रभारी चुनौती का सामना करते हुए गठबंधन को मात देकर 62 सीटें पार्टी की झोली में डाल दी। भाजपा में बूथ स्तरीय प्रबंधन है। क्षेत्र का गजब नेटवर्किंग सिस्टम है। नड्डा ने विधायक फिर सांसद रहते कई तरह के अनुभव लिए। मोदी सरकार में स्वास्थ्य मंत्री के तौर पर उन्होंने ही आयुष्मान योजना को पंख लगाए। यह उनकी गुणता ही थी कि जिसके दम पर वे पार्टी के सबसे ताकतवर संसदीय बोर्ड में सचिव जैसा पद पाने में सफल हुए। इन्हीं गुणों के चलते नड्डा आज कार्यकारी अध्यक्ष हैं तो कल संगठन के चुनाव में और निखरकर वे बतौर अध्यक्ष निर्वाचित हो सकते हैं। हालांकि इसके लिए उन्हें काफी कुछ सिद्ध करना होगा।

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