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अमेरिका 'दुग्ध उत्पादों' को भारत में खपाने की तिकड़म में, नहीं खरीदेगा भारत

अमेरिका अपने देश में बने सह उत्पाद भारत में खपाने की तिकड़म में है। इसके लिए उसने भारत को तरजीह सूची से निकाल दिया है।

अमेरिका दुग्ध उत्पादों को भारत में खपाने की तिकड़म में, नहीं खरीदेगा भारत

- प्रमोद भार्गव

अमेरिका ने भारत को व्यापार में महत्वपूर्ण देशों की सूची से बाहर कर दिया है। डोनाल्ड ट्रंप सरकार का यह फैसला यथावत रहता है तो दो माह बाद लागू हो जाएगा। इस कठोर निर्णय की पृष्ठभूमि में अमेरिकी दुग्ध उत्पाद बताए जा रहे हैं। इन्हें भारत ने खरीदने से इनकार कर दिया है। भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने इस संबंध में अमेरिकी सरकार को अपना रुख भी स्पष्ट कर दिया है। दरअसल ये उत्पाद नहीं खरीदने के पीछे भारत की सांस्कृतिक मान्यताएं और धार्मिक संवेदनाएं हैं। इनसे समझौता नामुमकिन है। लिहाजा भारत को कहना पड़ा है कि वहां दुधारू पशुओं को मांसाहार (ब्लड मील) मिला जो चारा खिलाया जाता है, उससे पैदा होने वाला दूध और उससे बना कोई भी उत्पाद नहीं खरीद सकते हैं। दरअसल अमेरिका और यूरोप के कई देशों में दुधारू मवेशियों को चारे में सुअर, भेड़ का मांस और खून मिलाया जाता है। इस मांस मिले आहार को खिलाने से मवेशी ज्यादा दूध देते हैं। गोया, अमेरिकी कंपनियां भारत में अपने डेयरी उत्पाद खपाने की कोशिश में अरसे से लगी हुई हैं। यदि उन्हें इन उत्पादों के निर्यात की सुविधा मिल जाती है तो सौ मिलियन डॉलर से भी ज्यादा का मुनाफा होगा, लेकिन एक तो भारत के जो लोग धार्मिक भावना के चलते मांसाहार का सेवन नहीं करते हैं, उनकी भावनाओं को ठेस लगेगी। दूसरे, भारतीय डेयरी उद्योग भी बुरी तरह प्रभावित होगा।

अमेरिका अपने देश में बने सह उत्पाद भारत में खपाने की तिकड़म में है। इसके लिए उसने भारत को तरजीह सूची से निकाल दिया है। अमेरिकी जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रिफरेंस (जीएसपी) से बाहर निकाले जाने से पहले तक भारत, अमेरिका को चालीस हजार करोड़ रुपये की वस्तुओं का निर्यात करता था। इस पर कोई आयात शुल्क अमेरिका नहीं वसूलता था। 1970 में यह नीति बनी थी। इसका सबसे ज्यादा लाभ भारत को अब तक मिलता रहा है। जबकि भारतीय नियमों के अनुसार यदि भारत किसी देश से दुग्ध उत्पादों का आयात करता है तो उसके निर्माता को यह प्रमाणित करना होगा कि जिन मवेशियों के उत्पाद भेजे जा रहे हैं, उन्हें कभी भी किसी दूसरे जानवर के आंतरिक अंगों एवं मांस आदि कभी नहीं खिलाए गए हैं। यह दिशा-निर्देश 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय से लागू है। हालांकि भारत में भी कई ऑनलाइन ई-व्यापार के जरिए खेती के लिए मांसयुक्त आहार बिकता है। इसे बूचड़खानों के व्यर्थ हुए कचरे से बनाया जाता है।

अमेरिका में पशुओं के लिए मांसाहार मीट पैकिंग व्यवसाय का सह-उत्पाद है। इसे दूसरे जानवरों को खिलाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। दरअसल बूचड़खानों में जानवरों को मरते वक्त उनका खून जमा लिया जाता है। फिर उस खून को धूप या हीटर पर सुखाकर एक विशेष प्रकार का चारा बना लिया जाता है। इसे ही ब्लड मील कहते हैं। दुधारू पशुओं के बेहतर स्वास्थ्य और उनसे ज्यादा दुध उत्पादन के लिए यह मांसयुक्त आहार खिलाया जाता है। इस चारे को लाइसीन नाम के एमिनो एसिड का अच्छा स्रोत भी माना जाता है। गायों के शरीर में मिलने वाले प्रोटीन में करीब 10 तरह के जरूरी एमिनो एसिड होते हैं। इनमें से दो बेहद अहम हैं। लाइसींस और मिथियोनाइन गायें अपने चारे से प्रोटीन नहीं सोखती हैं, क्योंकि वे अलग-अलग एमिनो अम्ल सोखने में सक्षम होती हैं। इसलिए उनके चारे में ब्लड मील और मक्का मिलाया जाता है। बल्ड मील लाइसींस का स्रोत है और मक्का मिथियोनाइन का बेहतर स्रोत है। फिलहाल अमेरिका चीज और पनीर भारत में बेचना चाहता है। इस चीज को बनाने की प्रक्रिया में बछड़े की आंत से बने एक पदार्थ का इस्तेमाल होता है। इसलिए भारत के शाकाहारियों के लिए यह पनीर वर्जित है। गो-सेवक व गऊ को मां मानने वाला भारतीय समाज भी इसे स्वीकार नहीं करता। हमारे यहां गाय-भैसें भले ही कूड़े-कचरे में मुंह मारती फिरती हों, लेकिन दुधारू पशुओं को मांस खिलाने की बात कोई सपने में भी नहीं सोच सकता। लिहाजा अमेरिका को चीज बेचने की इजाजत नहीं मिल पा रही है। लेकिन इससे इतना तो तय होता है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों की निगाहें हमारे दूध के कारोबार को हड़पने में लग गई हैं।

दुनिया में दूध उत्पादन में अव्वल होने के साथ हम दूध की सबसे ज्यादा खपत में भी अव्वल हैं। देश के प्रत्येक नागरिक को औसतन 290 ग्राम दूध रोजाना मिलता है। इस हिसाब से कुल खपत प्रतिदिन 45 करोड़ लीटर दूध की हो रही है। जबकि शुद्ध दूध का उत्पादन करीब 15 करोड़ लीटर ही है। मसलन दूध की कमी की पूर्ति सिंथेटिक दूध बनाकर और पानी मिलाकर की जाती है। यूरिया से भी दूध बनाया जा रहा है। दूध की लगातार बढ़ रही मांग के कारण मिलावटी दूध का कारोबार गांव-गांव फैलता जा रहा है। बहरहाल मिलावटी दूध के दुष्परिणाम जो भी हों, इस असली-नकली दूध का देश की अर्थव्यवस्था में योगदान एक लाख 15 हजार 970 करोड़ रुपये का है। दाल और चावल की खपत से कहीं ज्यादा दूध और उसके सह-उत्पादों की मांग व खपत लगातार बनी रहती है। साल 2017 में देश में दूध का उत्पादन 6.3 प्रतिशत बढ़ा है, जबकि अंतरराष्ट्रीय वृद्धि दर 2.2 फीसदी रही है। दूध की इस खपत के चलते दुनिया के देशों की निगाहें भी इस व्यापार को हड़पने में लगी हैं। दुनिया की सबसे बड़ी दूध का कारोबार करने वाली फ्रांस की कंपनी लैक्टेल है। इसने भारत की सबसे बड़ी हैदराबाद की दूध डेयरी 'तिरूमाला डेयरी' को 1750 करोड़ रुपये में खरीद लिया है। इसे चार किसानों ने मिलकर बनाया था। भारत की तेल कंपनी ऑयल इंडिया भी इसमें प्रवेश कर रही है। दूध का यह कारोबार 16 फीसदी की दर से हर साल बढ़ रहा है।

बिना किसी सरकारी मदद के बूते देश में दूध का 70 फीसदी कारोबार असंगठित ढांचा संभाल रहा है। इस कारोबार में ज्यादातर लोग अशिक्षित हैं। लेकिन पारंपरिक ज्ञान से न केवल वे बड़ी मात्रा में दुग्ध उत्पादन में सफल हैं, बल्कि इसके सह-उत्पाद दही, घी, मक्खन, पनीर, मावा आदि बनाने में भी मर्मज्ञ हैं। दूध का 30 फीसदी कारोबार संगठित -ढांचा, मसलन डेयरियों के माध्यम से होता है। देश में दूध उत्पादन में 96 हजार सहकारी संस्थाएं जुड़ी हैं। 14 राज्यों की अपनी दूध सहकारी संस्थाएं हैं। देश में कुल कृषि खाद्य उत्पादों व दूध से जुड़ी प्रसंस्करण सुविधाएं महज दो फीसदी हैं, किंतु वह दूध ही है, जिसका सबसे ज्यादा प्रसंस्करण करके दही, घी, मक्खन, पनीर आदि बनाए जाते हैं। इस कारोबार की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इससे सात करोड़ से भी ज्यादा लोगों की आजीविका जुड़ी है। रोजाना दो लाख से भी अधिक गांवों से दूध एकत्रित करके डेयरियों में पहुंचाया जाता है। बड़े पैमाने पर ग्रामीण सीधे शहरी एवं कस्बाई ग्राहकों तक भी दूध बेचने का काम करते हैं। गोया, यदि अमेरिका की दूध कंपनियां भारत में दूध बेचने लग जाएंगी तो देशी दूध कारोबारी दाने-दाने को मोहताज हो जाएंगे। इसलिए मांसयुक्त आहार से बने अमेरिकी दुग्ध उत्पादों पर प्रतिबंध तो जरूरी है ही, इसे भारतीय रोजगार की दृष्टि से भी देखने की जरूरत है।

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