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मर्यादा तो न लांघें अखिेलश

मर्यादा तो न लांघें अखिेलश

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव सरकारी बंगला छोड़कर नए विवाद में आ गए हैं। लखनऊ में चार, विक्रमादित्य मार्ग स्थित यह वही आवास है जहां मुख्यमंत्री रहते अखिेलश यादव पूरे पांच साल रहे। उच्चतम न्यायालय के आदेश का मान रखते हुए उन्होंने सरकारी बंगला तो छोड़ा लेकिन पद की मर्यादा और अहमियत को धता बताते हुए उन्होंने जिस आचरण को प्रस्तुत किया, वह अशोभनीय है। क्या एक पूर्व मुख्यमंत्री से इस तरह के आचरण की उम्मीद की जानी चाहिए। आखिर वे उस प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हैं जो बड़प्पन में शुमार माना जाता है। बंगले के अंदर जिस तरह की तोडफ़ोड़ की गई, सरकारी संपत्ति का नुकसान किया गया, वह शर्मसार है और निंदनीय भी। राज्य संपत्ति विभाग के अधिकारियों ने वीडियोग्राफी में पाया कि केवल चार विक्रमासदित्य मार्ग स्थित आवास में ही इस तरह के तोडफ़ोड़ की बात सामने आई है।

अब अखिलेश ही बताएं, हाथ कंगन को आरसी क्या? यानि वहां जो हुआ कैमरे वही बयां कर रहे हैं। इसमें भाजपा और आरएसएस बीच में कहां से आ गया? अखिलेश अपनी दलील में कह रहे हैं कि भाजपा नाहक उन्हें बदनाम कर रही है। बात यही समाप्त नहीं हुई। वे राज्यपाल रामनईक के अधिकार क्षेत्र की सीमा में प्रवेश कर गए। उनकी कार्यर्शली को आरएसएस से प्रेरित बताकर अखिलेश ने आखिर अपनी खीज को उजागर कर ही दिया। सिद्धांतपरक कार्यों के बीच वैचारिक असमानता की कोई अहमियत नहीं होती। संविधान सभी के लिए है और हर एक को इसी के दायरे में काम करना चाहिए। कुछ विषयों या कुछ तथ्यों पर विरोध करना लाजिमी हो सकता है लेकिन विरोध के लिए विरोध कहां तक जायज है? अब सवाल बंगले में पैसा लगाने का है तो अखिलेश यादव को खुद आयकर विभाग को बताना चाहिए कि आखिर बंगले में लगाने के लिए उनके पास पैसा आया कहां से? साथ ही जिस दीवार को तोड़ा गया, उसके पीछे क्या छिपाया गया था, इसकी जानकारी भी दें। हालांकि यह दुर्भाग्य ही है कि इस खर्चे का राज्य संपत्ति विभाग के पास भी कोई लेखा-जोखा नहीं है।

सूत्रों की मानें तो बंगले के लिए अलग-अलग मदों में कुल 42 करोड़ रुपए जारी किए गए थे। इसमें राज्य संपत्ति विभाग की ओर से केवल 89.99 लाख रुपए खर्च करना विभागीय रिकार्ड में दर्ज है। आखिरकार राज्यपाल को स्वत: संज्ञान लेना पड़ा। उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर सरकारी संपत्ति को क्षति पहुंचाने पर कानून के अनुसार कार्रवाई करने का आदेश देकर गेंद अखिलेश यादव के पाले में डाल दी है। देखना है आगे अखिलेश अब कौन सी बड़ी लकीर खींचते हैं? पूरे प्रकरण पर गौर करने के बाद क्या अखिलेश की स्थिति खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे वाली कहावत को चरितार्थ नहीं करती है?

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स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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