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संस्मरण : जीवन की समग्रता को समृद्ध करता नाट्य

डॉ. सच्चिदानंद जोशी

संस्मरण : जीवन की समग्रता को समृद्ध करता नाट्य

संगीत नाटक अकादमी द्वारा कलाक्षेत्र फाउंडेशन और भरत इलांगो फाउंडेशन फ़ॉर एशियन कल्चर के सहयोग से आयोजित नाट्य शास्त्र उत्सव, शास्त्र और प्रयोग में जाने का अवसर प्राप्त हुआ। भरत मुनि द्वारा विरचित नाट्य शास्त्र जिसकी रचना 2400 वर्ष पूर्व की मानी जाती है , आज भी रचनात्मक समृद्धि का सम्पूर्ण और प्रामाणिक ग्रंथ है। ये अवधारणाएं बिल्कुल असंगत है कि इसका संबंध और उपादेयता प्रदर्शनकारी कलाओं तक सीमित हैं। जीवन के हर क्षेत्र में इस ग्रंथ की उपादेयता और प्रासंगिकता निर्विवाद है। इसी तरह ये धारणा भी गलत है कि शास्त्र और जन या लोक में प्रचलित कला रूपों का कोई अलग विधान है। नाट्यशास्त्र का विस्तार समान रूप से सभी क्षेत्रों में है। इस उत्सव की संकल्पना परम विदुषी डॉ पद्मा सुब्रमनियम ने की। परम विद्वान डॉ नागस्वामी और मूर्धन्य कलाकार श्री शेखर सेन सहित कई विद्वानों का सानिध्य इस अवसर पर प्राप्त हुआ। संगीत नाटक अकादमी, कलाक्षेत्र फाउंडेशन और भरत इलांगो फॉउंफशन फ़ॉर एशियन कल्चर तीनो ही संस्थाएं बधाई की पात्र हंै इस महत्वपूर्ण आयोजन के लिए। इस आयोजन के विषय में विस्तार से चर्चा और कभी।

अभी चर्चा इस उत्सव की संध्या को हुई अद्भुत प्रस्तुतियों की। संध्या की प्रस्तुतियों का प्रारंभ डॉ पद्मा सुब्रमनियम जी के निर्देशन में नृत्योदय द्वारा प्रस्तुत पारंपरिक पूर्वरंगम और त्रिगधा से हुआ। इस प्रस्तुति में नाट्यशास्त्र की प्रासंगिकता और व्यापकता की भी चर्चा हुई। मैंने पद्मा जी को सुझाव दिया कि इसे एक पूरे बेले का रूपे दें तो नाट्यशास्त्र को जन साधारण को समझने में सुविधा होगी ।

इसके बाद ईश्वरीय कला के विस्मयकारी रूप कृष्णअट्टम से साक्षात्कार हुआ । कृष्णअट्टम केरल के मंदिरों में कृष्णभक्ति के नाट्य की कला है जिसे कालीकट के जोमोरिन राजा मान देव (1585-1658) ने प्रारंभ किया। ऐसा कहा जाता है कि उन्हें श्रीकृष्ण भगवान का विशेष आशीष प्राप्त हुआ था। उस समय आठ नाट्यों की रचना की गई थी। बाद में ये कला रूप सीमित हो गया। आज ये सिर्फ गुरुवायुर देवस्थान में सुरक्षित है। देवस्थानम में ही इसका प्रदर्शन होता है। इस नाट्य उत्सव के लिए इसे चेन्नई में प्रदर्शित किया गया। जिन लोगो ने भी इसे देखा वे भाग्यशाली माने जाने चाहिए। इसमें नरकासुर वध जहां एक ओर वीर और रौद्र रस की अनुभूति देने वाला था वहीं सुदामा प्रसंग करुणा और आनंद की पराकाष्ठा थी। सुदामा की कृष्ण से भेंट के समय शायद ही कोई होगा वहाँ जिसकी आंखें न भीग आयी हों। सिर्फ भक्ति और ईश रंजन के लिए किए जाने के कारण ये आपको अपने शुद्ध रूप में देखने को मिलता है। कृष्णअट्टम अपने आपको उस भक्ति सागर में डुबो देना था जहाँ आपको प्रतिक्षण गुरुवायुर में विराजे भगवान से एकाकार होने का अवसर मिलता है। प्रेम, करुणा और भक्ति की त्रिवेणी ही तो थी वहाँ। गुरुवायुर देवस्थानम में कला अकादमी है जहां 50 से अधिक कलाकार साधनारत हैं।

कुडिय़ाट्टम केरल का एक पारंपरिक नाट्य प्रकार है जो संस्कृत के नाट्य से मिलता जुलता है और सम्पूर्ण अभिनय आधारित है। संगम साहित्य से प्रेरणा लेकर रचा गया यह नाट्य अपने आप में आडम्बरहीन समग्रता लिए हुए है। अभिनय प्रधान होने के कारण भाव विशेषकर नेत्रों के भाव की इसमें विशेष साधना है। बहुत प्रचलित न होने के कारण इसके कुछ ही कलाकार प्रदर्शनरत हैं। उनमें प्रतिभाशाली कलाकर कपिला वेणु एक प्रमुख नाम है। कपिला वेणु प्रख्यात गुरु अम्मानुर माधव चक्यार की शिष्या हैं। उसके बाद वे अपने पिता और गुरु जी वेणु से मार्गदर्शन ले रही हैं। उन्होंने जो पूतना प्रसंग प्रस्तुत किया वो वर्षों तक स्मृति में रहेगा। उनके दो आंखों में अलग अलग भाव प्रकट करने की क्षमता चकित करने वाली थी। पूतना का राक्षसी रूप और श्रीकृष्ण का बाल सुलभ रूप जिस कुशलता से उन्होंने निभाया उसे देखकर उनकी प्रतिभा का लोहा माने बगैर नहीं रहा जा सकता।

कुछ समय पहले मैंने वियना के ओपेरा हाउस और स्टैंडिंग ओवशन का उल्लेख किया था। प्रश्न भी उठा था मन में कि हमारे यहाँ भी ऐसा होता है कि पांच सात मिनट तक ताली बजती रहे। लेकिन इन दोनों ही प्रदर्शनों में अभिभूत दर्शकों ने लगातार पांच सात मिनट तक तालियों की बौछार की और कलाक्षेत्र का रुक्मिणी सभागार उनसे गुंजायमान होता रहा। विशेष बात ये कि ये दर्शक सामान्य दर्शक नहीं थे। वहाँ नाट्य शास्त्र के विद्वान थे, नृत्याचार्य थे, वरिष्ठ कला साधक थे, युवा अभ्यर्थी थे और जानकार कला मर्मज्ञ थे। मेरा भाग्य कि मैं भी उनमें एक था और नि:संदेह उन प्रदर्शनों का साक्षात्कार कर मेरा जीवन समृद्ध हो गया।

(लेखक इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र नई दिल्ली के सदस्य सचिव हैं।)

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